अरब के सबसे बड़े देवता ‘अल-इलाह’ अल्लाह कैसे बने?

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God in Islam में अल-इलाह अरबों के लिए सबसे बड़ा देवता थे। अल-इलाह ‘अल’ यानि बड़ा, और ‘इलाह’ यानि देवता। मतलब सबसे बड़े देवता। अरब अपने सबसे बड़े देवता को “Al-ilaah” को “Allah” कहते थे। ये शब्द कहीं और किसी अन्य इतिहास या किसी पुरानी धार्मिक किताब में नहीं आया है। न इसाईयों की ‘बाइबिल’ में और न ‘यहूदियों’ के तौरेत में। ज़ाहिर है, ये अरबों का पर्सनल शब्द था उनके अपने देवता के लिए। तब सोचने वाली बात है कि ‘अल-इलाह’ अल्लाह कैसे बने?

अरबों के भी कुल देवता होते थे

अरब में सबसे बड़े देवता ‘अल-इलाह’ के बाद भी अरबों के अपने पर्सनल देवता और कुल देवता होते थे। अरबी ठीक उसी तरह से पत्थरों की पूजा करते थे जैसे आज भारत के लोग करते हैं। कहीं भी सफ़र में दूर जाने पर अरबों को जब किसी दैवीय सहायता की ज़रूरत होती थी तो वो अच्छे-अच्छे गोल पत्थर चुनकर उसे एक घेरे में लगाते थे और उस पर पानी और ऊंट का दूध डालकर पूजा करते थे। बिल्कुल हिन्दुस्तानियों की तरह.. ऐसे पत्थरों को इलाह या अल-इलाह बुलाते थे।

आज के God in Islam से पहले होती थी सांपों की पूजा

अरब साँपों को भी अपने इलाह यानि Devta का रूप मानते थे। वो साँपो को जिन्न कहते थे जो उनके हिसाब से उनके इलाह का ही एक रूप होता था। जिन्न अरबों की अपनी पर्सनल खोज थी। इसीलिए इनका ज़िक्र किसी दूसरे धर्म की किसी किताब में नहीं मिलता है। रेत के बड़े-बड़े तूफ़ान को अरब जिन्न बोलते थे और उस से बचने के लिए साँपों की पूजा करते थे। तो “अल-इलाह” अरबों के लिए कोई भी हो सकता था जैसे यहाँ किसी के लिए शिव सब कुछ हैं तो किसी के लिए कृष्ण वैसे ही वहां भी था किसी के लिए ‘देवी उज्ज़ा’ सब कुछ थीं तो किसी के लिए देवता हुबल किसी के लिए वो ‘इलाह’ होते थे तो किसी के लिए ‘अल-इलाह’।

इसे समझने के लिए एक छोटी सी घटना

एक छोटी सी घटना का मैं यहाँ ज़िक्र करना चाहूंगा कि मोहम्मद साहब के बचपन के समय जब काबा की हालत बहुत खस्ता हो गयी थी, तो अरब लोग उसकी मरम्मत करवाना चाहते थे, लेकिन उसमें एक सांप रहता था और वो रोज़ धूप सेंकने काबा से निकलकर दीवार पर सटकर लेटा रहता था। अरब उसी के सामने सब चढ़ावा चढाते थे। अरब ये सोचते थे कि इलाह का ये रूप अपने मंदिर, काबा की हिफाज़त कर रहा है, इसलिए हम काबा की अभी कोई मरम्मत नहीं कर सकते हैं।
फिर एक दिन एक बाज़ उड़ता हुआ आया और उस सांप को चोंच में दबा कर उड़ गया। अरबों ने इसे इलाह की तरफ़ से इशारा समझा और ये माना कि अब उनको काबा के मरम्मत की इजाज़त मिल गयी है। उनके हिसाब से उनके अल-इलाह ने अपने ही एक रूप, जिन्न को, बाज़ द्वारा उठवा कर ये सन्देश दिया कि अब तुम लोग मरम्मत करो, फिर काबा की मरम्मत हुई और वो बनाया गया। उसके बाद काबा से सांप वाले इलाह, सांप यानि जिन्न, का एपिसोड ख़त्म हो गया। और इन सारी आस्थाओं और अरबों की अपनी समझ के रास्ते से तय हुई और फिर उस “घटना” ने आपको अपने वर्तमान “ख़ुदा” का रूप और नाम दिया।

आज के God in Islam बनने का सफर

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मुझे ये सिर्फ इसलिए लिखना पढ़ रहा है कि आप समझ पायें। जिसे अब आप अपना सब कुछ मानते हैं वो कितने रूपों में चलकर आपके पास पहुंचा है। और किस तरह से चाँद, सूरज, पत्थर से लेकर सांप की यात्रा करते हुए वो निराकार बन गया।

“इस सारे खेल को समझने के लिए थोड़ी सी समझ और इतिहास पढ़ने की ज़रूरत है,
जिस दिन यह समझ गए, आपके सामने सारी नफरतें ताश के पत्ते की तरह ढेर हो जायेंगी”।

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