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Qurbani in Islam | क्या है बकरीद पर कुर्बानी का भ्रमजाल?

क्या है बकरीद पर कुर्बानी का भ्रमजाल? आइये आने वाले Bakra Eid के मौके पर इसे विस्तार से समझते हैं।

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2022 में भी Eid ul-Adha आने वाला है। प्रचलित Islam को मानने वाले दुनिया भर के मुसलमान आज भी जानवरों की बलि देते हैं। जिसे हम-आप Qurbani के नाम से जानते हैं। Qurbani in Islam की इस परंपरा के पीछे क्या किवदंती है? क्या है बकरीद पर कुर्बानी का भ्रमजाल? आइये आने वाले Bakra Eid के मौके पर इसे विस्तार से समझते हैं।

Qurbani in Islam – मान्यता क्या कहती है?

‘पैग़ंबर हज़रत इब्राहीम को बहुत समय से बच्चे नहीं हो रहे थे। मगर जब उन्होंने अल्लाह से दुआ की तो उनके यहां बेटे इस्माइल ने जन्म लिया। जब इस्माइल तेरह बरस के हुए, उस समय इब्राहीम की उम्र निन्नानबे (99) साल थी। कहते हैं इब्राहीम को एक सपना आया जिसमें ‘ख़ुदा’ ने उनसे अपनी सबसे प्यारी ‘वस्तु’ को समर्पित/क़ुर्बान करने के लिए बोला। जिसके बाद इब्राहीम ने अपने सबसे प्यारे बेटे ‘इस्माइल’ को क़ुर्बान करने को सोचा।

कथा आगे कहती है कि Qurbani के वक़्त जब इब्राहीम अपनी और अपने बेटे की आंखों पर पट्टी बांध कर उसकी गर्दन पर छुरी चलाने ही वाले होते हैं, तभी एक फ़रिश्ता वहां से ‘इस्माइल’ को हटा कर उसकी जगह पर एक ‘भेड़’ रख देता है, जिसे इब्राहीम अपना बेटा समझ कर काट देते हैं। बाद में अल्लाह कहता है कि वो उनका इम्तिहान ले रहा था। वो इब्राहीम की Qurbani को स्वीकार कर लेता है।

इस्लाम में कुर्बानी – धारणा Vs परम्परा

Qurbani in Islam के मानने वाले Eid ul adha के दिन पैग़ंबर इब्राहीम द्वारा दी गयी उसी Qurbani की पुनरावृत्ति करेंगे। वो यह नहीं जानते कि यह धारणा Islam आने के बाद ‘बनाई’ गई है। Bakra Eid जैसी किसी ‘परम्परा’ का ज़िक्र कुरान में कहीं नहीं है। कि इस वजह से पहले के लोग Qurbani करते थे। और न ही क़ुरान ये कहता है कि ‘दुनिया के सारे’ मुसलमान इस दिन ‘जानवर’ क़ुर्बान करें। दरअसल कुर्बानी का भ्रमजाल यह है कि क़ुरान जिस Qurbani का ज़िक्र करता है वो अरब में बहुत पहले से प्रचलित थी। जिसे बाद में इस्लाम का हिस्सा बना दिया गया।

अरब में Qurbani इस्लाम के आने के बहुत पहले से ही प्रचलन में थी। इस्लाम से पहले अरब के लोग हज की समाप्ति पर देवी की मूर्ति के आगे एक जानवर क़ुर्बान करते थे। उस समय इस परंपरा का ‘इब्राहीम’ और उनके बेटे ‘इस्माइल’ से कोई सम्बन्ध न था। हज की समाप्ति पर ये परंपरा सिर्फ और सिर्फ देवी को प्रसन्न करने के लिए की जाती थी, ये ज्ञात रहे कि हज की परंपरा भी इस्लाम के पहले से ही थी। बाद में भी इसे इस्लाम में शामिल कर लिया गया।

ईद उल-अज़हा की परंपरा यहूदियों व ईसाइयों का कॉपीराइट कैसे है?

Book: Gospel of John
John 3:16 in the print edition of King James Version (Book: Gospel of John)
यहूदी व ईसाई मतानुसार अब्राहम ने अपने बेटे इस्हाक़ या आइजैक की कुर्बानी दी थी। जबकि मुस्लिम मानते हैं कि उन्होंने अपने बेटे इस्माइल की कुर्बानी दी थी।

इस्हाक़ यहूदियों के पूर्वज थे। चूंकि जीसस भी जन्म से यहूदी थे, इसलिए इस्हाक़ ईसाइयों के भी पूर्वज हो जाते हैं। बाईबल के चैप्टर विश्वास की परीक्षा में इसका उल्लेख कुछ यूं है।

अब्राहम ने अपने बेटे इसहाक को यहोवा से प्यार करना और उसके सभी वादों पर भरोसा रखना सिखाया। मगर जब इसहाक करीब 25 साल का था तो यहोवा ने अब्राहम से एक ऐसा काम करने के लिए कहा जो बहुत मुश्‍किल था। वह काम क्या था?

परमेश्‍वर ने अब्राहम से कहा, “तू अपने इकलौते बेटे को मोरिया देश ले जा और वहाँ एक पहाड़ पर उसकी बलि चढ़ा”। अब्राहम को बिलकुल भी पता नहीं था कि यहोवा ने क्यों ऐसा करने के लिए कहा। फिर भी उसने यहोवा की बात मानी।

अगले दिन सुबह-सुबह अब्राहम ने अपने साथ इसहाक और दो सेवकों को लिया और मोरिया देश की तरफ निकल पड़ा। तीन दिन बाद उन्हें दूर से वह पहाड़ दिखायी दिया। अब्राहम ने अपने सेवकों से कहा कि वे वहीं रुकें। आगे वह इसहाक को लेकर बलिदान चढ़ाने जाएगा। अब्राहम ने एक चाकू लिया और इसहाक से कहा कि वह कुछ लकड़ियाँ उठा ले। इसहाक ने अपने पिता से पूछा, “बलिदान चढ़ाने के लिए जानवर कहाँ है?” अब्राहम ने कहा, “बेटा, वो यहोवा देगा”।

जब वे चलते-चलते पहाड़ पर पहुँचे तो उन्होंने वहाँ एक वेदी बनायी। फिर अब्राहम ने इसहाक के हाथ-पैर बाँधे और उस वेदी पर लिटा दिया। फिर अब्राहम ने हाथ में चाकू लिया। वह इसहाक को मारने ही वाला था कि यहोवा के स्वर्गदूत ने स्वर्ग से पुकारा, “अब्राहम! लड़के को मत मार! अब मैं जान गया हूँ कि तुझे परमेश्‍वर पर विश्‍वास है क्योंकि तू अपने बेटे  की बलि चढ़ाने के लिए भी तैयार हो गया”। तब अब्राहम ने देखा कि वहाँ एक मेढ़ा है जिसके सींग झाड़ियों में फँसे हैं। उसने जल्दी से इसहाक के हाथ-पैर खोल दिए और उसके बदले मेढ़े की बलि चढ़ायी।

उस दिन से यहोवा ने अब्राहम को अपना दोस्त कहा। जानते हो क्यों? क्योंकि यहोवा ने अब्राहम से जो भी कहा उसने वही किया। उसने तब भी यहोवा की बात मानी जब उसे समझ नहीं आया कि यहोवा ने ऐसा क्यों कहा।

अब अब्राहम, इसहाक के हाथ-पैर खोल रहा है। यहोवा ने एक बार फिर अब्राहम से वादा किया, ‘मैं तुझे आशीष दूँगा और तुझे बहुत-से बच्चे होंगे।’ इसका मतलब यह था कि यहोवा अब्राहम के परिवार के ज़रिए सभी अच्छे लोगों को आशीष देता।

“परमेश्‍वर ने दुनिया से इतना प्यार किया कि उसने अपना इकलौता बेटा दे दिया ताकि जो कोई उस पर विश्‍वास करे, वह नाश न किया जाए बल्कि हमेशा की ज़िंदगी पाए।”

यूहन्‍ना (John) 3:16

तो कुर्बानी की परंपरा यहूदियों से शुरू हुई थी

अरबों ने Qurbani की इस परंपरा को यहूदियों से लिया था, यहूदी धर्म में ‘क़ुर्बान’ की अवधारणा सदियों से चली आ रही थी। ‘क़ुर्बान’ का हिब्रू में शाब्दिक अर्थ होता है ‘त्याग’। इस परंपरा के अंतर्गत यहूदी अपने खेत के पहले अन्न, अपनी गाय का पहला दूध, अपने झुंड के पहले जानवर को ‘क़ुर्बान’ किया करते थे। यहूदियों द्वारा जानवरों की बलि एक ‘वेदी’ पर दी जाती थी जिसका थोड़ा सा माँस वेदी की अग्नि में जला दिया जाता था।

इसे बकरीद के नाम पर अरबियों ने अपनाया

अरबों ने जब इस परंपरा को अपनाया तो उन्होंने ‘काबा’ के पास बनी ‘बलि वेदी’ पर जानवर को क़ुर्बान करना शुरू किया। अरब यहूदियों की ही तरह सदैव जानवर ही नहीं क़ुर्बान करते थे बल्कि वो भी दूध, तेल, शराब, अन्न, और क़ीमती गहनों को भी ‘क़ुर्बान’ किया करते थे। जानवरों की कुर्बानी के मामले में अरबों की ये धारणा थी कि ‘अल्लाह’ और अन्य देवी-देवताओं के पास सिर्फ काटे हुये जानवर का ‘खून’ पहुँचता है और ‘अल्लाह’ उस खून से ही प्रसन्न हो जाता है।

इस बात का प्रमाण है कुरान की आयत 22:37 जो कहती है:

‘उनका माँस अल्लाह तक नहीं पहुँचेगा, और न ही उनका खून, मगर जो उसके पास पहुँचेगा वो है तुम्हारी भक्ति’!

Quran 22:37

और उस से पहले कुरान की आयत 22:34 कहती है कि:

‘और सारे धर्मों के लिए हमने नियम बनाए, कि वो अल्लाह को समर्पित कर सकते हैं जो उसने उनको दिया है (कुर्बानी के) जानवर के रूप में। मगर तुम्हारे लिए एक ख़ुदा है इसलिए तुम उसके आगे समर्पित करो !’

ये आयत बताती है कि Qurbani की परंपरा बहुत पुरानी थी। ये Islam के बहुत पहले से होती आ रही थी। Islam के बाद सिर्फ ये किया गया कि जहां पहले देवी और देवताओं के नाम पर जानवर ‘क़ुर्बान’ किये जाते थे वहीं अब सिर्फ़ एक ‘अल्लाह’ का नाम लिया जाने लगा और अन्य देवी-देवताओं के नाम को हटा दिया गया।

कैसे इस्लाम में कुर्बानी परंपरा को अनिवार्य नियम बना दिया?

Islam मानने के लिए हर मुसलमान को Islam के पांच नियमों या पांच स्तम्भों को मानना होता है। और वो स्तम्भ हैं ईमान (शहादाह), सलात (नमाज़/प्रार्थना), ज़कात (दान), रोजा (व्रत) और हज (तीर्थयात्रा)। ये Islam के पांच स्तम्भ हैं जिन्हें हर मुसलमान को मानना होता है, इसमें ध्यान देने वाली बात ये है कि इन पांच स्तम्भों में ‘Qurbani’ कहीं भी नहीं आती है।

इस्लाम में कुर्बानी किस के लिए है?

कुछ लोग यह दलील देते हैं कि Qurbani हज का हिस्सा है, इसलिए वो पांचवें स्तम्भ में आ जाती है। तो मेरा उनसे ये सवाल होगा कि अगर Qurbani हज का हिस्सा है तो वो दुनिया के उन सारे मुसलमानों के लिए क्यों हैं जो अपने घरों में बैठ कर Qurbani कर रहे हैं? अगर ये हज का एक अरकान (कर्मकांड) है तो फिर सारी दुनिया के मुसलमानों को इसे करने की क्या ज़रूरत है? जो हज पर गया है वो बकरीद (Eid ul adha) में वहां मनायेगा।

इस्लाम में कुर्बानी एक गैर जरूरी कर्मकांड है!

आज ये समझना हमारे लिए ज़रूरी है कि qurbani in islam का भ्रमजाल क्या है? क्योंकि ‘क़ुरान’ और हदीस में जितने भी उदाहरण हैं Qurbani के, वो सब के सब ‘हज’ के एक कर्मकांड के रूप में हैं। ऐसी कोई भी हदीस और कोई आयत नहीं है जो ये कहे कि Eid ul adha के मौके पर आज भी दुनिया के मुसलमानों को जानवर की Qurbani देनी है!‘ इसे सारी दुनिया के मुसलमानों के लिए एक ज़रूरी कर्मकांड वैसे ही बना दिया गया जैसे तीन तलाक़, हलाला और बुर्क़ा को बनाया गया है। Qurbani को कैसे प्रचलित किया गया और किसने किया? इसके लिए हर उस मुसलमान को पढ़ने की ज़रूरत है। जो ये सोचता है कि ये उसके लिए यह एक ‘धार्मिक’ और ‘ज़रूरी’ कर्मकांड है।

पिशाच-पर्व पर बधाई का राक्षसी-उत्सव

पशु के लिए ही कोई शोक नहीं मनाता। उल्टे कुर्बानी (पशुवध) कर सभी उत्सव मनाते हैं, Badhai देते हैं- वही सारे जो अपनी जाति पर एक अंश अन्याय भी सह नहीं सकते थे। सभी स्वार्थी हैं। सभी आत्मतुष्ट लोग।

Qurbani in Islam – बधाई पर अब चुप नहीं रहा जाता!

मैं तो हर अन्याय पर मौन रहता हूँ- कुटिलता से नहीं विडम्बना से। किन्तु अब पशु पर हो रही क्रूरता पर ही चुप नहीं रह पाता। उस निरीह का नाश मुझको खटकता है, जाति तो मेरी पहले ही नहीं थी, धर्म ना था, अब लगता है कदाचित् मैं मनुष्य भी नहीं हूं। मुझे पशु के लिए शोक होता है, सबको अपनी जाति के लिए होता है, कदाचित् मैं जाति से पशु हूँ!

इस्लाम में कुर्बानी पर ज़रा भी लज्जा नहीं आती?

लेखक, कवि, पत्रकार, संवेदनशील प्राणी, बुद्धिजीवी- तुमको लज्जा नहीं आती, ईश्वर की उन मूक कातर संतानों को चार लोगों ने बांधकर वध कर दिया और तुम Qurbani in Islam पर बधाई देते हो? तुम्हारी कविता किस काम की, जो तुममें करुणा नहीं जगा सकी। तुम्हारे साहित्य का क्या मोल? इस संसार में कोई क्यों कविता लिखे, कोई क्यों अंतश्चेतना की बात करे, जब इतना नहीं कह सकते तुम तो मैं Badhai इसके लिए ना दूंगा, ना स्वीकार करूंगा।

रीढ़ की हड्‌डी को मरे हुए पशु की खाल की तरह उतारकर कहां रख आए तुम, लेखक? तुम्हारी अंतश्चेतना का क्या हुआ? वध किए जा रहे पशु की आंखें तुमको दु:स्वप्न में डराती क्यों नहीं?

तुम्हें शर्म नहीं आई मुबारकबाद बोलते हुए?

वो हर धर्म जो कहता है कि-

पशुओं को घास पर अनंतकाल तक चलने का अधिकार नहीं, जीवन का अधिकार नहीं, अपनी संतानों को निहारने का वैसा अधिकार नहीं जैसा मनुष्य को है, कि पशुओं की चेतना का आकार मनुष्य से छोटा है या कदाचित् उनमें चेतना ही नहीं, भावना ही नहीं, बुद्धि तो बिल्कुल भी नहीं, कि वो ईश्वर की सौतेली संतानें हैं, यह धरती उनकी मां नहीं, वो प्राणी नहीं हैं पौष्टिक आहार हैं, स्वादिष्ट हैं।

उनकी हत्या करो ऐसे अडोल मन से जैसे हमने सच में ही नहीं देखी हो उनकी आँखों में जीवन की याचना, क्रूरता से कुचल दो जैसे बलवान रौंदता है दुर्बल को और इसे ईश्वरीय विधान पुकारो, सभी क़ानूनों और शपथों से उन्हें देश निकाला दे दो केवल इसीलिए कि वो बोल नहीं सकते, वधिक बनो, दया का दमन कर दो, और उसका उत्सव मनाओ उनके सर्वनाश का, शुभकामनाएं बांटो, शुभकामनाएं सहर्ष स्वीकारो

ये धर्म नहीं अधर्म है, पाप है, अंतःकरण पर दाग़ है!

ऐसे किसी भी धर्म से अपनी रक्षा करो!

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