मस्जिद अल अक्सा का संक्षिप्त इतिहास

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पढ़िये यरूशलेम (Jerusalem) स्थित मस्जिद अल अक्सा (Masjid Al Aqsa) और Temple Mount (Dome of rock) का संक्षिप्त इतिहास ताकि आपको वहां के हालात समझ सकने में आसानी हो कि मुसलमानों और यहूदियों के बीच चलती आ रही जंग मुख्यतः किस बात की है।

मस्जिद अल अक्सा का संक्षिप्त इतिहास (भाग-1)

सातवीं शताब्दी में अरब के मक्का शहर में मुहम्मद साहब ने जब स्वयं को अल्लाह का पैग़म्बर घोषित किया, तब भी इजराइल का शहर यरूशलेम यहूदियों का पवित्र तीर्थ स्थान हुआ करता था। जैसा कि आज भी है।

यरूशलेम में स्थित है Temple Mount, जो आज की स्थिति में एक समतल स्थान है, वहां कभी यहूदियों का पवित्र मंदिर हुआ करता था मगर वक़्त के साथ वो मंदिर पूरी तरह से तबाह हो चुका है। अब बस उस मंदिर की कुछ दीवारें बची हैं जिनके सामने यहूदी आज भी प्रार्थना करते हैं।

आज के Temple Mount के स्थान पर एक बहुत ही आलीशान और भव्य मंदिर था जिसे, यहूदी धर्मग्रंथों के अनुसार, पैग़म्बर डेविड, जिसे इस्लाम में दाऊद बोला गया है, उनके बेटे सोलोमन, जिन्हें इस्लाम में सुलेमान कहा गया है, ने ईसा से एक हज़ार साल पूर्व (1000 BC), यानि मोहम्मद के पैदा होने से क़रीब सत्तरह सौ साल पहले, बनवाया था।

सोलोमन के इस मंदिर को हिब्रू भाषा में “बैत हा-मिक़दश” कहा जाता है। हिब्रू में “बैत” का मतलब होता है घर और “मिक़दश” का मतलब होता है पवित्र। यानि ख़ुदा का पवित्र घर। अरब के लोग इसे “बैत-उल-मक़्क़द्दस” कहते थे। ये एक तरह से अपभ्रंश था हिब्रू के “बैत हा-मिक़दश” का, जैसे सोलोमन का सुलेमान हो गया और डेविड का दाऊद बन गया।

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तो सातवीं शताब्दी में जब मुहम्मद साहब ने स्वयं को पैग़म्बर घोषित किया तब उन्होंने यरूशलेम में स्थित सोलोमन के इसी मंदिर की तरफ़ मुंह करके प्रार्थना करना शुरू किया था। उस समय भी ये मंदिर एक खंडहर ही था जो वक़्त से साथ तमाम भूकंप झेलते हुए बस एक टीला बनकर रह गया था। उसकी कुछ दीवारें और खंबे शेष बचे थे। फिर जब पैग़म्बर मुहम्मद के अनुयायी बढ़े तो वो सब भी यरूशलेम की तरफ़ मुंह करके प्रार्थना करने लगे। और ये सिलसिला लगभग तेरह (13) साल चला।

तो तेरह साल तक नए नए मुसलमानों के लिए उनका किबला यरूशलेम का “बैत हा-मिक़दश” ही था जो कि यहूदियों का मुख्य तीर्थस्थल था। जिसकी पूजा सदियों से यहूदी करते आ रहे थे।

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