आत्मा का भ्रमजाल क्या है?

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जो धर्म डराए, जो किताब भ्रम पैदा करे, उसमें शिद्दत से सुधार की जरूरत है!
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आत्मा का भ्रमजाल क्या है? जैसे ही कई अलग तरह के प्रश्न अक्सर आपके मन में भी उपजते होंगे। क्या कभी सोचा कि जो लोग Atma पर विश्वास करते हैं, वे किसी निकटतम की मृत्यु पर फूट-फूट क्यों रोते देखे जाते हैं? जब Aatma मरती ही नहीं तो फिर उनके विलाप का क्या अर्थ है? हमें तो लगता है कि स्वयं के विश्वास पर ही भरोसा नहीं है। मतलब कि Life after death जैसे विश्वास भी आपको कठिन परिस्थितियों में सुख नहीं देते। जानते होंगे कभी कार्ल मार्क्स ने इन अंधविश्वासो को एक तरह का नशा कहा था। और सच भी है कि, ये नशे से ज़्यादा कुछ भी नहीं।

गीता के Chapter: 2, Shloka: 27 में कहा गया है कि:–

जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च।
तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि॥

भगवत गीता- 2.27

Hindi Meaning :- जन्मने वाले की मृत्यु निश्चित है और मरने वाले का जन्म निश्चित है। इसलिए जो अटल है अपरिहार्य है, उसके विषय में तुमको शोक नहीं करना चाहिये।

अब गीता में कहा गया कि Aatma कभी नहीं मरती। मृत्यु के बाद ईश्वर Aatma को न्याय देकर उसे दोबारा जन्म लेने का अधिकार देते हैं। इसलिए Aatma का स्वरूप मान कर शत्रु की हत्या को भी उचित ठहरा दिया गया।

अब यह कहना ज्यादा उचित होगा कि आत्मा का भ्रमजाल पूर्णताः धर्मग्रन्थों व धर्मगुरुओं का फैलाया हुआ है।

जीवन, मृत्यु व आत्मा को समझिए!

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अब ऐसा वक़्त आ गया है कि आत्मा का भ्रमजाल समझा व समझाया जाए। जिससे अंधविश्वासों को तिलांजलि देकर मृत्यु का निडरता से सामना किया जा सके। अगर आप वैज्ञानिक सच को स्वीकार कर थोड़ा चिंतन-मनन करके अपनी समझदानी में यह बात बैठा लें कि मेरी तरह हर इंसान हौले-हौले अपनी मृत्यु की तरफ बढ़ रहा है तो आपको सभी से प्रेम करने में ज्यादा आसानी होगी। वरना इस्लामी आतंकवादियों की तरह मृत्यु उपरांत जीवन की आशा में, जीवित लोगों को मारना अपना धर्म समझते रहेंगे।

गीता में आत्मा पर अन्तर्विरोध कैसा है?

गीता के वो श्लोक जो सबसे ज्यादा कोट किए जाते हैं। धर्मगुरुओं ने इन्हीं का सबसे ज्यादा प्रचार किया है, परन्तु गीता में भी आत्मा को लेकर अन्तर्विरोध है जो अपने आप में विरोधाभासी भी है। यह आपको कोई नहीं बताता है

गीता के Chapter: 2, Shloka: 22 में कहा गया है कि:

वासांसि जीर्णानि यथा विहाय, नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि।तथा शरीराणि विहाय जीर्णा, न्यन्यानि संयाति नवानि देही।।

भगवत गीता- 2.22

Hindi Meaning :- जैसे मनुष्य पुराने वस्त्रो को त्याग कर दुसरे नवीन वस्त्रो को ग्रहण करता है, वैसे ही जीवात्मा पुराने शरीर को त्याग कर दूसरे नवीन शरीर को ग्रहण करती है।

गीता के Chapter: 2, Shloka: 24 में कहा गया है कि:–

अच्छेद्योऽयमदाह्योऽयमक्लेद्योऽशोष्य एव च।
नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयं सनातनः।।

भगवत गीता- 2.24

Hindi Meaning :- आत्मा अच्छेद्य (काटी नहीं जा सकती), अदाह्य (जलायी नहीं जा सकती), अक्लेद्य (गीली नहीं हो सकती) और अशोष्य (सुखाई नहीं जा सकती) है। यह नित्य, सर्वगत, स्थाणु (स्थिर), अचल और सनातन है।

इस अन्तर्विरोध को समझिए!

पहले श्लोक 2.22 में कहा गया है कि Aatma पुराने शरीर को त्याग कर नए शरीर को ग्रहण करती है, परन्तु दूसरे श्लोक 2.24 में यह भी कहा गया कि आत्मा अचल है, Aatma सब में समाई हुई है, सर्वगत है। यह दोनों बातें एक साथ और एक ही वस्तु पर कैसे सत्य सिद्ध हो सकती हैं? जो अचल है, सर्वगत है, स्थिर है उसके एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाना कैसे संभव होगा?

उपनिषद में आत्मा का स्वरूप

कठोपनिषद के अध्याय 2> वल्ली 3> Verse 17 में कहा गया है कि:

अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषोऽन्तरात्मा सदा जनानां हृदये संनिविष्टः।

तं स्वाच्छरीरात्प्रवृहेन्मुञ्जादिवेषीकां धैर्येण।

तं विद्याच्छुक्रममृतं तं विद्याच्छुक्रममृतमिति ॥

कठोपनिषद: 2/3/17
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Hindi Meaning :- ”पुरुष, अन्तरात्मा, जो अङ्गुष्ठमात्र है, वह सदा प्राणियों के हृदय में आसीन है। ‘उसे’ अपने शरीर से उसी प्रकार धैर्यपूर्वक पृथक् करना चाहिये जैसे कोई मूँज से उसकी सीक को पृथक् करता है। ‘उसे’ तुम ‘तेजोमय’ ‘अमृत-तत्व’ जानो।”

वहीं दूसरे मुण्डकोपनिषद् के तृतीय मुण्डकः> प्रथम: खण्ड> Verse 9 में आत्मा को अणु के बराबर बताया गया है–

एषोऽणुरात्मा चेतसा वेदितव्यो यस्मिन्‌ प्राणः पञ्चधा संविवेश।

प्राणैश्चित्तं सर्वमोतं प्रजानां यस्मिन्‌ विशुद्धे विभवत्येष आत्मा॥

मुंडकोउपनिषद- 3/1/9

Hindi Meaning :- ‘आत्मा’ अणुवत् सूक्ष्म है तथा इसे विचारात्मक मन (चित्त) के द्वारा जाना जाता है जिसमें प्राण ने पञ्चविध प्रवेश किया है। प्राणियों का सचेतन मन (चित्त) प्राणों से ओत-प्रोत है जिसके विशुद्ध हो जाने पर ही यह ‘आत्मा’ अपनी शक्ति को अभिव्यक्त कर सकती है।

यदि आत्मा अंगूठे के बराबर है तो वह अणु के बराबर नहीं हो सकती, जो अणु के बराबर है वो अंगूठे के बराबर हरगिज नहीं हो सकती। आप धर्मगुरुओं से खुद पूछिये कि धर्मग्रन्थों में कैसा आत्मा का भ्रमजाल फैला हुआ है? ऐसे ‘ब्रह्मज्ञान’ को कोई भी free thinker कैसे मान सकता है? इसलिए कहना ही पड़ेगा कि यह सब एक ‘भ्रमजाल’ है।

अगर बहुत पहले आप आत्मा का भ्रमजाल क्या है? जैसे प्रश्न उठा कर इस बात को समझ लेते कि मृत्यु के बाद कुछ नहीं है, तो समाज के दबे-कुचले लोगों को न्याय की उम्मीद कहीं ज्यादा होती। क्योंकि मरने वाले और मारने वाले, दोनों में से किसी के पास भी मृत्यु के बाद ईश्वर से न्याय की उम्मीद न बचती। साथ ही स्वर्ग-नर्क मिलने की आशा भी न होती।

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