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Philosophyजानिए व समझिए धर्म क्या है?

जानिए व समझिए धर्म क्या है?

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जो धर्म डराए, जो किताब भ्रम पैदा करे, उसमें शिद्दत से सुधार की जरूरत है!

आज लोग यह जानना चाहते हैं कि वास्तव में Dharm Kya Hai? क्योंकि अक्सर Dharma के अधिभौतिक तत्वों की चर्चा द्वारा धर्म के सामाजिक और राजनीतिक पक्ष पर पर्दा डालने का प्रयास किया गया हैं, जो कतई उचित नहीं है। यह धुंध हमें वास्तविकता से दूर कर देती है, और अपने Dharm के प्रति आत्ममुग्धता पैदा करने देती है। इससे बाहर निकलना हमारे आपके लिए अब बेहद जरूरी है।

लोग जानना चाहते हैं कि वास्तव में Dharm Kya Hai?

धर्म क्या है?

सभी धर्मों को जाने बिना सही मार्ग का चुनाव नहीं किया जा सकता, हमारे लोकतंत्र में भी ऐसी व्यवस्था है जो सभी धर्मों को समझने और चयन करने का अवसर प्रदान करता है।

किसी ने सच कहा है कि-

जहाँ आस्था की प्रधानता होती है वहां सबसे पहले तर्क की हत्या होती है। आस्था मनुष्य को रूढ़ बना देती है!

धर्म एक विशद अवधारणा है। मानव समुदाय का धर्म अधिकांशतः मिथकीय अवधारणाओं पर अवलम्बित होता है। इनका वास्तविक मानव धर्म (अपने निकटतम English word- Righteousness) से कोई लेना देना नहीं होता। और यही कट्टरता विश्व में मानव धर्म की स्थापना होने में बाधक है।

Dharma को धारण करने की प्रक्रिया क्या है?

धार्मिक प्रक्रियाओं में एक प्रमुख प्रक्रिया लोगों को उक्त Dharm में दीक्षित करने की होती है। विश्व के लगभग सभी धर्मों में यह प्रक्रिया पायी जाती है। Hindu Dharm में नामकरण आदि संस्कार, Islam में सुन्नत (खतना), ईसाई धर्म में बपतिस्मा जैसी प्रक्रियाएं होती हैं, जो अति आवश्यक मानी जाती हैं।

बच्चों को बहुत कम उम्र में ये संस्कार प्रारंभिक स्तर पर सम्पन्न कराए जाते हैं। उसे ठीक से यही पता नहीं होता कि वह किस धर्म को “धारण” कर रहा है? वह धर्म कैसा है? उसमें कितनी अच्छाई या बुराई हैं? इस प्रकार के 99% मामलों में बच्चा अपने परिवार के ही धर्म को स्वीकार करता है। धर्म में शामिल करने की यह प्राथमिक प्रक्रिया हैं और यह तभी प्रारंभ कर दी जाती हैं जब बच्चे को विचार या विचारधारा का ठीक से ज्ञान नहीं होता।

लेकिन जब कहीं धर्म पर चर्चा होती है तो लोगों को इस तरह की प्रक्रिया को प्राकृतिक या नैसर्गिक बताया जाता है। गोया कि उस समय हमारे-आपके पास कोई और चुनाव ही नहीं था। धार्मिक और राजनीतिक लोग जोर देकर कहते हैं तुम हिंदू हो, मुसलमान हो, ईसाई हो, सिख हो। वह भी ऐसे जैसे कि यह सब प्राकृतिक और नैसर्गिक है।

जबकि हर व्यक्ति जानता है कि वास्तविकता इससे परे है। हम जन्म से हिन्दू, मुसलमान, ईसाई, सिख या किसी भी धर्म के अनुयाई नहीं होते हैं। उक्त धर्म हमें विरासत में थमाया जाता है। यह हमारा चुनाव नहीं होता। यह बात दीगर है कि धर्म की तमाम प्रक्रियाओं से गुजरते हुए बाद में हम चेतन और अवचेतन स्तर पर स्वयं को हिंदू, मुसलमान, सिख, ईसाई आदि मानने लगते हैं। यहां तक कि अपने धर्म के लिए जान देने और लेने के लिए भी तैयार हो जाते हैं।

यह बात हमेशा याद रखिए कि प्रकृति ने हमें कोई भी जन्मजात धर्म नहीं दिया है!

विख्यात समाजवादी चिंतक डॉ लोहिया ने कहा था “राजनीति अल्पकालिक धर्म है, और धर्म दीर्घकालिक राजनीति!”

क्या Hindu Dharm में दीक्षा अनिवार्य है?

कुछ लोगों का कहना है ‘नहीं’ Hindu Dharm ऐसा कोई आग्रह नहीं करता है! इस Dharm को मानने वाले बहुत सारे लोग ऐसे हैं जो कोई नामकरण वग़ैरह नहीं कराते हैं! वहीं तमाम लोग ऐसे भी हैं जो किसी पंडित के पास यह पूछने नहीं जाते कि हमारे पुत्र या पुत्री के राशि का नाम क्या है?

जब दीक्षा अनिवार्य नहीं है! तब आप हिन्दू कैसे हुए? कैसे अपने जाना कि आप हिन्दू हैं? आपके नाम के साथ फलां सरनेम कैसे आया?

नाम का क्या है वो तो कुत्ते-बिल्लियों के भी होते हैं!

आप दीक्षा को परम्परागत अर्थ में ग्रहण न करें। अगर पण्डित या पुरोहित के यहां जाना जरूरी नहीं। हालांकि अभी भी बहुत से लोग ऐसा करते हैं। लेकिन ऐसा न करने पर भी धार्मिक प्रक्रिया बनी रहती है। सामान्यतः कुत्ते-बिल्लियों के नाम जाति या धर्म सूचक नहीं होते। यदि आप ऐसा करते हैं तो लोग बुरा मान सकते हैं।

Dharm किन समस्याओं की जड़ है?

The Kashmir Files, Parzania, Godhra Tak, Pinjar जैसी बहुत सी फिल्में और ढेर सारा साहित्य यही दर्शाता है कि सारी घृणा, पूर्वाग्रहों, दंगों और समस्याओं की जड़ आपका Dharm है। आप हिन्दू हों या मुस्लिम हों या किसी और धर्म के मानने वाले। सभी धर्म मनुष्यता को बांटते हैं और उनमें जहर भरते हैं। मार्क्स ने लिखा था कि धर्म अफीम है, लेकिन वह गलत था। धर्म वास्तव में जहर है जिसे बचपन से ही हमारी नसों में डाला जाता है। राजनीतिक स्वार्थ में लिप्त लोग केवल धर्म का लाभ उठाते हैं। वे वोट के लिए अपनी जीभ लपलपाते रहते हैं।

क्या समस्याओं की जड़ धर्म नहीं मानसिकता है?

बहुत सी मानसिकताएं Dharm से जुड़ी पायी जाती हैं।

क्या पवित्रता धार्मिक कर्मकाण्ड तक सीमित है?

धर्म में पवित्रता सिर्फ कर्मकांड तक सीमित नहीं होती। यदि यहीं तक सीमित हो तो कोई बात नहीं। अधिकतर लोगों को धर्म से जुड़ी बहसें असहनीय लगती हैं। यह संभवतः कोई दार्शनिक जैसी बात नहीं है। धर्म पर बहुत से ऐसे प्रश्न होते हैं, जो प्राश्निकता से परे माने जाते हैं। वे इतने अस्पृश्य होते हैं कि उन्हें पूछ भर लेने से आपकी हत्या तक हो सकती है। धार्मिक तार्किकता सीमाबद्ध होती है। वह बार-बार कहती हैं, “खबरदार! बस अब इससे आगे नहीं”।

याद रखिए कि धर्म के खिलाफ आवाज सिर्फ निस्वार्थ और निर्भय विचारक ही उठा सकते हैं!

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