बकरीद पर कुर्बानी का भ्रमजाल क्या है?

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2021 में Eid ul-Adha आने वाला है। प्रचलित Islam को मानने वाले दुनिया भर के मुसलमान आज भी जानवरों की बलि देते हैं। जिसे हम-आप Qurbani के नाम से जानते हैं। Islam में इस परंपरा के पीछे क्या किवदंती है? क्या है बकरीद पर कुर्बानी का भ्रमजाल? आने वाले Bakra eid के मौके पर इसे विस्तार से समझते हैं।

कुर्बानी का भ्रमजाल | मान्यता क्या कहती है?

‘पैग़ंबर हज़रत इब्राहीम को बहुत समय से बच्चे नहीं हो रहे थे। मगर जब उन्होंने अल्लाह से दुआ की तो उनके यहां बेटे इस्माइल ने जन्म लिया। जब इस्माइल तेरह बरस के हुए, उस समय इब्राहीम की उम्र निन्नानबे (99) साल थी। कहते हैं इब्राहीम को एक सपना आया जिसमें ‘ख़ुदा’ ने उनसे अपनी सबसे प्यारी ‘वस्तु’ को समर्पित/क़ुर्बान करने के लिए बोला। जिसके बाद इब्राहीम ने अपने सबसे प्यारे बेटे ‘इस्माइल’ को क़ुर्बान करने को सोचा।

कथा आगे कहती है कि Qurbani के वक़्त जब इब्राहीम अपनी और अपने बेटे की आंखों पर पट्टी बांध कर उसकी गर्दन पर छुरी चलाने ही वाले होते हैं, तभी एक फ़रिश्ता वहां से ‘इस्माइल’ को हटा कर उसकी जगह पर एक ‘भेड़’ रख देता है, जिसे इब्राहीम अपना बेटा समझ कर काट देते हैं। बाद में अल्लाह कहता है कि वो उनका इम्तिहान ले रहा था। वो इब्राहीम की Qurbani को स्वीकार कर लेता है।

धारणा Vs परम्परा

Islam के मानने वाले Eid ul adha के दिन पैग़ंबर इब्राहीम द्वारा दी गयी उसी Qurbani की पुनरावृत्ति करेंगे। वो यह नहीं जानते कि यह धारणा Islam आने के बाद ‘बनाई’ गई है। Bakra Eid जैसी किसी ‘परम्परा’ का ज़िक्र कुरान में कहीं नहीं है। कि इस वजह से पहले के लोग Qurbani करते थे। और न ही क़ुरान ये कहता है कि ‘दुनिया के सारे’ मुसलमान इस दिन ‘जानवर’ क़ुर्बान करें। दरअसल कुर्बानी का भ्रमजाल यह है कि क़ुरान जिस Qurbani का ज़िक्र करता है वो अरब में बहुत पहले से प्रचलित थी। जिसे बाद में इस्लाम का हिस्सा बना दिया गया।

अरब में Qurbani इस्लाम के आने के बहुत पहले से ही प्रचलन में थी। इस्लाम से पहले अरब के लोग हज की समाप्ति पर देवी की मूर्ति के आगे एक जानवर क़ुर्बान करते थे। उस समय इस परंपरा का ‘इब्राहीम’ और उनके बेटे ‘इस्माइल’ से कोई सम्बन्ध न था। हज की समाप्ति पर ये परंपरा सिर्फ और सिर्फ देवी को प्रसन्न करने के लिए की जाती थी, ये ज्ञात रहे कि हज की परंपरा भी इस्लाम के पहले से ही थी। बाद में भी इसे इस्लाम में शामिल कर लिया गया।

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Book: Gospel of John
John 3:16 in the print edition of King James Version (Book: Gospel of John)
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