अध्यात्म का भ्रमजाल क्या है?

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Arpit Dwivedi
धर्मग्रंथ सब जला चुकी है, जिसके अंदर की ज्वाला। मंदिर-मस्जिद-गिरजे सब तोड़ चुका ये मतवाला।।
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जिस तरह किसी वस्तु को विक्रय हेतु नए-नए प्रलोभन गढ़े जाते हैं, उसी तरह तमाम Sugar coated शब्दों के रैपर में लपेट कर अध्यात्म का भ्रमजाल (spiritual meaning in hindi) में रचा जाता है। पुराने धार्मिकों को आध्यात्मिक बनाने के लिए यह बताया जाता है कि “अध्यात्म- आत्मा-परमात्मा, जीव, माया, जन्म-मृत्यु, पुनर्जन्म, सृजन-प्रलय की अबूझ पहेलियों को सुलझाने का प्रयास है”। अध्यात्म दर्शन है, चिंतन-धारा है, विद्या है, हमारी संस्कृति की परंपरागत विरासत है, ऋषियों, मनीषियों के चिंतन का निचोड़ है, उपनिषदों का दिव्य प्रसाद है।

इन शब्दों से (spiritual meaning in hindi) में रचा अध्यात्म का भ्रमजाल धार्मिकों को लुभाने का नया चलन शुरू कर देता है। पहले से धार्मिक स्त्री-पुरुष अब खुद को आध्यात्मिक (Spiritually) कहलाना पसंद करने लगते हैं। शायद उन्हें धार्मिक कहलाना अब थोड़ा Outdated लगने लगता है। जबकि आध्यात्मिक शब्द हाई क्लास और बुद्धिजीवी होने का अहसास कराता है।

अध्यात्म : धर्म के भ्रमजाल का आखरी हथकंडा

सामान्यतः एक आम धार्मिक व्यक्ति अपनी परम्पराओं और मान्यताओं के बारे में कभी कोई ठोस तर्क नहीं दे पाता। देता भी है तो वे बड़े बचकाने और खोखले होते हैं जो थोड़े से तर्क-वितर्क से स्वतः ढह जाते हैं।

जबकि खुद को आध्यात्मिक कहने वाले व्यक्तियों के पास अपनी मान्यताओं के पक्ष में भारी-भरकम और जटिल तर्क होते हैं जिसे उसने बड़े जतन से कुछ आध्यात्मिक गुरुओं के spiritual meaning in hindi प्रवचनों को पढ़कर अथवा सुनकर, या अपने धर्म/मत के पक्ष में लिखित तर्कशास्त्रों को पढ़कर या फिर वर्तमान में अत्यधिक प्रचलित प्रोपेगैंडा साहित्य को पढ़कर जमा किया होता है। आध्यात्मिक लोग धार्मिक लोगों को मान्यतावादी कहते हैं और स्वयं को मान्यताओं से मुक्त एक स्वतंत्र खोजी की तरह प्रस्तुत करते हैं।

ऐसा समझा जाता है कि धार्मिक व्यक्ति वह है जिसने धर्मगत आस्थाओं और परम्पराओं को बिना सोचे-विचारे ज्यों का त्यों स्वीकार कर लिया।

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जबकि आध्यात्मिक व्यक्ति उन्हें बिना जाने समझे नहीं स्वीकारता, परन्तु नकारता भी नहीं। बल्कि वह कुछ ऐसा कहता है कि वह इन आस्थाओं की सत्यता को खोजने का प्रयत्न कर रहा है। जब तक वह इनकी सत्यता अथवा असत्यता को स्वयं अनुभव नहीं कर लेता इनको स्वीकारा अथवा नकारा नहीं जा सकता। बात सुनने में तो काफी तार्किक प्रतीत होती है। किन्तु ऐसा कहने वाले लगभग सभी तथाकथित आध्यात्मिक व्यक्ति अपने जीवन में धार्मिक भ्रमजाल में फंसे पाए जाते हैं जो कोई सामान्य धार्मिक व्यक्ति करता है। इसके पीछे भी तर्क वही कि जब तक सत्य का पता न चले तो इनको नकारा भी नहीं जा सकता, अतः इनको करते रहने में कोई विशेष हानि नहीं।

यदि आप धर्मग्रंथों में लिखी अतार्किक और विरोधाभासी बातों पर चर्चा छेड़ें तो वे कहते हैं कि ये ग्रन्थ इनके रचयिता ने अनुभव के किसी विशिष्ट स्तर पर जाकर लिखे हैं, इनकी सत्यता को आंकने के लिए हमें उसी स्तर पर पहुंचना होगा। अनुभव के उस स्तर पर पहुंचे बिना इनका विरोध करना व्यर्थ है। वहीं कुछ लोग एक कदम बढ़कर ऐसा भी कहते पाए जाते हैं कि अनुभव के उस स्तर पर आपको इनमें किसी तरह की अतार्किकता अथवा विरोधाभास नहीं मिलेगा।

वो ईश्वर के अस्तित्व के सन्दर्भ में भी कुछ ऐसा ही तर्क देते हैं। वे कहते हैं कि ईश्वर में आस्था रखने वाले और ईश्वर में अनास्था रखने वाले दोनों ही गलत हैं। अर्थात आस्तिक और नास्तिक दोनों ही वास्तव में मान्यतावादी हैं। आस्तिक ने मान लिया है कि ईश्वर है और नास्तिक ने मान लिया है कि ईश्वर नहीं है। दोनों ही चूँकि बिना खोजे ही निष्कर्ष पर पहुँच गए हैं अतः दोनों ही कभी सत्य को नहीं जान सकेंगे।

मुझे नहीं पता इस तर्क का मूल प्रतिपादन कर्ता कौन है? लेकिन इसे सर्वप्रथम ओशो के प्रवचनों में सुना गया था। आज भी ओशो के अनुयायी इसी तर्क को दोहराते देखे जाते हैं। यह तर्क सुनने में तो बड़ा तार्किक प्रतीत होता है। यह धर्म से तलाक की अर्जी देने जा रहे व्यक्ति को घर-वापसी के लिए सोचने पर विवश कर देने की क्षमता रखता है। वास्तव में आध्यात्मिकों के सभी तर्क भले ही प्रथम दृष्टया बेहद तार्किक प्रतीत हों परन्तु सभी सिरे से आधारहीन हैं।

आइये देखें, कैसे?

ईश्वरीय अस्तित्व खोजने की सलाह

सर्वप्रथम ईश्वर के अस्तित्व के संदर्भ में दिए जाने वाले तर्क को ही ले लीजिये। इस तर्क में आस्तिक और नास्तिक दोनों को ही मान्यतावादी कहकर एक ही पड़ले में तौलने का प्रयास किया जाता है। यह तर्क नास्तिक, अनीश्वरवादी दर्शन पर आधारित धर्म के अनुयायियों के लिए तो उचित जान पड़ता है लेकिन वे लोग जो ईश्वर की अवधारणा की प्रमाणहीनता को समझकर नास्तिक हुए हैं उन पर यह तर्क सही नहीं बैठता। क्योंकि उनके द्वारा ईश्वर के अस्तित्व को नकारने का कोई आस्थागत कारण नहीं है बल्कि ईश्वर की अवधारणा के पक्ष में प्रमाणों का नितांत अभाव है। भला प्रमाणों के अभाव में किसी अवधारणा को कैसे स्वीकारा जा सकता है? लेकिन अब यहाँ कुछ लोग एक नया कुतर्क देते हैं कि ईश्वर के अस्तित्व के प्रमाण दिए नहीं जा सकते, प्रमाण आपको स्वयं खोजने होंगे।

प्रमाण खोजने का कुतर्क

यह तर्क कितना मूर्खतापूर्ण है जरा देखिये। दावा भी आप कर रहे हैं और प्रमाण खोजने के लिए उल्टा हमें कह रहे हैं। क्या ऐसा ही तर्क सभी अस्तित्वहीन काल्पनिक कथाओं के चरित्रों के बारे में नहीं दिया जा सकता? उदाहरण के तौर पर यदि मैं कहूँ कि परियों के अस्तित्व को स्वीकारने वाले और नकारने वाले दोनों ही गलत हैं क्योंकि दोनों ही बिना खोजे निष्कर्ष पर पहुँच गए हैं। परियों के अस्तित्व का प्रमाण दिया नहीं जा सकता, यह आपको स्वयं ही खोजना होगा। यही तर्क उड़ने वाले घोड़ों, फरिश्तों और हर उस चीज के सन्दर्भ में दिया जा सकता है जिसका अस्तित्व सिर्फ मनुष्य की कल्पनाओं में है।

यदि कोई, ऐसी किसी चीज की खोज में लग जाए जिसका वास्तविकता में कोई अस्तित्व न हो तो क्या उसकी खोज कभी किसी निष्कर्ष पर पहुँच पायेगी? ऐसी खोज के किसी निष्कर्ष पर पहुँचने के लिए ब्रह्माण्ड की आयु भी शायद कम पड़ जाये, क्योंकि जिसका कोई अस्तित्व ही न हो उसके होने न होने के बारे में आपको कभी कोई सुराग नहीं मिलेगा, भले ही आप उसकी खोज में अपना जीवन ही क्यों न न्योछावर कर दें।

अध्यात्म, क्या स्वतंत्र खोज पद्धति है?

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अध्यात्म का भ्रमजाल जिसे एक स्वतंत्र खोज पद्धति की तरह प्रस्तुत किया जाता है, बस ऐसी ही खोज है। लेकिन आध्यात्मिक व्यक्ति इसे चुनौती की तरह लेते हैं। यद्धपि यह अत्यंत मूर्खतापूर्ण व बकवास बात है। वे कहते हैं कि यह खोज उन्हीं के लिए है जो जिन्दगी की बाजी लगाने को तैयार हैं। इस तरह वे अपने को एक जांबाज की तरह प्रस्तुत करने का प्रयास करते हैं जिसने ईश्वर की खोज में जीवन की बाजी लगा दी है।

वास्तव में देखा जाए तो ईश्वर का अस्तित्व है, अथवा नहीं यह प्रश्न ही गलत है। सही प्रश्न यह है कि “ब्रह्माण्ड अस्तित्व में कैसे आया?” ईश्वर तो इस सवाल का जवाब पाने की चेष्टा में गढ़ी गई एक अवधारणा है जो मात्र मानवीय कल्पनाओं की उपज है। अब यदि कोई किसी कल्पना को खोज का विषय बनाएगा तो भला वह क्या कभी किसी निष्कर्ष पर पहुँच सकता है?

क्या धर्मग्रंथो का ज्ञान विशिष्ट स्तर पर मिलता है?

अब ठीक इसी तरह आप धर्मग्रंथों के बारे में दिए गए तर्कों को भी ले सकते हैं। वहां भी आपको धर्मग्रंथों के बारे में कोई फैसला सुनाने से रोकने की कोशिश की जा रही है। तर्क दिया जा रहा है कि अनुभव की किसी विशिष्ट अवस्था पर पहुंचकर ही इनकी सही व्याख्या की जा सकती है। यानि यहाँ भी अध्यात्म का भ्रमजाल और उल्टे हमसे उम्मीद की जा रही है कि आप अनुभव की उस परम अवस्था (जिसके होने का कहीं कोई प्रमाण नहीं है!) के लिए अपने जीवन की बाजी लगा दें तभी हमको इन का सार पल्ले पड़ेगा। जब तक हमको इनमें जरा सी भी अतार्किकता दिख रही है तो इसका मतलब हम अभी अनुभव के उस स्तर पर नहीं पहुंचे हैं।

मतलब धर्मग्रन्थ गलत नहीं हैं, हम ही गलत हैं जो उन्हें समझ नहीं पा रहे। धर्मग्रंथों को सही ढंग से समझने के लिए उस तथाकथित अनुभव के घटित होने का इन्तजार करने के अतिरिक्त हमारे पास कोई चारा नहीं है। जाहिर है यहाँ भी ईश्वर की खोज की तरह ही एक काल्पनिक अवस्था जिसके होने का कोई प्रमाण नहीं है, को खोज का विषय बनाया गया है। ऐसे में यह कहना गलत नहीं होगा कि ये खोज भी कभी किसी निष्कर्ष पर पहुँचने वाली नहीं है।

अब थोड़ा ठहर कर उन लोगों की मानसिक स्थिति के बारे में भी विचार कीजिये जो ऐसी मूर्खतापूर्ण बातों पर विश्वास करके बैठे हैं और spiritual meaning in hindi में अध्यात्म का भ्रमजाल को ही विज्ञान के ही समकक्ष एक तर्कपूर्ण खोज पद्धति समझकर स्वयं के एक स्वतंत्र खोजी होने का भ्रम पालकर बैठे हैं। क्या आपको वास्तव में लगता है कि ऐसे लोग स्वतंत्र खोजी हैं? जो धार्मिक मान्यताओं से निरपेक्ष होकर खोज कर रहे हैं?

यदि आप सूक्ष्मता से निरीक्षण करेंगे तो पायेंगे कि ये सभी वास्तव में धर्मभीरु लोग हैं। क्योंकि ऐसी खुली चालबाजी को वही नजरअंदाज कर सकता है जिसकी अपने धर्म में गहरी आस्था हो। आस्था आपको मूर्खतापूर्ण तर्कों पर भी विश्वास करने पर राजी कर सकती है बशर्ते वे आपकी धार्मिक मान्यताओं की किसी प्रकार रक्षा करते हों।

यही नहीं ऐसे लोग तमाम पूर्वाग्रही भ्रमजाल अपने साथ लिए चलते हैं। जैसे कोई ब्रह्म है जिसका हमें साक्षात्कार करना है। ब्रह्म ही सत्य है, और यह जगत मिथ्या है। सत्य पर माया का पर्दा है। परम ब्रह्म के साक्षात्कार से यह पर्दा हट जाता है और व्यक्ति को अपने असली स्वरुप का बोध होता है, इत्यादि…! इत्यादि…!

मस्तिष्क के मतिभ्रम को समझिए!

क्या कोई स्वतंत्र खोज इतने पूर्वाग्रहों को साथ लेकर होती है? इतने पूर्वाग्रहों को लेकर यदि कोई लम्बे समय तक ध्यान करता है तो बहुत सम्भावना है कि एक समय उसका मस्तिष्क इन सभी को साकार कर दे। गहरा ध्यान हमको ट्रांस की अवस्था में ले जाता है। ये सम्मोहन की अवस्था जैसी ही होती है। इस अवस्था में मस्तिष्क किसी भी विचार को आसानी से स्वीकार लेता है। इस अवस्था में स्वीकार किए गए विचार आगे चलकर मतिभ्रम (Hallucination) को जन्म देते हैं। जिन्हें साधक द्वारा अध्यात्मिक अनुभव समझ लिया जाता है।

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अध्यात्म का भ्रमजाल असल में धर्म spiritual meaning in hindi के ही एक रिसायकल मेकेनिज्म जैसा ही है। जो लोग थोड़ा अध्ययनशील होते हैं परिपक्क्वता के स्तर पर आकर धर्म के दावों की प्रमाणहीनता का बोध उनकी आस्था को झकझोरने लगता है। तभी अध्यात्म का भ्रमजाल उन्हें घेर लेता है।

कुछ वैसे ही जैसे अपना मोबाइल नंबर पोर्ट करवाने पर सर्विस प्रोवाइडर कम्पनी के मार्केटिंग डिपार्टमेंट से ऑफर आने लगते हैं। अरे कहाँ जाने की सोच रहे हो? किस पर संदेह कर रहे हो? अपने पैतृक धर्म पर? वही धर्म जिसके साथ आपने इतने वर्ष गुजारे। इतने निष्ठुर न बनो। अपने पैतृक धर्म को तुमने इतना कमजोर समझा है? प्रमाण की बात है न? हाँ तो मिल जाएगा प्रमाण। इस में ऐसी कौन सी बड़ी बात है? तुमने अभी खोजा ही कहाँ जो मिल जाए? पहले खोजो तो सही। खोजने पर भी न मिले तब बात करना। तुम तो बिना खोजे ही चलने का मूड बना लिए। आओ खोजें। अब ‘अंधे को क्या चाहिए दो आंखें’।

धार्मिक लोग वैसे भी अपनी आस्थाओं को डूबने से बचाने के लिए तिनके का सहारा खोजते रहते हैं। कोई भी व्यक्ति जिसकी अपने धर्म में गहरी आस्था हो उसे यह बात एकदम जंच जाती है। और इस तरह संदेह के शूल का चतुराई पूर्वक शमन करके व्यक्ति को पुनः उसी मूर्खता में धकेल दिया जाता है।

जितने भी तथाकथित आध्यात्मिक गुरु हुए हैं उनके आस-पास आपको ज्यादातर पढ़े-लिखे लोग ही मिलेंगे, कम पढ़े-लिखे लोग ज्यादातर आपको कथावाचकों के पंडालों में ताली पीटते नजर आयेंगे। वर्तमान में सद्गुरु जग्गी वासुदेव इसका बेहतरीन उदाहरण हैं। ये सभी वही लोग हैं जो अपनी डांवाडोल धार्मिक आस्थाओं को एक मजबूत आधार प्रदान करने के प्रयास में लुभावने तर्कों के जाल में फंसकर ऐसे गुरुओं तक पहुँचते हैं।

देखा जाये तो आध्यात्मिकता कुछ और नहीं, बस थोड़े से बेहतर कुतर्कों से सुसज्जित spiritual meaning in hindi अध्यात्म का भ्रमजाल है जो निरी धार्मिकता ही होती है। आध्यात्मिक लोग भले ही स्वयं को स्वतंत्र खोजी मानें लेकिन वास्तव में वे स्वयं को धोखा देने में आम धार्मिक लोगों से थोड़ा ज्यादा कुशल मात्र हो गए हैं।

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