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ईश्वर है या नहीं | यह एक यक्ष प्रश्न क्यों है?

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DG
जो धर्म डराए, जो किताब भ्रम पैदा करे, उसमें शिद्दत से सुधार की जरूरत है!

ईश्वर है या नहीं? (Is there god or not?) मुझसे यह प्रश्न जब भी पूछा जाता है तब-तब मैं यही कहता हूँ कि यह मैं कैसे बता सकता हूँ…? न मुझे कभी उसके होने का प्रमाण मिला और न ही न होने का। हो भी सकता है… नहीं भी हो सकता।

सीधी, सरल व सच्ची बात है कि मैं उसे जानता नहीं तो कुछ भी कहने की स्थिति में भी नहीं हो सकता… ईश्वर के न तो होने का सबूत है, ना ही उसके न होने का। वो होते हुए भी, नहीं हैं। वो नहीं होते हुए भी है।

जब कोई धार्मिक शख्स मुझसे यह जिद करता है कि मैं साबित करूँ कि वह नहीं है… यानि दूसरे शब्दों में सब कुछ कुदरती तौर पर वजूद में आया, तो यह भी मेरे लिये मुमकिन नहीं…

देखिये, होना या ना होना हम मनुष्यों के अनुभवों से तय हुई स्थिति है। हमारा कोई अनुभव ईश्वर (अगर है) तो उस पर लागू नहीं होता। हम अपने अनुभवों से ईश्वर को कभी नहीं समझ सकते हैं। वो हमारी बुद्धि से परे है।

यक्ष प्रश्न: Is there god or not? ईश्वर है या नहीं?

ये हम कभी जान नहीं सकेंगे क्योंकि ये न तो हमारी जरूरत है और ना ही हैसियत।

Ishwar

जिसको भी हम ‘होना’ कहते हैं, वो दरअसल अस्तित्व का भ्रम है। और जिसको भी हम नहीं होना समझते हैं, वो दरअसल अस्तित्व की अवहेलना है।

क्या हमें अनुभव होता है कि पूर्वज नहीं है?

हमारे पूर्वज अब नहीं हैं… (अनुभव यही कहता है।) पर क्या यह सच है?

हमारे पूर्वज हमारी धमनियों में हैं। अपने गुणसूत्रों (DNA) के जरिए उनके जीवन का टुकड़ा, बीज… हमारे भीतर पनप कर फल-फूल रहा है। हमारे पूर्वज हमारे रूप में हमारे साथ हैं। उनका जीवन, हमारे बच्चों में हमसे होता आगे बढ़ेगा। हमारी आदतें, हाव-भाव, चेहरा-मोहरा सारा कुछ, हमारे पूर्वजों जैसा इसीलिए तो है कि हमारे पूर्वज हमारे भीतर ही जीवित है।

गौर करने पर हम पाते हैं कि वो फैल गए हैं… हमारे भाई-बहनों में, हमारे बच्चों में। और इस तरह वो अब पहले से ज्यादा ही हैं इस दुनिया में। हम खुद के बारे में विचार करते हैं कि हम हैं। लेकिन हम खुद कभी भी हम नहीं। हम तो अपने पूर्वजों की प्रतिलिपि हैं… उनकी कॉपी। हम कभी भी हम हैं ही नहीं। ये अपने आप में बिल्कुल अजीब है कि नहीं?

क्या ईश्वर अपने साथ है?

आप जितना भी Ishwar के होने का सबूत खोजेंगे, आपको उतना ही उनके नहीं होने का प्रमाण मिलेगा। आप जितना ही Ishwar के नहीं होने के प्रमाण खोजेंगे, आपको उतना ही उनके होने के सबूत मिलेंगे।

ईमानदारी से कोशिश करें तो हर सवाल का सच जवाब, यहां उल्टा मिलेगा। अब आप खुद तय कीजिए की वो है कि नहीं। जैसी आपकी खोज, ईमानदारी, उत्कंठा, अभिलाषा, इच्छा वैसा आपका अनुभव और वैसा ही आपको मिला उत्तर भी।

यहां कुछ भी आपके अनुभव से बाहर नहीं है। आप वहीं समझ और समझा सकते हैं जिसका आपको अनुभव है। लेकिन मनुष्य का अतीत कोई इतना भी विशाल नहीं कि वो ब्रह्मांड का सब कुछ अनुभव कर चुका हो। संसार में जो कुछ भी मौजूद है मनुष्य उसका बस महाशंखवे के भी महाशंखवे के महाशंखवा हिस्से से भी बेहद कम अनुभव कर सका है। तो बाकी जो अभी अनुभव किया जाना ही है उसके अनुभव के बिना कोई निर्णय कैसे मुमकिन है।

ईश्वर की ख़ोज

हां, सुरक्षित जीवन जीने के लिए किसी शक्तिशाली पर भरोसा जरूरी है। तो हमने Ishwar खोज लिया, कि वो हमारी देख-भाल कर रहा है। संसार का निर्माता है। मालिक है। ये विश्वास हमको जीने में आसानी और सहज, सुलभ सहूलियत देता है। तो इस तरह Ishwar है।

लेकिन Ishwar का काम, हमारी देखभाल करना नहीं। वर्ना वो, तीन महीने के बच्चे को बेहिसाब तकलीफ़ नहीं देता। जीवन के दूसरे रूपों को इतनी प्रताड़ना और तकलीफ़ नहीं देता। कहीं नफरत और कहीं घृणा नहीं भरता। तो Ishwar हमारे लिए नहीं है। वो निरपेक्ष, उदासीन है। जिसे दुनिया से विरक्ति है। हमसे उसको कोई लेना-देना नहीं है।

हम जिस Ishwar पर विचार करते हैं, वो हमारे विचार की उपज है। विचार खत्म, हमारा Ishwar भी खत्म। तो Ishwar है क्योंकि कि हम चाहते हैं, मानते हैं कि वो हो। Ishwar नहीं है, हमको वो नहीं मिलता है कि हम ऐसा नहीं मानते हैं कि वह है।

किसी जिंदा आदमी के लिए Ishwar है। लेकिन उसके मरने के बाद उसका Ishwar कहां है? वो क्यों नहीं बता सकता कि Ishwar है, कि नहीं? क्योंकि Ishwar उस व्यक्ति के दिमाग से ही Existence में है। उसका दिमाग मर गया तो उसके लिए उसका Ishwar खत्म हो गया, ग़ायब हो गया।

आपके पास भी कोई प्रमाण नहीं कि दुनिया Ishwar ने बनाई है!

अगर मैं कहूँ कि आप साबित कीजिये कि यह सब किसी Ishwar ने बनाया तो यकीन मानिए कि इसका कोई प्रमाण आपके पास भी नहीं है। सिवा उन धार्मिक मान्यताओं के, जिनके साथ पहली अनिवार्य शर्त जुड़ी होती है… मानने की।

मानने और जानने में बड़ा फ़र्क है!

आप तो जानते होंगे कि मानने और जानने में कितना फर्क होता है। धर्म सिर्फ मानने की बुनियाद पर टिका होता है… जो पैदा होते ही आपको माँ-बाप ने बता दिया… जो आपकी किताबों ने आपको पढ़ा दिया, आप उसे ही आखिरी सच मान लेते हैं और जीवन भर उस ‘माने हुए सच’ को Defend करने में लगे रहते हैं।

जानने के नाम पर आप अपनी धार्मिक किताबों में से वो विज्ञान ढूंढ लाते हैं जो असल में होते ही नहीं, बस दिखते हैं। सभी धार्मिक किताबों में ज्यादातर वे Symbolic बातें लिखी हैं जो हर दौर में उपलब्ध जानकारी के अनुसार अपने हिसाब से तोड़ी-मरोड़ी जा सकती हैं।

एक साधारण सा उदाहरण देता हूं… कोपरनिकस, ब्रूनो, गैलीलियों से पहले तक यही मान्यता थी कि धरती चपटी है, केन्द्र में है और सूरज, चांद, सितारे उसके इधर-उधर होते हैं, जिसे नंगी आंखों से देखा जा सकता था।

कुरान में मदार (कक्ष) बाद में लिखा गया है!

इसी चीज को क़ुरान में लिखा गया कि यह अपना सफर पूरा कर रहे हैं… बाद में उपलब्ध जानकारी के अनुसार ब्रैकेट में ‘मदार’ (कक्ष) लिख दिया गया, जिससे उस लाईन का अर्थ हो गया कि यह सब अपने कक्ष पर परिक्रमा कर रहे हैं… हालाँकि मूल लाईन में ‘मदार’ जैसे किसी शब्द का जिक्र नहीं।

आपको क़ुरान के ट्रांसलेशन में ऐसे ढेरों शब्द मिलेंगे जो ब्रैकेट में हैं, जबकि यह मूल आयत में नहीं। यह पढ़ने वालों की सहूलियत के लिये हैं कि किससे, किस विषय में क्या कहा जा रहा है… और यहां यह चीज भी अपने पक्ष में विज्ञान सम्मत साबित करने के लिये इस्तेमाल कर ली गयी।

बहरहाल… मानने और जानने में ऐसी ही चीजें आपके सामने आती हैं और आपकी गाड़ी पटरी से उतर जाती है।

मुझे नहीं पता कि इस जहां का मालिक कोई ईश्वर है या नहीं? लेकिन मान लेता हूं कि है, तो एक पल के लिये कल्पना कीजिये कि जिसने इतनी जटिल प्रकृति बना रखी है… आधुनिक मानव के पांच हजार साल के इतिहास में हम यहां तक पंहुच पाये हैं और अभी अगले पांच हजार साल में जहां पंहुच पायेंगे…

उतना सब हो सकता है कि वह सब उस Ishwar के ज्ञान का शायद एक प्रतिशत से भी कम हो… तो क्या आप उसके कुल ज्ञान का कोई अंदाजा लगा सकते हैं? इस पिद्दी से ग्रह की एक Species हो कर, जो अभी अपने सोलर सिस्टम को भी ठीक तरह से समझ नहीं पाई है… किसी नजदीकी ग्रह तक नहीं पंहुच पाई है… आप उस ईश्वर के सोचने-समझने की शक्ति का कोई अंदाजा लगा लेंगे?

Ishwar की सर्वश्रेष्ठ रचना कौन सी है?

बड़ा फनी लगता है जब कोई पूछता है कि क्या आप बता सकते हैं कि Ishwar की सर्वश्रेष्ठ रचना कौन सी है? मने Ishwar रोहित शेट्टी है कि गोलमाल, सिंघम, चेन्नई एक्सप्रेस के रूप में आप उसकी सारी रचनाओं से भली-भांति परिचित हैं। आप जैसों को बस एक सहज जवाब दिया जा सकता है कि चेन्नई एक्सप्रेस रोहित की श्रेष्ठ रचना है।

किसी ने कहा कि जैसे हम कंप्यूटर बना कर उसकी हर छोटी-छोटी चीज का ध्यान रखते हैं तो Ishwar भी रखता है… मतलब आप उसे जानते नहीं लेकिन अपनी इंसानी बुद्धि उस पे अप्लाई कर दी कि जैसे आप करते हैं… Exactly वह भी वैसे ही करेगा।

कैसा कार्टून जैसा बना दिया है, उस ईश्वर को?

थोड़ा सोचिये… कैसा कार्टून जैसा बना रखा है Ishwar को आपने… एक तरफ राजा है, एक तरफ जादूगर है, एक तरफ जल्लाद है… अपनी इंसानी सोच की लिमिटेशन के साथ अपनी हर कल्पना उस पर अप्लाई कर दी और समझ लिया कि सौ ग्राम के दिमाग से आपने Ishwar के दिमाग को पढ़ लिया… उसकी शक्तियों, क्षमताओं और सोचने-समझने की बाउंड्रीज को जान लिया…

हम तो चलो, सिरे से उसे जानते ही नहीं पर आप मानने की धुन में, जानने के पता नहीं कौन कौन से दावे किये बैठे हैं… वह अगर है भी तो तय जानिये कि आप उसे अपनी कल्पनाओं में नहीं समेट पायेंगे।

और हाँ… मेरा न उसके होने पे कोई दावा है और न ही न होने पे। यह सब इसलिये लिखा कि आप समझ सकें उस Ishwar को, जिसे समझने का दिन रात दावा करते हैं।

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