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Existence of GOD | ईश्वर, आस्था और विज्ञान

जरूर पढ़े!

DG
जो धर्म डराए, जो किताब भ्रम पैदा करे, उसमें शिद्दत से सुधार की जरूरत है!

Existence of GOD- यह पुस्तक मूलतः Religion, ईश्वर और इस Planet पर इंसान के अवतरण को तर्क की कसौटी पर परखने और इस Earth से बाहर हमारे लिये क्या-क्या संभावनायें हो सकती हैं इस विषय पर बात करती है।

इंसान ने Earth पर किस तरह जीवन शुरू किया? और किस तरह आगे बढ़ते हुये समाज बसाये? किस तरह इंसानों के बीच धर्मों की ज़रुरत महसूस हुई? और फ़िर कैसे उसने उन भगवानों, खुदाओं और आस्थाओं को जन्म दिया? जो आज के उपलब्ध Knowledge और Logic के आगे धराशायी हो जाते हैं।

क्या आप जानते हैं कि हम जिस दुनिया को जानते हैं, समझते हैं, देखते हैं वो Three Dimensional है? इससे बाहर हम कुछ नहीं समझ सकते जबकि इससे बाहर ढेरों तरह की संभावनायें हो सकती हैं। यह Universe सेल्फ मेड है या इसे किसी ने बनाया है? यह जानने का हमारे पास कोई साधन नहीं, लेकिन कई संभावनायें हैं जिन्हें हम टटोल सकते हैं।

अगर यह मान भी लिया जाये कि वाकई कोई है, जिसने एक Program की तरह इसे Design किया है, तो तमाम तरह की आस्थाओं से परे विज्ञान और Technology के नज़रिये से वह कैसा हो सकता है?

Existence of GOD – संक्षिप्त वर्णन

ज्यादातर यह दुनिया एक सरल से तर्क पर चलती है, कि यदि कोई रचना है तो उसका Creator भी होना चाहिये और इसी तर्क के आधार पर सृष्टि के Creator की GOD के रूप में कल्पना की जाती है। अब चूंकि यह कल्पना एक इंसान करता है जिसका ज्ञान और जिसकी समझ इस Universe की अपेक्षा बेहद सीमित सी है तो वह ठेठ इंसानी स्वभाव को ही उस ईश्वर पर लागू कर देता है… मतलब कि उनका GOD प्रशंसा और गुलामी से खुश होगा, हुक्म उदूली से नाराज हो जायेगा, गुस्सा होगा तो बहुत बुरा व्यवहार करेगा, सजायें देगा। ऐसे ही उसे बहुत प्यार करने वाला और बहुत रहम दिल वाला भी बना दिया जाता हैं।

यह सारी अनुभूतियां दरअसल Neurons में होने वाले प्रतिक्रियाओं पर आधारित हैं, अगर आप यह अनुभूति एक Creator के साथ जोड़ते हैं तो फिर स्थापित तथ्य के हिसाब से उसके पास दिमाग जैसा अंग होना चाहिये जहाँ यह प्रतिक्रिया होती हैं। अगर दिमाग होगा तो फिर शरीर भी होना चाहिये। लेकिन मज़े की बात यह है कि ज्यादातर लोग उस पर इंसानी Feelings अप्लाई करने के बाद भी उसे निराकार की संज्ञा देते हैं, जबकि यह दोनों बातें विरोधाभासी मानी जाती हैं।

क्या Logic – God’s existence पर लागू होता है?

इसके सिवा वे इस पर भी कोई जवाब नहीं देते कि रचना है, तो Creator होना जरूरी है वाले Logic के हिसाब से Existence of GOD को स्थापित करते वक्त यही तर्क उस ईश्वर पर भी तो लागू होता है, क्योंकि वह खुद भी एक रचना हो सकता है। तो फिर सवाल उठता है कि उसका Creator कौन है? अगर कोई उसका भी Creator है तो फिर वह सर्वशक्तिमान कैसे हुआ? इसे थोड़ा गहराई से समझेंगे तो इस एक Point पर यह समझ में आयेगा कि कोई God is there or not, दरअसल इंसान हकीकत में इतना सक्षम नहीं है कि इस बारे में अंतिम फैसला कर सके। क्योंकि अंतिम फैसले के लिये सब कुछ जान चुका होना जरूरी है, आप अपनी आधी-अधूरी जानकारी के आधार पर अंतिम निर्णय नहीं ले सकते। लोग अभी Universe के बारे में जानते ही कितना हैं?

बस अभी इतना है कि थोड़े व्यवहारिक हो कर सोचेंगे तो ये समझ सकते हैं कि अगर कोई Existence of GOD है भी तो कम से कम वैसा तो नहीं होगा जैसा कि लोगों ने उसकी रूपरेखा खींच रखी है। यह तो इंसान की कल्पना से निकला इंसान जैसा ही Existence है, जिसमें ढेरों त्रुटियाँ हैं जो इंसान की सीमित समझ के हिसाब से अवश्यंभावी है। तो फिर अगर GOD हुआ, तो कैसा हो सकता है?

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इस बारे में ज्यादा जानने के लिए Amazon पर God’s existence का Paperback या Kindle Edition पढ़ सकते है। खरीदने के लिए लिंक नीचे है।

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