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सोमवार, जून 14, 2021

यरूशलेम स्थित मस्जिद अल अक्सा का संक्षिप्त इतिहास

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पढ़िये यरूशलेम (Jerusalem) स्थित Masjid Al Aqsa (मस्जिद अल अक्सा) और Temple Mount (Dome of rock) का संक्षिप्त इतिहास ताकि आपको वहां के हालात समझ सकने में आसानी हो कि मुसलमानों और यहूदियों के बीच चलती आ रही जंग मुख्यतः किस बात की है।

Masjid Al Aqsa

सातवीं शताब्दी में अरब के मक्का शहर में मुहम्मद साहब ने जब स्वयं को अल्लाह का पैग़म्बर घोषित किया, तब भी इजराइल का शहर जेरुसलम यहूदियों का पवित्र तीर्थ स्थान हुआ करता था। जैसा कि आज भी है।

यरूशलेम में स्थित है “Temple Mount”,  जो आज की स्थिति में एक समतल स्थान है, वहां कभी यहूदियों का पवित्र मंदिर हुआ करता था मगर वक़्त के साथ वो मंदिर पूरी तरह से तबाह हो चुका है। अब बस उस मंदिर की कुछ दीवारें बची हैं जिनके सामने यहूदी आज भी प्रार्थना करते हैं।

आज के Temple Mount के स्थान पर एक बहुत ही आलीशान और भव्य मंदिर था जिसे, यहूदी धर्मग्रंथों के अनुसार, पैग़म्बर डेविड, जिसे इस्लाम में दाऊद बोला गया है, उनके बेटे सोलोमन, जिन्हें इस्लाम में सुलेमान कहा गया है, ने ईसा से एक हज़ार साल पूर्व (1000 BC), यानि मोहम्मद के पैदा होने से क़रीब सत्तरह सौ साल पहले, बनवाया था।

सोलोमन के इस मंदिर को हिब्रू भाषा में “बैत हा-मिक़दश” कहा जाता है। हिब्रू में “बैत” का मतलब होता है घर और “मिक़दश” का मतलब होता है पवित्र। यानि ख़ुदा का पवित्र घर। अरब के लोग इसे “बैत-उल-मक़्क़द्दस” कहते थे। ये एक तरह से अपभ्रंश था हिब्रू के “बैत हा-मिक़दश” का, जैसे सोलोमन का सुलेमान हो गया और डेविड का दाऊद बन गया।

तो सातवीं शताब्दी में जब मुहम्मद साहब ने स्वयं को पैग़म्बर घोषित किया तब उन्होंने जेरुसलम में स्थित सोलोमन के इसी मंदिर की तरफ़ मुंह करके प्रार्थना करना शुरू किया था। उस समय भी ये मंदिर एक खंडहर ही था जो वक़्त से साथ तमाम भूकंप झेलते हुए बस एक टीला बनकर रह गया था। उसकी कुछ दीवारें और खंबे शेष बचे थे। फिर जब पैग़म्बर मुहम्मद के अनुयायी बढ़े तो वो सब भी जेरुसलम की तरफ़ मुंह करके प्रार्थना करने लगे। और ये सिलसिला लगभग तेरह (13) साल चला।

तो तेरह साल तक नए नए मुसलमानों के लिए उनका किबला जेरुसलम का “बैत हा-मिक़दश” ही था जो कि यहूदियों का मुख्य तीर्थस्थल था। जिसकी पूजा सदियों से यहूदी करते आ रहे थे।

Masjid Al Aqsa (भाग 2):

जब मुहम्मद साहब ने मक्का में स्वयं को पैग़म्बर घोषित करने के बाद अपने नए धर्म “इस्लाम” का प्रचार प्रसार शुरू किया तो उन्हें मक्का के मूर्तिपूजकों का बहुत विरोध झेलना पड़ा। चूंकि मोहम्मद अपने पूर्वजों से अलग जा कर एकदम नए धर्म की बात कर रहे थे जिसमें वो मूर्तिपूजा को निषेध बता रहे थे, इसलिए इसका विरोध तो होना ही था। मुहम्मद के इस्लाम का झुकाव यहूदी और ईसाइयत की तरफ़ ज़्यादा था इसलिए ये मक्का के मूर्तिपूजकों के लिए ज़्यादा ख़तरनाक बात थी क्योंकि अगर ये एकेश्वरवाद मक्का के लोग स्वीकार कर लेते तो मक्का वालों के मंदिर “काबा” और उस से जुड़े धार्मिक व्यापार पर गाज गिर सकती थी। इसीलिए मुहम्मद और मक्का वालों के बीच की ये लड़ाई आस्था की कम, आर्थिक अधिक थी।

ये बात आप ऐसे ही अच्छी तरह समझ सकते हैं कि अगर मुहम्मद साहब शुरू से काबा को किबला मान कर उसके आगे झुक कर प्रार्थना कर रहे होते तो लड़ाई की कोई बड़ी वजह नहीं बचती और मामला उसी दौर में सुलह तक पहुंच गया होता। मगर मुहम्मद इस बात को लेकर अड़े हुए थे कि मूर्तिपूजा जहां भी होती है उसका वो विरोध करते रहेंगे, इसलिए मक्का वालों का वो लगातार विरोध झेलते रहे। और वो अपने अनुयायियों के साथ जेरुसलम की तरफ़ मुंह करके प्रार्थना करते रहे।

मक्का में अपने प्रवास के आख़िरी दिनों में मक्का वासियों के विरोध से परेशान होकर, मुहम्मद सिर्फ़ एक बार काबा के सामने झुके थे। ये घटना इस्लाम के इतिहास की सबसे विवादित घटनाओं में से एक के रूप में दर्ज है।

अंत मे उन्होंने इस घटना की सफ़ाई ये कहकर दी कि “शैतान” उन पर हावी हो गया था। इस घटना के बारे में क़ुरआन में भी आया है और इसी घटना से प्रेरित होकर मशहूर लेखक सलमान रुश्दी ने “द सैटेनिक वर्सेज” यानि “शैतानी आयतें” नाम से किताब लिखी थी। यहां इस घटना के विस्तार में नहीं जाना चाहता क्योंकि इससे विषय बदल जायेगा। मगर इस घटना का उल्लेख यहां मैं सिर्फ़ इसलिए कर रहा हूँ ताकि लोग समझ सकें कि उस दौरान मुहम्मद का काबा के सामने झुकना और मक्का के देवताओं और देवियों को अपना स्वीकार करना उस समय के इस्लाम की विचारधारा के बिल्कुल विपरीत था और मान्य नहीं था। फिर जब विरोध और बढ़ा तब मुहम्मद अपने कुछ अनुयायियों के साथ मक्का से मदीना चले गए। जहां इनको मानने वाले पहले से मौजूद थे मगर उनकी संख्या बहुत अधिक नहीं थी।

मुहम्मद जब मक्का से मदीना आये तब उन्हें यहां का परिवेश मक्का से भिन्न मिला। मदीना में यहूदियों की अच्छी खासी आबादी थी। और मदीना के बड़े बाग़ और बड़े खेतों के मालिक यहूदी थे। यहूदी मुहम्मद के अनुयायियों से कहीं ज़्यादा अमीर और पैसे वाले थे। ये लोग महलों में रहते थे और ऐश की ज़िंदगी जीते थे। जबकि मुहम्मद और उनके साथी बड़ी तंगहाली और ग़रीबी में जीते थे।

मुहम्मद के ज़्यादातर अनुयायी ग़ुलाम और निचले तबके के थे इसलिए यहूदियों के लिए उनका कोई विशेष महत्व नहीं था। यहूदी इस बात को भी नज़रंदाज़ करते रहे कि ये ग़ुलाम किसे अपना पैग़म्बर मानते हैं और किसकी पूजा करते हैं। मगर जब धीरे धीरे मुहम्मद के अनुयायियों की संख्या बढ़ने लगी, यहूदियों ने इस बात का संज्ञान लेना शुरू किया। मुहम्मद की बढ़ती ताक़त धीरे-धीरे यहूदियों के लिए परेशानी का सबब बनती जा रही थी।

शुरुआत में मुहम्मद ने यहूदियों से गठजोड़ में अपनी जान लगा दी। वो हर तरह से यहूदियों को इस बात के लिए राज़ी करना चाहते थे कि मेरा लाया हुआ इस्लाम तुम्हारे ही धर्म की एक शाखा है और जैसे तुमने ईसाईयों को अपना स्वीकारा है वैसे ही हमें भी स्वीकारो मुहम्मद ने यहूदियों के रोज़े (आशूरा का रोज़ा) रखने शुरू किए, उनकी तरह दाढ़ी और उनकी तरह की ही इबादत की रस्में शुरू की। मगर यहूदी, जो कि पद और प्रतिष्ठा में मुहम्मद और उनके अनुयायियों से कहीं आगे थे, मुहम्मद को अपना मानने के लिए राज़ी नहीं हो रहे थे। यहूदी लगातार मुहम्मद और उनके अनुयायियों की हंसी उड़ाते। उनको बात बात पर बेइज़्ज़त करते थे।

लेकिन सब से ज़्यादा वो जिस बात की हंसी उड़ाते थे वो ये थी कि, मुहम्मद, जो स्वयं को इस्लाम का पैग़म्बर कहते हैं, उनके पास अपना कोई किबला तक नहीं है और वो हमारे प्राचीन मंदिर “बैत हा-मिक़दश” को “बैत उल मक़्क़द्दस” बोलकर और उसे अपना बता कर उसके आगे झुकते हैं।

Masjid Al Aqsa (भाग 3):

मदीने में यहूदियों द्वारा की गयी उपेक्षा मुहम्मद के लिए यातना के समान थी। क्योंकि पूरे बारह साल वो मक्का में अपनों से उपेक्षित होकर लड़ते रहे और यहूदी और ईसाई धर्म और उनके पैगम्बरों को अपना कहते रहे। उन्हें उनके क़बीले और शहर के लोगों से लगातार इस बात के लिए ताने मिलते थे, उन पर ज़ुल्म होते थे और उनकी हंसी उड़ाई जाती थी। मगर इस सब के बावजूद उन्होंने अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया। फिर जब उनका सामना यहूदियों की भीड़ से हुआ, जो मदीना में ताक़तवर थे, तब उन्हें बहुत दुःख पहुंचा।

यहूदियों की उपेक्षा मुहम्मद के लिए दोहरी मार थी। क्योंकि एक तरफ मक्का में उनके मूर्तिपूजक क़बीले के लोग, उनके ख़ानदान वाले सब मुहम्मद से हर तरह के समझौते के लिए तैयार थे। क्योंकि वो चाहते थे कि मुहम्मद अपने एकेश्वरवाद की विचारधारा को अपने पुरखों के धर्म के साथ जोड़ लें और ये झगड़ा ख़त्म कर दें। तरह तरह के प्रलोभन, तरह तरह के समझौते की रूपरेखा बनाई गई मगर मुहम्मद तैयार न हुए। और अब इधर मदीने में यहूदी भी किसी तरह के धार्मिक समझौते के लिए तैयार होते नहीं दिख रहे थे।

यहूदियों के जेरुसलम में स्थित “बैत हा-मिक़दश” की तरफ़ मुंह करके प्रार्थना करना अब मुहम्मद के लिए भारी पड़ने लगा था। क्योंकि इस वजह से वो और उनके अनुयायी हंसी का पात्र बन रहे थे। तेरह (13) साल का समय कम समय नहीं होता है इसलिए प्रार्थना के लिए एकदम से दूसरा किबला चुन लेना भी उतना आसान नहीं था। इस कशमकश का वर्णन क़ुरआन में है। जब मुहम्मद इस बात को लेकर बहुत दु:खी और उदास हो गए जब क़ुरआन की ये आयात आयी:

मुहम्मद बहुत बार हमने तुम्हें देखा है आसमान की तरफ़ निहारते हुए (इस उम्मीद से कि किबला बदल दिया जाए) इसलिए अब हम तुमसे कहते हैं कि अपने उस किबले की तरफ़ अपना सिर घुमा लो जहां तुम्हें ख़ुशी मिले !

सूरह अल-बक़रह 2: 144

और फिर इस तरह मक्का से मदीना आने के करीब सत्तरह महीने बाद, किबला जेरुसलम न रहा और मुहम्मद ने मक्का की तरफ़ मुहं करके प्रार्थना करना शुरू कर दिया।

मगर ये उतना आसान नहीं था क्योंकि उनके अनुयायी इस बात को लेकर दो भाग में बंट गए। कई तो जेरुसलम की तरफ़ ही मुंह कर के ही प्रार्थना करते रहे क्योंकि मक्का की तरफ़ मुंह करके काबा को अपना किबला स्वीकारना इस्लाम की असल शिक्षाओं के एकदम विरुद्ध था। उस समय काबा मूर्तिपूजकों का पूजा स्थल या मंदिर था। वहां 360 देवी-देवताओं की मूर्तियां रखी हुई थीं और उसकी तरफ़ मुंह करके प्रार्थना करना एकेश्वरवाद के सिद्धांतों के एकदम विरुद्ध था। इसलिए मुहम्मद के अनुयायी किबला बदलने के इस फैसले से एकमत नहीं थे। फिर जब बात बहुत बढ़ गयी तब क़ुरआन की ये आयत आयी:

हमने पुराना किबला बदलने के लिए सिर्फ इसलिए कहा क्योंकि हम देखना चाहते थे कौन पैग़म्बर का सच्चा शिष्य है और कौन उन्हें छोड़कर भाग जाएगा। ये बहुत ही कठोर परीक्षा थी, मगर उनके लिए नहीं जिन्हें अल्लाह रास्ता दिखाता है !

सूरह अल बक़रह 2:143

(नोट: क़ुरआन में बाद में आई आयात को पहले रखा गया है और पहले आई को बाद में। क़ुरआन Chronological आर्डर में नहीं है इसलिए आप पाठक लोग इसका ध्यान रखें।)

धीरे-धीरे मुहम्मद के अनुयायी नए किबले को स्वीकारने लगे थे। मगर फिर भी बहुत सारे ऐसे थे जो इसे लेकर हमेशा असहज थे। उनके कितने अनुयायी ऐसे थे जिन्होंने काबा और उसके इर्द-गिर्द होने वाले धार्मिक कर्मकांड, जो हज के दौरान किये जाते थे, क्योंकि वो सब मूर्तिपूजक कर्मकांड थे, को कभी मन से स्वीकारा ही नहीं था। यहां इस टॉपिक के विस्तार में मैं इस सिरीज़ में नहीं जाऊंगा क्योंकि फिर टॉपिक बदल जायेगा।

किबला बदलने के साथ ही मुहम्मद का यहूदियों के प्रति झुकाव बदल गया। मुहम्मद उस स्थिति में नहीं थे जहां उन्हें यहूदियों की चापलूसी करनी पड़े। तो एक तरह से ये एक नए धर्म का उदय था। जो इस्लाम मक्का में मुहम्मद और उनके अनुयायी मान रहे थे उसमें बहुत बड़ा बदलाव हो गया था। अब यहूदी और मुहम्मद के अनुयायियों की ठन चुकी थी। इसलिए अब धार्मिक कर्मकांड में बड़े बदलाव किए जा रहे थे। पहले मुहम्मद और उनके अनुयायी वैसी ही दाढ़ी रखते थे जैसे यहूदी रखते थे। फिर मुहम्मद ने हुक्म दिया कि तुम लोग बिना मूछों वाली दाढ़ी रखो ताकि यहूदियों से अलग दिखो। उसके बाद यहूदियों के आशूरा का रोज़ा छोड़कर रमज़ान के रोज़े रखने का हुक्म दिया।

जो धर्म मक्का से शुरू हुआ था इस घोषणा के साथ कि यहूदी और ईसाई अहले किताब हैं और हमारे भाई हैं, वो अब पूरी तरह से यहूदियों के विरोध में आ चुका था। अब जैसे मक्का वाले मूर्तिपूजकों से जंग थी इस्लाम की, उसी तरह ये जंग यहूदियों के ख़िलाफ़ भी शुरू हो गयी थी।

Masjid Al Aqsa (भाग 4):

यहूदी धर्म हज़ारों सालों से एक ईश्वर की उपासना करता आया है। एकेश्वरवाद की अवधारणा लाने वाला सबसे पुराना धर्म यहूदी ही माना जाता है। एक ईश्वर यहोवा और उसकी उपासना करने वाले यहूदी होते हैं। अगर आप यहूदियों की पवित्र किताब तोरह, जिसे अरबी में ‘तौरेत’ कहते हैं, का अध्ययन करेंगे तो पाएंगे कि जिस तरह के ईश्वर का वर्णन उस किताब में हैं बिल्कुल वैसा ही ईश्वर इस्लाम में है। मगर उस ईश्वर की अवधारणा और उसके गुण को क़ुरआन में उतनी डिटेल में नहीं बताया गया है। ये सब कुछ इस्लाम की हदीसों में हैं। क़ुरआन में नहीं। हदीसें परम्पराओं और मान्यताओं का श्रुति ज्ञान है जो एक इंसान से दूसरे इंसान तक पहुंचा है। तो ईश्वर का वह रूप जिसके बारे में “तोरह” कहता है, वो आपको इस्लाम की हदीसों में मिलेगा मगर क़ुरआन में नहीं।

उदाहरण के लिए जैसे रूढ़िवादी इस्लाम के मानने वाले किसी भी जानदार जानवर या इंसान की तस्वीर अपने घरों में लगाना नहीं पसंद करते हैं। दिल्ली के लालकिले में जो पत्थरों की नक्काशी में मोर और अन्य जानवर बने थे, उसे औरंगज़ेब में तोड़ दिया था। औरंगज़ेब रूढ़िवादी इस्लाम मानने वाला था। अब इस तरह का कोई इस्लामिक नियम आपको क़ुरआन में नहीं मिलेगा और न ही किसी शिक्षा में। मगर अगर आप पढ़ेंगे तो ये आपको यहूदियों की किताब तोरह में मिलेगा। जिसमें हर जानदार चीज़ की फ़ोटो या मूर्तियां बनाना मना किया गया है। जानदार की तस्वीर यहूदी धर्म मे वर्जित है, इस्लाम में नहीं। मगर यह परंपरा इस्लाम के मानने वाले मानते तो हैं मगर जानते नहीं कि उसका मूल तोरह है, क़ुरआन नहीं।

ऐसे ही आज के रूढ़िवादी इस्लाम की ज़्यादातर चीज़ें आपको यहूदियों की किताबों में मिलेंगी। और इन्ही किताबों की बातों को इस्लाम की हदीस में शामिल कर लिया गया। हदीस इक्कट्ठा करने वालों ने हजारों और लाखों हदीसों को पूरी तरह से हटा दिया था। क्योंकि वो सब यहूदी और ईसाई परंपरा की बातें करती थी। मगर अभी भी जो हदीसें बची हैं उनमें भी ज़्यादातर यहूदी परंपरा के क़ानून और कर्मकांड हैं।

ये बातें मैं इसलिए लिख रहा हूँ ताकि आप समझ सकें कि मुहम्मद ने अपना किबला तो जेरुसलम से मक्का कर लिया था मगर बीते तेरह सालों के दौरान जो यहूदी परम्परा इस्लाम के मानने वालों का मूल बन गयी थी, वो जाते-जाते भी नहीं गयी। कितने क़ानून और कितने फैसले ऐसे थे जो सब यहूदी थे मगर उसे मुहम्मद ने इस्लाम में अपनाए थे। और अब उन्हें बदलना उनके लिए आसान नहीं था। इसलिए जो लोग शुरू से मानते आ रहे थे वो उसे मानते गए और धीरे-धीरे वो परंपराएं और मज़बूत ढंग से इस्लाम का हिस्सा बन गईं।

यहूदियों के अपने धर्म को लेकर जड़ होने का अंदाज़ा मुहम्मद को नहीं था। वो ये समझ ही नहीं पाए कि यहूदी कभी भी किसी दूसरे क़बीले या दूसरी नस्ल के पैग़म्बर को अपना पैग़म्बर स्वीकार ही नहीं करेगा। मगर जब तक वो ये समझते, बात बहुत आगे निकल चुकी थी। तब तक उन्होंने यहूदी धर्म की लगभग हर बातें इस्लाम के रूप में अपने अनुयायियों को थमा दी थी। 13 साल तक “बैत हा-मिक़दश” की तरफ़ मुंह करके प्रार्थना करने वाले लोग एकदम से कैसे अपनी धारणाओं और आस्था को छोड़ देते? ये बड़ा कठिन काम था। आस्था को बदलना बड़ा मुश्किल काम होता है।

तो एकेश्वरवाद से लेकर लगभग सब कुछ इस्लाम का, यहूदियों से आया था। और अब उन्हीं के विरोध में जाना, ये अपने आप में एक टेढ़ी खीर था। मगर मुहम्मद ने ये किया। वो बहुत दृढ़ निश्चय वाले व्यक्ति थे। जैसे पहले उन्होंने यहूदियों की तमाम परंपराओं को इस्लाम में लागू करवाया था, वैसे ही उन्होंने अब मक्का वाले मूर्तिपूजकों की सारी परंपराओं को, धार्मिक कर्म कांडों को इस्लाम का हिस्सा बना दिया। विरोध हुआ मगर धीरे-धीरे उनके अनुयायी इस बात को स्वीकार कर ले गए।

तो यहूदी धर्म और उसके प्रतीकों से मुहम्मद ने पूरी तरह से आज़ादी ले ली थी। किबला बदलने की शुरुआत कर के। और जो धर्म अब उन्होंने अपने लोगों को दिया वो शुरुआती इस्लाम से एकदम अलग था। जिस मक्का के मंदिर काबा के सामने मुसलमान झुकना पसंद नहीं करते थे, अब उसी के आगे झुक रहे थे।

उनके सबसे बड़े बड़े अनुयायियों के लिए भी ये बड़ा मुश्किल काम था।

उदाहरण के लिए!

इस्लाम के दूसरे ख़लीफ़ा हज़रत उमर की बात ही ले लीजिए। उमर मुहम्मद के सबसे वफादार और अच्छे शिष्यों में से एक माने जाते हैं। जब मक्का के मूर्तिपूजकों की परंपराओं को इस्लाम में मुहम्मद ने शामिल किया तो उमर स्वयं कई बातों से संतुष्ट नहीं थे।

बुखारी की सहीह हदीस में एक वर्णन है कि एक बार जब ख़लीफ़ा उमर काबा में लगे काले पत्थर, हज्र-ए-असवद को चूम रहे थे तो उन्होंने कहा “मैं जानता हूँ कि तुम बस एक पत्थर हो, और तुम न तो मुझे कोई फ़ायदा पहुंचा सकते हो और न नुकसान। इसलिए अगर मैंने पैग़म्बर मुहम्मद को तुम्हें चूमते न देखा होता तो मैं तुम्हें कभी नहीं चूमता।”

ये छोटी सी हदीस ये बताती है कि मूर्तिपूजक परंपराओं को अपनाना मुहम्मद के अपने ख़ास लोगों के लिए कितना पीड़ादायक था। इस्लाम का किबला तो बदल गया मगर इस वजह से इस्लाम का सारा स्वरूप भी बदल गया था और वो मुहम्मद के साथ साथ उनके अनुयायियों के लिए पीड़ादायक था। और यहूदियों के उपेक्षा का वो दंश इस्लाम के रूप और इतिहास को पूरी तरह से बदल देने वाला था।

Masjid Al Aqsa (भाग 5):

सन 624 में, मदीना में पैग़म्बर मुहम्मद ने किबला, यानि प्रार्थना का डायरेक्शन, जेरुसलम से मक्का की ओर किया। और इसके ठीक आठ (8 साल बाद, 632 में मुहम्मद की मृत्यु हो गयी)

तब तक मुहम्मद को मानने वालों की भीड़ बहुत बड़ी हो चुकी थी। और काबा को किबला मानने के बाद इस्लाम की रीतियों और मान्यताओं में आये बदलाव को एक बड़ी भीड़ तो बताने और समझाने का मुहम्मद को बहुत कम वक़्त मिला। किबला बदलने के साथ ही मुहम्मद के जीवन के आख़िरी कुछ साल युद्ध और सुलह में ही बीते। अपने जीवन के अंत समय से सिर्फ़ दो (2) साल पहले, यानि सन 630 में, मुहम्मद और उनके अनुयायी मक्का पर कब्ज़ा कर पाए। तब जा कर काबा के भीतर और उसके आसपास से सारे देवी देवताओं की मूर्तियां हटाई गयी।

तो 624 से लेकर 630, यानि पूरे छः (6) साल तक मुहम्मद और उनके अनुयायी मक्का के जिस काबा की तरफ़ मुंह कर के प्रार्थना कर रहे थे वो 360 मूर्तियों वाला मूर्तिपूजकों का एक मंदिर था। और यह बात मदीना में उनके साथ रह रहे उनके अनुयायी जानते और समझते थे। इसलिए आस्था की दरार उसी वक़्त से लोगों के भीतर घर करने लगी थी। चूंकि मुहम्मद जब तक जिंदा थे तब तक अपने मानने वालों के लिए वो ही सब कुछ थे, इसलिए आस्था की ये खिचड़ी उनके जीते जी बहुत ठीक से उजागर नहीं हो पाई। लोग विरोध में होते थे मगर मुहम्मद के सम्मान की वजह से कुछ कहते नहीं थे।

मगर जैसे ही मुहम्मद इस दुनिया से गये, उनके मानने वालों के बीच जंग छिड़ गई। ऐसा दुनिया में किसी अन्य धर्म प्रवर्तक के साथ नहीं हुआ है कि उसके जाने के तुरंत बाद उसके ही अनुयायी आस्था को लेकर आपस मे इस हद तक लड़ पड़ें हों। इधर मुहम्मद का मृत शरीर उनके कमरे में रखा था और उधर उनके अनुयायी गुटों में बंट रहे थे। कुछ थे जो उमर, अबु बक़र और उस्मान जैसों के साथ थे तो कुछ अली के पाले में थे। कुछ सबको छोड़कर क़ुरआन पर टिके रहने का दावा कर रहे थे तो कुछ इस्लाम छोड़ के वापस अपने पुराने धर्म मे लौट रहे थे। और ये सब तुरंत हुआ था, महज़ कुछ घंटों के भीतर।

लोग इसे राजनीति कहते हैं मगर ये राजनीति से कहीं ज़्यादा आस्था के बिखराव की कहानी थी। और इस आस्था का बिखराव शुरू हुआ था मुहम्मद के किबला बदलने के साथ। जेरुसलम को छोड़कर मक्का को आस्था का केंद्र बनाने के बाद।

मैं मुहम्मद के बाद की पीढ़ियों की बात नहीं कर रहा। मैं उनकी बात कर रहा हूँ जो मुहम्मद के साथ थे। इस्लाम के दूसरे ख़लीफ़ा और मुहम्मद के दोस्त उमर अपनी शिक्षा और आस्था को सर्वोपरि मानते थे। इस्लाम के चौथे ख़लीफ़ा, मुहम्मद के चचेरे भाई और दामाद अली की शिक्षाओं और आस्था को उनके समर्थक सर्वोपरि मानते थे। ऐसे ही अन्य लोग भी थे। मुसलमानों की आस्था और प्रतीकों की मान्यताओं में इतना बड़ा अंतर था कि विरोधी विचार वाले लोग एक दूसरे को उसी वक़्त से काफ़िर और मुशरिक कहके संबोधित करने लगे थे। ये बिखराव बहुत पहले ही हो चुका था। मगर अब चूंकि मुहम्मद नहीं थे इसलिए अब लोग खुलकर सामने आ गए थे।

मुहम्मद ने अपने जीते जी अपने हिसाब से किबला बदल कर अपने अनुयायियों की आस्था को दूसरी तरफ़ मोड़ दिया था। मगर जैसे कि मैंने पहले बताया, इस नई आस्था को लोगों में पोषित करने के लिए मुहम्मद को ज़्यादा वक़्त नहीं मिला। किबला बदलने के बाद उनका ज़्यादातर समय युद्ध में बीता और फिर मक्का पर कब्ज़ा हुआ और फिर उसके दो सालों बाद मुहम्मद इस दुनिया से चले गए।

उनके जाने के बाद हज़रत अबू बक़र ने उनका उत्तराधिकारी बनकर ख़लीफ़ा की गद्दी संभाली। और उसके बाद दूसरे ख़लीफ़ा उमर बने। उमर, अबु बक़र, उस्मान जैसे लोग इस्लाम के उस पुराने रूप के कट्टर समर्थक थे जिसका प्रचार मुहम्मद मक्का प्रवास के दौरान करते थे। जिसमें मूर्तिपूजा, मूर्तिपूजकों के कर्मकांड और उनकी मान्यताओं का घोर विरोध था। जिसमें जेरुसलम को पहला किबला मानने की आस्था भी शामिल थी। ये लोग यहूदी धर्म की मान्यताओं से ज़्यादा जुड़े हुए लोग थे। ज़्यादा कट्टर थे और तौरेत की सारी बातें हदीस के तौर पर इस्लाम में ले आये थे।

जबकि दूसरी तरफ़ अली को मानने वाले लोग थे। अली जो कि स्वयं मुहम्मद के चचेरे भाई थे, और क़ुरैश क़बीले के वारिस भी। ये मुहम्मद का क़बीला था जिसके हाथ में काबा का रख-रखाव और उसके आसपास के व्यापार का मालिकाना हक़ था। अली, जिनके बारे में कहा जाता है कि उनका जन्म काबा के अंदर हुआ था। वो काबा और अपने क़ुरैश क़बीले की परंपराओं के ज़्यादा क़रीब थे। यहूदी मान्यताओं और यहूदी कट्टरता अली के स्वभाव में नहीं थी। इसलिए किबला बदलने के बाद अली आस्था के इस बदलाव को लेकर बाक़ी लोगों से कहीं ज़्यादा सहज थे।

आप अब इस फ़र्क़ को एकदम साफ़-साफ देख सकते हैं। दुनिया के सुन्नी और वहाबी इस्लाम को मानने वाले, जो कि उमर, अबूबकर और उस्मान ख़लीफ़ाओं को मानने वाले लोग हैं, उनकी रूढ़िवादी कट्टरता आप देखिए और वहीं अपने आसपास रह रहे अली को मानने वाले शिया, बोहरा और ऐसे लोगों को रूढ़िवादी कट्टरता देखिये। आपको इनमें ज़मीन-आसमान का फ़र्क मिलेगा। ये बात भी सच है कि वक़्त के साथ शिया बाहुल्य ईरान जैसे देशों के लोग भी सुन्नियों के प्रभाव से कट्टर होते चले गए और अब वह भी बहुत कट्टर होते हैं। मगर शुरुआत में ऐसा नहीं था। उनकी आस्था ज़्यादा नर्म और लचीली थी। जैसी मक्का के मूर्तिपूजकों की थी। और उमर, अबूबकर और उस्मान को मानने वालों की आस्थाएं ज़्यादा कट्टर थीं, जैसे यहूदियों की थीं।

Masjid Al Aqsa (भाग 6)

Temple Mount

उमर जब दूसरे ख़लीफ़ा बने तब तक इस्लामिक स्टेट का विस्तार काफ़ी दूर-दूर तक हो चुका था। फिर उन्होंने जेरुसलम में स्थित टेम्पल माउंट के खंडहरों पर एक छोटा से प्रार्थना स्थल या मस्जिद बनवाया। बिल्कुल छोटा सा एक प्रतीकात्मक।

यह काम न तो मुहम्मद के समय में हुआ था और न ही दूसरे ख़लीफ़ा अबू बक़र के दौर में। ये ख़लीफ़ा उमर ने किया था। मुहम्मद ने अपने जीवन काल मे भी ऐसा कोई निर्देश नहीं दिया था क्योंकि किबला बदलने के बाद मुहम्मद जेरुसलम और यहूदी परंपराओं से एक तरह से मुंह मोड़ चुके थे।

जब परंपराएं बदली तब भी लोग मुहम्मद से यहूदी परंपराओं को लेकर सवाल पूछते थे। क्योंकि वो उनकी मान्यताओं में था। जैसे आशूरा के रोज़े को लेकर लोग जब सवाल करते तब मुहम्मद उन्हें कभी ये नहीं कहते थे कि वो रोज़े रखना ग़लत है या उसे न रखो। क्योंकि वो जानते थे कि अगर अब इसे ग़लत ठहराया तो उनकी स्वयं की विश्वसनीयता पर सवाल खड़ा हो जाएगा। वो हमेशा ये कहते कि रमज़ान के रोज़े फ़र्ज़ हैं और आशूरा के रोज़ों का भी अपना पुण्य है। वो हमेशा कहते थे कि क़ाबा को किबला मानना फ़र्ज़ है मगर बैत-उल-मक़्क़द्दस की इज़्ज़त भी इस्लाम के मानने वालों को करनी है।

इस तरह उन्होंने पुरानी परंपराओं को नकारने के स्थान पर उनकी उपयोगिता कम कर दी। और इसका नतीजा ये हुआ कि नए-नए बने मुसलमान पूरी तरह से काबा से जुड़े जबकि पुराने वालों के दिल मे बैत उल मक़्क़द्दस अभी भी घर करता था।

ख़लीफ़ा उमर का जेरुसलम में “Bayt al-Maqdis” के खंडहरों पर एक प्रार्थना स्थल बनाना उनकी अपनी पुरानी आस्था का नतीजा था। क्योंकि न तो कहीं क़ुरआन में और न ही कहीं और ऐसा कोई हुक्म या नियम मिलता है जिसके अनुसार मुसलमानों को उस स्थान पर अपना दावा ठोकने की कोई ज़रूरत थी। ये पूरी तरह से बिद्दत थी। यानि इस्लाम में प्रचलित नियमों में अपना नया नियम डालना। वो न तो हज का कोई अरकान है और न ही इस्लामिक कर्मकांड का कोई नियम।

और जब उमर ने ये बिद्दत की तब नए-नए मुसलमानों के सामने इसे जस्टिफाई करने के लिए भी उनके पास कोई ठोस सबूत होना चाहिए था। क्योंकि जो अब काबा को अपना सब कुछ मान रहे थे उनके किये जेरुसलम का Temple Mount अब कोई ख़ास स्थान नहीं रखता था और न ही मुसलमानों के पास वहां जाने की कोई ठोस वजह थी। तो मुसलमान उस जगह की इज़्ज़त क्यों करते जो यहूदियों का पुराना मंदिर है?

तब इस बात का तोड़ निकाला गया हदीसों से यानि श्रुति ज्ञान के द्वारा। ये बात हदीसों द्वारा प्रचलित करवाई गई कि Shab e meraj की रात (जिस रात मुहम्मद मदीने से आसमान की तरफ़ गए थे ख़ुदा से मिलने एक उड़ने वाली घोड़ी बुर्राक़ पर बैठकर) को मुहम्मद को फ़रिश्ते पहले जेरुसलम ले कर गए Temple Mount या Bayt al-Maqdis के खंडहरों पर, फिर वहां उन्होंने उन खंडहरों पर नमाज़ पढ़ी, फिर उसके बाद वो आसमान में गए ख़ुदा से मिलने। तो फरिश्तों ने Temple Mount को एक तरह से लैंडिंग पॉइंट की तरह इस्तेमाल किया। और अब वो चूंकि स्वर्ग जाने और अल्लाह से मिलने का लैंडिंग पॉइंट है इसलिए उसकी इज़्ज़त तो बनती ही है।

अब आप अगर अपनी आस्था किनारे रखकर इस हदीस पर ध्यान देंगे तो आपको सारा खेल समझ मे आ जायेगा। मक्का से जेरुसलम जाना और वहां से स्वर्ग। ये उन मुसलमानों द्वारा अपनी आस्था को सही ठहराने के लिए गढ़ी गयी कहानी है, जिनके लिए Temple Mount पहले किबला हुआ करता था मगर अब वो उसे मिस कर रहे थे। और ऐसे इस नई हदीस के द्वारा ख़लीफ़ा उमर और उनके अनुयायियों ने Masjid Al Aqsa की नींव रखकर उसका महत्व मुस्लिम जगत में स्थापित कर दिया।

उमर द्वारा बनवाया गया प्रतीकात्मक छोटा सा प्रार्थना घर उनके बाद आने वाले ख़लीफ़ाओं ने और विस्तार से बनवाया और Temple Mount के पैंतीस (35) एकड़ के हिस्से पर अपना अधिकार जमा लिया। आज Masjid Al Aqsa का पूरा कंपाउंड पैतीस एकड़ में है। जिसमें एक मस्जिद है और दूसरा है Dome of rock। Dome of rock के भीतर एक चट्टान है। इसी प्रतीकात्मक चट्टान या Bayt al-Maqdis के खंडहर को किबला मान कर शुरुआत के मुसलमान उसकी तरफ़ मुंह करके प्रार्थना करते थे। मगर अब के मुसलमानों के लिए उसकी उपयोगिता हदीसों के द्वारा इस बात की बताई गई है कि वो मुहम्मद के स्वर्ग जाने का लैंडिंग पॉइंट है।

यहूदियों के सबसे प्राचीन तीर्थ स्थल जेरुसलम में उनके सबसे पवित्र इबादतगाह Bayt al-Maqdis का एक छोटा सा हिस्सा अब यहूदियों के पास है, एक दीवार उन्हें मिली है जिसके सामने वो इबादत करते हैं, जबकि पैंतीस एकड़ के बड़े हिस्से पर Masjid Al Aqsa बनी है और उस हिस्से पर मुसलमानों का कब्ज़ा है।

ये उसी तरह है जैसे कल को कोई दूसरे धर्म वाला काबा पर कब्ज़ा कर ले और वहां पर अपना मंदिर बना ले और फिर एक कहानी गढ़ ले कि वहां से उसके देवदूत स्वर्ग गए थे, इसलिए इस पूरे इलाके पर अब हमारा अधिकार है।

ये कॉमन सेंस की बात है, आस्था की नहीं। आपकी आस्था आपके अपने प्रतीकों और मान्यताओं में छिपी है और आपकी उस आस्था को कोई छेड़ नहीं रहा है। आप ने अपनी आस्था के केंद्र के आसपास तक दूसरे धर्म के लोगों का आना-जाना तक वर्जित कर रखा है तो आपको कम से कम दूसरों की आस्था के बार में भी विचार करना चाहिए। आप अगर समझदारी से काम लें तो वहां लड़ाई की कोई वजह बचती ही नहीं है। क्योंकि वहां आपका दरअसल कुछ है ही नहीं सिवाए एक खोखले दावे के।

समझदारी और सुकून से इसे आपको कभी निपटाना नहीं चाहेंगे, ये हम सब जानते हैं। फिर लड़ाई और बम से ही इसे सुलझाइए। मगर ध्यान रखिये कि इसमें फिर आपके भी लोग मरेंगे और उनके भी। फिर अपने लोगों के मरने पर सिम्पथी मत ढूँढिये। इसे जंग की तरह लीजिये। जो जीतेगा वो इलाक़ा उसका होगा।

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