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क्या आप भी पशुबलि के खिलाफ हैं?

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DG
जो धर्म डराए, जो किताब भ्रम पैदा करे, उसमें शिद्दत से सुधार की जरूरत है!

Bali pratha in Hindi: यह सर्वविदित सत्य है कि किसी भी जीव को चाहे वह इंसान हो या जानवर, जीवित रहने का मौलिक अधिकार है। सभी धर्मों में Bali Pratha या किसी धार्मिक परम्परा या अनुष्ठान की आड़ में पशु बलि (Animal Sacrifice) जीव के प्राण लेने का अधिकार किसी को नहीं।

लेकिन Animal Sacrifice in Hinduism यानि Bali Pratha ऐसी ही एक अंधविश्वास से भरी परम्परा है जिसमें किसी भी पशु चाहे वह गाय, भैंस या बकरा हो। इस उम्मीद से बलि दे दी जाती है कि उस पशु को अल्लाह या देवता पर अर्पित करने से वे प्रसन्न हो जाएंगे तथा बलि चढ़ाने वाले की सारी इच्छाएँ पूरी हो जाएगी।

क्या पशुबलि सिर्फ एक मृग मरीचिका है?

अपनी मृगतृष्णा की पूर्ति के लिए Animal Sacrifice की यह प्रथा आपको विचित्र व अजीब नहीं लगती? अपने लाभ के लिए किसी दूसरे की जान लेकर उसके खून की धार बहा कर, उसके मांस के टुकड़ों को उदरस्थ कर ही क्या कोई अनुष्ठान पूरा होता है? या ईश्वर के किसी भी स्वरूप को प्रसन्न किया जा सकता है? अथवा इच्छाएँ पूर्ण की जा सकती है? या यह सिर्फ मृग मरीचिका है? क्या ऐसी क्रूरता जिसे कोई भी सहृदय इंसान पसंद नहीं कर सकता तो उसे भला दया के सागर माने जाने वाले ईश्वर कैसे स्वीकार करेंगे?

क्या आपको पशुबलि का दृश्य वीभत्स नहीं लगता?

पशुबलि (Animal Sacrifice) के संबन्ध में एक ऐसा वीभत्स दृश्य प्रत्यक्षदर्शियों के सामने होता है जिसमें एक निरीह पशु चाहे वह भैंस, गाय, या बकरा हो उसे खींच कर, धकेल कर ऐसे स्थान पर ले जाया जाता है जिसे कथित रूप से पवित्र माना, धार्मिक है। प्राणरक्षक स्थल है लेकिन वही इन पशुओं के लिए न पवित्र है, न ही धार्मिक और न ही प्राण रक्षक बल्कि प्राणघातक, एक मासूम पशु को बलि वेदी पर ले जाकर उसे नहला-धुला कर साफ किया जाता है। मिठाई खिलाई जाती है तथा अगले ही पल धारदार हथियार से उसका सिर धड़ से अलग कर दिया जाता है, उसके खून को बलिवेदी के पास खड़ी देव प्रतिमा पर अर्पित किया जाता है।

ऐसी बर्बर हत्या को परम्परा का जामा पहना कर पशु के शरीर को प्रसाद के रूप में वितरित कर दिया जाता है। खून, चीखें, गोश्त, गड़ासा, तड़पता हुआ धड़ एक अजीब वीभत्स दृश्य प्रस्तुत करते हैं।

इसी प्रकार Bakrid में भी प्रतिवर्ष लाखों निरीह पशुओं की जान चली जाती है।

जबकि हर धर्म यह बार-बार दोहराता है कि हर जीव में ईश्वर का अंश है वह चाहे पशु हो, पक्षी हो या फिर इंसान, ईश्वर कि नज़र में सब बराबर है, फिर भला अपने ही अंश को मार देने से ईश्वर कैसे प्रसन्न होता है? शरीर के किसी अंग को खत्म करने से बाकि शरीर कैसे खुश रह सकता है?

हिंसा मनुष्य का मूल स्वभाव नहीं है। आदि मानव असभ्य भले ही रहा हो लेकिन वह जंगल में रहते हुए भी पशुओं का वध सिर्फ दो ही कारणों से ही करता था। एक तो अपने बचाव के लिए तथा दूसरा अपनी भूख मिटाने के लिए। वह भी तब जब उसके पास खाने-पीने, भोजन के लिए विकल्प नहीं थे। (यहां तक जंगली जानवर भी भूखे न रहने पर अन्य जानवरों का शिकार नहीं करते) लेकिन जब उसने पशुओं के साथ रहना सीख लिया, उन्हें पालने लगा, कृषि, व्यवसाय, परिवहन, दूध वगैरह के लिए उपयोग करने लगा, तब उस ने उन्हें अपना साथी मान लिया तथा उनका पालन व सुरक्षा भी करने लगा।

लेकिन जैसे-जैसे वह सभ्य हुआ उस में संग्रह की प्रवृति बढ़ी, लोभ बढ़ा, विभिन्न प्रकार के कर्मकांड, उपासना पद्धतियाँ बनी। प्राकृतिक आपदाओं, महामारियों, रोगों से प्राण रक्षा के लिए झाड़-फूंक, तंत्र-मंत्र, भूत-प्रेत की मान्यताएं, टोने-टोटकों पर विश्वास करने लगा विभिन्न अनुष्ठानों व पशुबलि, नरबलि जैसी क्रूर परम्परायें बनी।

पशुबलि (Animal Sacrifice) के कारणों में धार्मिक आस्था या अंधविश्वास, लोभ या स्वार्थ सिद्धि की कामना चाहे वह सिद्धि प्राप्त करने के लिए हो या गड़ा धन प्राप्त करने के लिए या औलाद प्राप्ति की आकांक्षा हो। तो कभी बीमारियों को ठीक करने के लिए।

पशुबलि जैसी हिंसक परम्परा धार्मिक कैसे हो सकती है?

कुछ लोग धार्मिक कारणों से Bali Pratha या पशुबलि (Animal Sacrifice) को जायज़ ठहराते हैं। तो कुछ परम्परा का हवाला भी देते हैं।

जबकि इस सम्बंध में सभी धर्मों व धर्माचार्यों का स्पष्ट मत है। स्वामी महावीर जी की मूल शिक्षा है-

‘अहिंसा परमो धर्मः’

अहिंसा से बड़ा कोई धर्म नहीं है। भगवान महावीर ने अपनी वाणी से और अपने स्वयं के जीवन से इसे वह प्रतिष्ठा दिलाई कि अहिंसा के साथ भगवान महावीर का नाम ऐसे जुड़ गया कि दोनों को अलग कर ही नहीं सकते। तो भला Bali Pratha जैसी हिंसक परम्परा धार्मिक कैसे हो सकती है? गौतम बुद्ध ने तो अनेक स्थानों पर अहिंसा पर ही ज़ोर दिया है। उन्होने कहा कि “मारने वाले से बचाने वाला बड़ा होता है!

Against Animal sacrifice in Vedas

हिंदुओं के पवित्र माने जाने वाले ग्रन्थ श्रीमद्भगवद गीता के सत्रहवें अध्याय के चौथे श्लोक में कहा गया है कि-

यजन्ते सात्त्विका देवान्यक्षरक्षांसि राजसाः।
प्रेतान्भूतगणांश्चान्ये यजन्ते तामसा जनाः ॥4॥

श्रीमद्भगवद गीता 17/4

अर्थात:– ऐसी निम्न स्तर की पूजा, श्रद्धा व कार्य जिससे किसी दूसरे प्राणी को पीड़ा या नुकसान पहुंचे या उसकी जान चली जाए, तामसी श्रद्धा या अंधश्रद्धा है। तथा यह भी कि ऐसी श्रद्धा से किसी का कल्याण नहीं होता यह ईश्वर को स्वीकार नहीं है।

“मा नो गोषु मा नो अश्वेसु रीरिष:।”

ऋग्वेद 1/114/8

अर्थात:– हमारी गायों और घोड़ों को मत मारो।

“इममूर्णायुं वरुणस्य नाभिं त्वचं पशूनां द्विपदां चतुष्पदाम्।
त्वष्टु: प्रजानां प्रथमं जानिन्नमग्ने मा हिश्सी परमे व्योम।।”

यजुर्वेद 13/50

अर्थात:– ”ऊन जैसे बालों वाले बकरी, ऊंट, चौपायों और पक्षियों आदि दो पग वालों को मत मारो!”

“न कि देवा इनीमसि न क्या योपयामसि।
मन्त्रश्रुत्यं चरामसि”।।

सामवेद-2/7

अर्थात:– ”देवों! हम वेद मंत्र के आदेशानुसार आचरण करते हैं। हिंसा नहीं करते और न ही ऐसा अनुष्ठान करते हैं!

वेदों में इस तरह के सैकड़ों मंत्र और ऋचाएं हैं जिन के द्वारा यहां सिद्ध किया जा सकता है कि हिन्दू धर्म में Bali Pratha का निषेध है, यह प्रथा हिन्दू धर्म का हिस्सा कभी नहीं थी। इसलिए आज जो भी बलि प्रथा का समर्थन करता है, वह धर्मविरुद्ध असुर और दानवी आचरण करता है।

ग्रामीण अंचल में शिक्षा का उचित प्रचार-प्रसार नहीं होने से स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता नहीं पनप पायी है। ऐसे लोग बीमार पड़ने पर बैगा, गुनिया के पास जाते हैं जो सभी बीमारियों को जादू-टोने, नज़र लगने के कारण बता कर उनसे बीमारी ठीक करने के लिए मुर्गे, बकरे, दारू की मांग करता है, बलि देता है। मनोरोग से पीड़ित मनुष्य को भूत-प्रेत, जिन्न पीड़ित बता कर बैगा, सिरहा लोग बीमार मनुष्य के शरीर से भूत, उतारने के नाम पर पशुबलि करवाते हैं।

आज भी विभिन्न कारणों से ग्रामीण अंचलो की जन-जातियों में बलि की परम्परा विद्यमान है।

गड़ा खज़ाना ढूँढने व बिना मेहनत के अमीर बन जाने की कामना भी पशुबलि का कारण है। कुछ समय पूर्व जयपुर के पास ख़जाना पाने के लोभ में बीस नख वाला कछुआ पाने व बलि देने के चक्कर में दो व्यक्तियों की मौत हो गयी थी। तांत्रिक सिद्धि पाने के लिए मोर व भैंसा की बलि की घटनाएँ भी प्रकाश में आती रहती हैं।

दक्षिण भारत में कुछ प्रसिद्ध स्थल, पश्चिम बंगाल, कामाख्या, वाराणसी सहित छत्तीसगढ़ में भी पशुबलि के अनेक स्थानों पर पशुबलि सामाजिक कार्यकर्ताओं के प्रयास से बंद हुई है। लेकिन बस्तर, चम्पा, चंद्रपुर, तुरतुरिया, रायगढ़ सहित कुछ स्थानों पर अब भी परम्पराओं के निर्वाह के नाम पर जारी है। पशुबलि को रोकने के लिए दक्षिण भारत के कुछ राज्यों में जैसे राजस्थान, गुजरात, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ में एक केन्द्र शासित प्रदेश पाण्डिचेरी में पशुबलि निषेधक कानून है लेकिन जन जागरण के अभाव में ये कानून प्रभावी नहीं हो पा रहे हैं। पण्डित मदनमोहन मालवीय ने तो कलकत्ता के काली मंदिर के सामने सभा कर के पशुबलि को अधार्मिक व गैर-जरूरी कहा था। महात्मा गांधी ने भी कहा है कि हिंसा मिथ्या है, अहिंसा सत्य है। अहिंसा के बिना मनुष्य पशु से बदतर है। कुछ जगहों पर लोग पशुबलि (Animal Sacrifice) को अनुष्ठान व तप का आवश्यक अंग मानते हैं।

लेकिन गीता के सत्रहवें अध्याय के चौदहवें श्लोक में यह पुनः कहा गया है कि- अहिंसा पवित्रता, सरलता ही श्रेष्ठ तप है जबकि व्यर्थ की हिंसा त्याज्य है।

फिल्मों में भी पशुबलि का विरोध

एक हिन्दी फ़िल्म थी, Veer (2010)। इस फ़िल्म में पशुबलि (Animal Sacrifice) के लिए बकरे की गर्दन काटने के बजाए उसके गले की रस्सी काटकर उसे आज़ाद कर देने का एक दृश्य था। जिसने भी फ़िल्म में ये दृश्य देखा था उसने उस समय वाह-वाह जरूर किया था। ऐसा ही एक सीन “बाहुबली: द बिगनिंग (2015)” के पहले भाग में भी है जिसमें प्रभास ने पशुबलि (Animal Sacrifice) के जानवर की बलि देने से इनकार कर दिया। और अपने हाथ का रक्त देवी माँ को अर्पित करके कहा कि:-

“देवी माँ को खुश करना है, तो किसी निर्दोष की बलि क्यों? मेरा उबलता रक्त समर्पित है!”

Bahubali: The Beginning – (2015)

इस दृश्य पर भी काफ़ी देर तक सिनेमा हाल सीटियों और तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा था।

बलि प्रथा या कुर्बानी का बचाओ न करें!

आदिमानव काल या वैदिक काल का हवाला देकर लोग कितना भी बलि प्रथा और कुर्बानी को चाहे जितना Defend करने की कोशिश कर लें। मगर एक बात तो तय है कि ना तो ये आदिमानव काल है ना ही वैदिक काल। आज दुनिया काफी आगे बढ़ चुकी है तो यहां कम से कम धर्म के नाम पर बलि देना अमानवीयता ही होगी। धर्म विशेष में तो Qurbani का और भी क्रूर और वीभत्स रूप है। जिसमें निरह जानवर को धीरे-धीरे बड़ी बेरहमी से जीबह किया जाता है जिसे हलाल करना कहते हैं और ये तब और खेद पूर्ण हो जाता है जब ये काम बच्चों की मौजूदगी में किया जाता है। ये हलाल करने की प्रक्रिया ही हराम लगती है।

असल में क्या है, कि जो चीजें समाज में स्वीकार्य नही होती है, उसे लोग अक्सर धर्म का लबादा पहना कर अपना हित साध लेते हैं। देवताओं के नाम पर पशुबलि (Animal sacrifice) करना, शराब चढ़ाना इसी का एक हिस्सा है। 

मैं ऐसी हास्यास्पद प्रथा के खिलाफ हूं और आप?

मनोकामना पूर्ति के लिये देवी-देवताओ को Bali Pratha के नाम पर पशु बलि चढ़ाना आज के युग में तो बेहद हास्यास्पद है। भला बताइये कि कौन सा देवी-देवता ऐसा होगा जो अपने ही द्वारा सृजित किये गए एक प्राणी से कहेगा कि तुम उसके द्वारा ही सृजित दूसरे प्राणी की मुझे कुर्बानी दे दो। ऐसी कौन सी माँ होगी जो अपने एक बच्चे से कहे कि- “तुझे अगर अपनी मुराद पूरी करवानी हो, तो मेरे दूसरे बच्चे को मार दो”।

ईश्वर-अल्लाह को खुश करना बेवकूफ़ी है!

किसी भी प्रकार की हिंसा चाहे वह धर्म के नाम पर, परम्पराओं के नाम पर अपनी स्वार्थसिद्धि के नाम पर हो, त्याग देना चाहिए। अपने लोभ का बलिदान करना चाहिए। सिर्फ जीभ के स्वाद या भगवान के नाम पर जानवरों को मारना सभ्य समाज की निशानी कदापि नहीं हो सकती। आज ईश्वर को खुश करना एक बेवकूफ़ी ही मानी जाएगी क्योंकि ईश्वर अगर है तो वो भी उसकी चीख़ से खुश नही होगा, उसे भी दर्द ही होगा। मनुष्य Bali Pratha के नाम पर एक बेकसूर पशु की बलि देने के बदले अपने अंदर के पशुता की बलि देना चाहिए।

Bali Pratha – Check out this scene from the movie VEER
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