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Ishwar par vyangya | व्यंग्य संग्रह

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Ishwar par vyangya | व्यंग्य संग्रह
(ईश्वर पर व्यंग्य लेखों का संग्रह)

दुनिया के समस्‍त धर्म ग्रन्‍थ मुक्‍त कंठ से ईश्‍वर की प्रशंसा के कोरस में मुब्तिला नजर आते है। उनका केन्द्रीय भाव यही है कि ईश्‍वर महान है। वह कभी भी, कुछ भी कर सकता है। एक क्षण में राई को पर्वत, पर्वत को राई। इसलिए हे मनुष्‍यो, यदि तुम चाहते हो कि सदा हंसी-खुशी रहो, तरक्‍की की सीढि़याँ चढ़ो, तो ईश्‍वर की वंदना करो, उसकी प्रार्थना करो। और अगर तुमने ऐसा नहीं किया, तो ईश्‍वर तुम्‍हें नरक की आग में डाल देगा। और लालच तथा डर से घिरा हुआ इंसान न चाहते हुए भी ईश्‍वर की शरण में नतमस्‍तक हो जाता है।

लेकिन दुनिया में ऐसे लोगों की भी कमी नहीं, जो ईश्‍वरवादियों के रचाए इस मायाजाल को समझते हैं। ऐसे लोग वैचारिक मंथन के बाद इस नतीजे पर पहुँचते हैं कि ईश्‍वर आदमी के मन की उपज है और कुछ नहीं, जिसे मनुष्‍य ने अपने स्‍वार्थ के लिए, अपनी सत्‍ता चलाने के लिए सृजित किया है। ऐसे लोग विश्‍व प्रसिद्ध दार्शनिक नीत्‍शे के सुर में सुर मिलाते हुए कहते है- ‘मैं ईश्वर में विश्‍वास नहीं कर सकता। वह हर वक्त अपनी तारीफ सुनना चाहता है। ईश्वर यही चाहता है कि दुनिया के लोग कहें कि हे ईश्वर, तू कितना महान है।’

क्या ईश्वर सब देख रहा है? – (ईश्वर पर व्यंग्य)

Ishwar par vyangya: पता नहीं वो कौन लोग रहें होंगे, कैसे लोग रहे होंगे जिन्होंने ईश्वर को बनाया। और बनाए रखने के लिए तरह-तरह की स्थापनाएं और दलीलें भी खड़ी की। मैं जब कभी इन तर्कों की ज़द में आ जाता हूं, मेरी हालत ही विचित्र हो जाती है। ईश्वर वालों का कहना है कि ईश्वर हर जगह मौजूद है, ईश्वर सब देख रहा है! अरे भाई थोड़ी देर के लिए मैं मान भी लूं कि यह बात सही है, तो उससे होगा क्या?

मैं बाथरुम में नहा रहा हूं। एकाएक मुझे याद आता है कि बाथरुम में मैं अकेला नहीं हूं, कोई और भी है। जो मुझे टकटकी लगाकर देख रहा है। और ख़ुद दिख नहीं रहा है। यानि कि बदले में मैं कुछ भी नहीं कर सकता। हे ईश्वर, यह तू क्या कर रहा है? कई दिन बाद तो नलके में साफ़ पानी आया है और तू ऊपर खूंटी पर चढ़कर बैठ गया। अरे शिष्टाचार भी कोई चीज़ होती है, हे कृपानिधान! एक दिन तो ढंग से नहा लेने दे!

आपकी सारी गोपनीयता खत्म?

आपको याद होगा जब आप अपने एक परिचित के घर पाखाने में विराजमान थे, चटख़नी ख़राब थी, किसी ने बिना नोटिस दिए दरवाज़ा खोल दिया और आप पानी-पानी हो गए थे। और इधर तो टॉयलेट में ईश्वर मेरे साथ है! अब क्या करुं? यह सर्वत्र विद्यमान किसी भी ऐंगल से आपको देख सकता है -ऊपर से, नीचे से, दायें से, बायें से… कहीं से भी। मन होता है कि क्यों न पटरी किनारे खेत में चलकर बैठ जाऊं! अब बचा ही क्या? सारी Privacy की तो ऐसी की तैसी कर दी आपके ईश्वर महाराज ने।

यह ग़ज़ब की Philosophy है कि ईश्वर सब देख रहा है और कह कुछ भी नहीं रहा। इससे ही बल मिलता होगा उन कर्मठ लोगों को। वह आदमी भी तो कर्मठ है जो Synthetic Milk बना रहा है। वह बना रहा है और ईश्वर बनाने दे रहा है। तो सीधी बात है ईश्वर उसके साथ है। तो फिर डरना किससे है? इसीलिए वह मज़े से होली-दीवाली पर छोटे डब्बेवालों को इंटरव्यू देता है। मुंह पर ढाटा क्यों बांध रखा है इसने? यह शायद प्रतीकात्मक शर्म है! वरना तो उसे पता ही है कि चैनल वाले और देखने वाले, सभी Ishwar के मानने वाले हैं। मैं Synthetic Milk बनाता हूं तो ये Synthetic News बनाते हैं। सब एक ही ख़ानदान के चिराग़ हैं, एक ही Ishwar की संतान हैं।

ऐसे कर्मठ लोग भरे पड़े हैं हर धंधे में। ईश्वर सब देख रहा है! मगर कह कुछ भी नहीं रहा! तो फिर कुछ रोकने का सवाल ही कहां आता है?

ईश्वर को यह बात अजीब लगे न लगे,
मुझे बहुत अजीब लगती है!

क्या ईश्वर मोहल्ले का दादा है? – (ईश्वर पर व्यंग्य)

Ishwar par vyangya: सरल मेरा दोस्त है। अपनी सरलता की ही वजह से मेरा दुश्मन भी है। मौलिक है, नास्तिक है, विद्रोही है। जाहिर है ऐसे आदमी के रिश्ते सहज ही किसी से नहीं बनते। बनते हैं तो तकरार, वाद-विवाद, तू-तू मैं-मैं भी लगातार बीच में बने रहते हैं। यानि कि रिश्ता टूटने का डर लगातार सिर पर लटकता रहता है।

अभी हाल ही में सरल के दो बहनोईयों का निधन 6-8 महीनों के अंतराल में हो गया। कुछेक मित्रों की प्रतिक्रिया थोड़ी दिल को लगने वाली तो थी पर सरल को वह स्वाभाविक भी लगी। संस्कारित सोच के अपने दायरे होते हैं। मित्रों का इशारा था कि अब भी तुम्हारी समझ में नहीं आया कि तुम Ishwar को नहीं मानते, इसलिए यह सब हुआ?

यह सोच सरल के साथ मुझे भी बहुत अजीब लगी।

पहली अजीब बात तो यह थी कि सरल माने न माने पर उसके दोनों बहनोई ईश्वर में पूरा विश्वास रखते थे। फिर Ishwar ने सरल के किए का बदला उसके बहनोईयों और बहन-बच्चों से क्यों लिया?

दूसरी अजीब बात मुझे यह लगी कि अगर ईश्वर को न मानने से आदमी इस तरह मर जाता है तो फिर ईश्वर को मानने वाले को तो कभी मरना ही नहीं चाहिए ! वैसे अगर सब कुछ ईश्वर के ही हाथ में है तो ईश्वर नास्तिकों को बनाता ही क्यों है? पहले बनाता है फिर मारता है! ऐसे ठलुओं-वेल्लों की तरह टाइम-पास जैसी हरकतें कम से कम ईश्वर जैसे हाई-प्रोफाइल आदमी (मेरा मतलब है Ishwar) को तो शोभा नहीं देतीं।

इससे भी अजीब बात यह है कि ईश्वर क्या किसी मोहल्ले के दादा की तरह अहंकारी और ठस-बुद्धि है जो कहता है कि सालो अगर मुझे सलाम नहीं बजाओगे तो जीने नहीं दूंगा! मार ही डालूंगा! क्या ईश्वर किसी सतही स्टंट फिल्म का माफिया डान है कि तुम्हारे किए का बदला मैं तुम्हारे पूरे खानदान से लूंगा!

क्या ईश्वर को ऐसा होना चाहिए?

ईश्वर को मानने वालों की सतही सोच ने उसे किस स्तर पर ला खड़ा किया है!

वैसे अगर ईश्वर वाकई है तो क्या उसे यह अच्छा लगता होगा?

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