18.1 C
Delhi

Jai Bhim Movie 2021 Real Story Review (in Hindi)

जरूर पढ़े!

DG
जो धर्म डराए, जो किताब भ्रम पैदा करे, उसमें शिद्दत से सुधार की जरूरत है!

Jai Bhim Movie 2021 A Real Story Review in Hindi

  • Movie Review : जय भीम (Jai Bhim)
  • कलाकार : सूर्या, लिजोमोल जोस, के मणिकंदन, राजिशा विजयन, राव रमेश और प्रकाश राज
  • लेखक : टी जे ज्ञानवेल
  • निर्देशक : टी जे ज्ञानवेल
  • निर्माता : सूर्या और ज्योतिका
  • ओटीटी : अमेजन प्राइम वीडियो

OTT प्लेटफॉर्म Amazon Prime Video पर मैंने Suriya की Jai Bhim Movie आज ही देखा। Jai Bhim फिल्म का कथानक क्या है, यह अब तक लगभग सभी को पता चल चुका है। ‘जय भीम’ तमिलनाडु की एक ऐसी ही जन्मजात अपराधी करार दे दी गई, ‘इरुलर’ जनजाति के एक व्यक्ति ‘राजकन्नू’ की गाँव के सरपंच के घर हुई गहनों की चोरी के आरोप में, पुलिस कस्टडी में हुई मौत और उसके लिए न्याय माँगती उसकी पत्नी ‘सेंगीनि’ और उसके वकील ‘चन्द्रू’ की आपबीती पर आधारित यह A Real Story है।

क्या Jai Bhim Movie को एजेंडे से जोड़ना मज़बूरी है?

2021 में बनी Jai Bhim में कितनी हक़ीक़त और कितना फ़साना है? इससे अधिक इस फ़िल्म के शीर्षक पर चर्चा हो रही है। बाबा साहेब अम्बेडकर को लगभग अपना ब्रांड मान चुके तथाकथित अम्बेडकर और बहुजन तबका, इसके शीर्षक के अनुरूप कथानक न होने पर आपत्ति दर्ज़ कर रहा है, तो कुछ नए आदिवासी आदिवासियत की ज्यादा प्याज़ खाने के चलते मूवी के ‘Jai Bhim’ शीर्षक पर ही आपत्ति कर रहे हैं कि इसका शीर्षक, ‘उलगुलान’ या ‘जय जोहार’ हो सकता था?

वामपंथियों को संसदीय न्याय प्रणाली में कभी भरोसा बैठा ही नहीं, सो उनके लिए इस फ़िल्म का कोई बड़ा महत्व नहीं… हाँ, जो वामपंथी रहते जनेऊ और जाति दोनों ही बचाए रहे, वे मार्क्स, पेरियार और आम्बेडकर के इस घालमेल पर उल्टियाँ कर रहे हैं। तथाकथित विश्व गुरुओं की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया आई नहीं है, सो उनके मत का हम कोई प्रमाण मानते नहीं।

Jai Bhim Movie 2021 के बहाने – पहली बात

पहली बात एक्टिविज़्म के नाम पर लगभग शून्य तथाकथित अम्बेडकरवादियों से कि ‘Jai Bhim’ आपका ब्रांड नेम नहीं कि आप उसे अपनी मर्ज़ी से इस्तेमाल करेंगे। यह आज भारतीय उपमहाद्वीप, एशिया और विश्व में लोकतंत्र, संसदीय प्रणाली और समाजवादी संविधान में भरोसा रखने वाले मनुष्यों की आशा का नाम है। कोई यदि उनका नाम लिए बग़ैर भी उनके बताए मार्ग को सफल मार्ग बताता है, तो ख़ुशी-ख़ुशी उसे उसका प्रयोग करने दीजिए।

Jai Bhim Movie 2021 के बहाने – दूसरी बात

दूसरी बात आदिवासियत के नए-नए बने मुल्लाओं से। आदिवासियत, उलगुलान, ‘जय जोहार’ बहुत ही प्रिय वाक्य हैं। क्रांतिकारी भी लगता है। मैं व्यक्तिगत रूप से मानता हूँ कि पूँजीवादी विकास? की विकराल मनुष्य ही नहीं पृथ्वी के सम्पूर्ण परितंत्र की विनाशकारी व्यवस्था के विरुद्ध, ‘आदिवासियत का दर्शन’ एक कारगर उपाय है। हम सब को इस दिशा में आगे बढ़ना ही चाहिए, अन्यथा हम शीघ्र ही विनाश को प्राप्त होंगे।

लेकिन 2021 में आई इस फ़िल्म के सन्दर्भ में देखें तो ‘Jai Bhim Movie’ साउथ की अपनी दो पूर्ववर्ती फिल्में, ‘कर्णन’ और ‘असुरन’ के आगे की फ़िल्म है। उपरोक्त दोनों फिल्में हिंसा के माध्यम से व्यवस्था सुधार की बातें करती हैं और अपने मूल में वे असफल हैं। जिस बड़े फलक पर ‘जय भीम’ मूवी की नायका ‘सेंगिनी’ और वकील ‘चन्द्रू’ का संघर्ष फैला हुआ है। उस की शुरुआत् हम ‘असुरन’ Movie के अंत में देखते हैं, जहाँ असुरन Movie का नायक तमाम हिंसक प्रतिशोधों के उपरांत अपने बच्चे को कोर्ट के बाहर पढ़ने और हिंसक रास्ता छोड़ देने की बात करता है-

"देख चिंता! यदि ज़मीन होगी कोई भी छीन लेगा, पैसा होगा कोई भी लूट लेगा, तूँ पढ़ा लिखा होगा, तो तुझसे कोई कुछ नहीं छीन सकता। अगर तुझे अन्याय से जीतना है, तो पढ़, पढ़-लिखकर एक ताक़तवर इंसान बन। लेकिन अपनी ताक़त का ग़लत इस्तेमाल मत करना, जैसे आजकल लोग कर रहे हैं। नफ़रत हमें तोड़ती है, प्यार हमें जोड़ता है। हम एक ही मिट्टी के बने हैं, लेकिन जातिवाद ने हमें अलग कर दिया। हम सबको इस सोच से उबरना होगा।"

असुरन‘ मूवी का संवाद जब हम ‘जय भीम’ मूवी से मिलाकर देखते हैं। देखते हैं हम इस देश में जाति और जंगल को बचाये रखने में प्रयुक्त हुए तमाम हिंसक रास्ते, जो अपने मूल लक्ष्य और परिणाम में भले ही क्रांतिकारी लगे हों पर वे समस्या का कोई स्थायी हल अब तक उपलब्ध नहीं करा सके हैं। उल्टे सरकार, पुलिस और हिंसा के मार्ग में विश्वास रखने वाले अपने ही लोगों के बीच, वे चक्की के दो पाटों की तरह पिसते आ रहे हैं।

ऐसे में ‘असुरन’ के बाद Jai Bhim Movie के आदिवासी मुक्ति के अहिंसक और स्थायी जीत के भीमवादी मार्ग के बारे में भी ठंडे दिमाग से विचार करना चाहिए। विचार करना चाहिए कि आम्बेडकर, मार्क्स और पेरियार के नाम के सहारे उत्तर-दक्षिण में खड़ी हुई बहुजन राजनीति और सामाजिक आंदोलन देश में अपना एक अच्छा-ख़ासा वर्चस्व बनाये हुए है और आप हैं कि अभी भी गणतंत्र दिवस और छब्बीस जनवरी की परेडों में नृत्य करने तक ही सीमित हो।

राष्ट्रीय फलक पर न आपकी कोई स्वतंत्र पार्टी है न कोई बड़ा नेतृत्व। आदिवासी परिवेश में की कहानी का ‘Jai Bheem’ शीर्षक और वकील चन्द्रू के माध्यम से मूवी की नायिका ‘सेंगिनी’ को न्याय मिलना, इंगित करता है कि किसानों, दलितों और पिछड़ों के साथ-साथ इस देश में आदिवासियों के न्याय और मुक्ति का रास्ता संविधान और समाजवादी गणतंत्र में विश्वास की ओर ही जाता है, न कि किन्ही माओ और ट्रोट्स्की के रास्ते।

Jai Bhim Movie 2021 के बहाने – तीसरी बात

तीसरी बात वकील चन्द्रू के घर की दीवाल पर लगी तस्वीर, जिसमें बाएँ मार्क्स, बीच में आम्बेडकर और दायीं ओर पेरियार अवस्थित हैं। कहते हैं कि मध्यकाल में दक्षिण अथवा द्रविड़ देश से भक्ति आन्दोलन खड़ा हुआ था और उसकी चपेट में सारा भारत आ गया था। ‘Jai Bheem’ की ललकार उसी दक्षिण से उठी है। जिसमें मार्क्स के साथ पेरियार और आम्बेडकर भी हैं। वह आपके जाति और जनेऊ में लिपटे और भारतीय साम्यवादी बहुजन चिंतकों (बुद्ध, चार्वाक, मक्खलि गोशाल, अशोक, नाथ-सिद्ध, कबीर, रैदास, चोखामेला, फुले, पेरियार, आम्बेडकर) से दूर-दूर भागते द्विज कॉमरेडों की अब तक चली आई हठधर्मिता को फूँक से उड़ाने वाली है।

Jai Bhim Movie 2021 के बहाने – अंतिम बात

इस लेख में जो बात सबसे कम कही गई वो है, पिछड़ों से। आपको इस फ़िल्म में अगर अम्बेडकरवाद नहीं दिखा… तो अम्बेडकर की लिखी कम से कम कोई भी एक किताब तो आपको पढ़नी ही चाहिए…!

क्योंकि पीढ़ियों से तुम्हारी कंडीशनिंग “पूजने” की बनाई गई है। शंकर और विष्णु को पूजना छुड़वाया जाता है तो अम्बेडकर को पूजने लगते हो। अम्बेडकर की फोटो के आगे अगरबत्ती जलाने मात्र को ही अम्बेडकरवाद समझते हो, तो यह फ़िल्म तुम्हें निराश करेगी। फोटो के आगे अगरबत्ती जलाना, जय भीम का नारा लगाना, अम्बेडकर की फोटो वाली टीशर्ट या ताबीज पहनना अम्बेडकरवाद में हो सकता है, लेकिन सिर्फ वही अम्बेडकरवाद नहीं है। अम्बेडकर को उनकी फोटो और अगरबत्ती तक सीमित मत करो।

अम्बेडकर को सिर्फ पूजना नहीं, बल्कि उन्हें पढ़ना, समझना और उनके बताए रास्तों पर चलना अम्बेडकरवाद होता है। वंचितों के हक और सम्मान की लड़ाई लड़ना अम्बेडकरवाद होता है, और जब यह कर पाओगे, तभी सही मायने में तुम्हारे Jai Bheem बोलने का असली प्रभाव उत्पन्न होगा…

आपको तो Jai Bheem Movie को देखकर खुश होना चाहिए कि Jai Bhim Film का नायक एक पिछड़ा वकील है। अभी इतिहास में यह बात दर्ज़ हो रही है कि 1956 में बाबा साहेब अंबेडकर के अवसान और 1985 में मा. कांशीराम जी के उभार के बीच, पेरियार ललई सिंह, राम स्वरूप वर्मा, बाबू जगदेव प्रसाद और बी.पी मंडल ने उत्तर में लोकतंत्र, संविधान और अम्बेडकरवाद की आम जन में अलख जगाए रखी थी। वे आज भी वकील चन्द्रू अथवा लक्ष्मण यादव के रूप में इस कड़ीं को नहीं टूटने दे रहे हैं, यह लोकतंत्र और समाजवादी भारतीय संसदीय प्रणाली के लिए शुभ ही है।

Jai Bhim Movie 2021 A Real Story

यह फिल्म देखते समय मुझे ऐसा लग रहा था जैसे मैं इस फिल्म को जी रहा हूं। फिल्मों में आदिवासियों के साथ बाकी समाज पुलिस, अदालतों और सरकार का रवैया मेरा अच्छे से देखा हुआ है। इस फिल्म को देखते हुए वही सारे मामले मेरी आंखों के सामने घूम रहे थे जो मैं अपनी जिंदगी में खुद अदालत तक ले गया। लड़ा और जीत नहीं पाया।

पुलिस आदिवासियों को पीट रही थी तो मुझे बस्तर की पुलिस याद आ रही थी।

आदिवासियों की आंखों में मिर्ची पाउडर डालने का दृश्य देख कर मुझे वह दृश्य याद आ रहा था जब दंतेवाड़ा के एसपी अंकित गर्ग के बंगले पर आदिवासी पत्रकार लिंगा कोड़ोपी के मलद्वार में मिर्च और तेल से डूबा हुआ डंडा ठूंस दिया गया था।

जब मारे गए आदिवासी की पत्नी अपने पति की लाश का फोटो देखती है और बाकी की महिलाएं उसे चुप करा रही हैं। वे दृश्य देख कर मुझे सिंगाराम गांव  की याद आ रही थी जहां पुलिस ने 19 आदिवासियों को लाइन में खड़ा करके गोली से उड़ा दिया था इस मामले को हम कोर्ट में ले गए थे 12 साल हो चुके हैं मुकदमा अभी भी चल रहा है, इस गांव में जब मारे गए आदिवासियों के फोटो हमने उनके घर वालों को दिखाए तो ठीक वैसा ही दृश्य था जैसा इस फिल्म में दिखाया गया है।

वकील चंदरू का काम देखते हुए मुझे अपने वकील याद आ रहे थे मैंने भी आज तक किसी मुकदमे के लिए किसी वकील को कोई फीस नहीं दी मुझे बहुत अच्छे वकील मिले थे।

लेकिन मुझे जज इतने अच्छे नहीं मिले जितने फिल्म में चंदरू को मिल गए।

हमने भी अनेकों हैबियस कॉरपस  फाइल की है।

एक मामले में तो नेन्ड्रा गांव की दो लड़कियों को पुलिस वाले उठाकर ले गए थे उनके दोनों भाइयों ने हैबियस कॉरपस हमारे कहने से फाइल की थी। लेकिन पुलिस वालों ने पीटकर और जज ने धमका कर दोनों भाइयों से वह हैबियस कॉरपस वापस करवा ली थी।

फिल्म देखते हुए मुझे देजावू का अनुभव हो रहा था। जिसे देख कर लग रहा था कि ऐसा मैं पहले भी देख चुका हूँ।

कई बार मुझे लगा मैं चंदरू हूं क्योंकि मैं भी इसी तरह आदिवासियों से उनकी आपबीती सुनता था। क्रोधित होता था, दुखी भी होता था। और मामलों को अदालत में ले जाता था। मेरे द्वारा दायर किए गए आदिवासियों के सैकड़ों मामले आज भी अदालतों में धूल खा रहे हैं। कुछ मामलों में फैसला तो मिला लेकिन इंसाफ नहीं मिला।

सारकेगुड़ा में फैसला आ गया कि सीआरपीएफ द्वारा मारे गए 17 आदिवासी निर्दोष थे। लेकिन किसी भी अपराधी के खिलाफ ना तो एफआईआर लिखी गई, ना मुकदमा चला, ना ही सजा मिली।

बहरहाल इस फिल्म ने आदिवासियों की हालत पुलिस की क्रूरता और भ्रष्टाचार को एक छोटे से फ्रेम में दिखाने की कोशिश की है। लेकिन यह समस्या बहुत बड़ी है इसके आरोपियों में सरकारी राजनीतिक नेता, प्रशासनिक अधिकारी, जज, भ्रष्ट वकील और पूरा समाज है।

मैं इस फिल्म को आप सभी को देखने की सिफारिश करता हूं!

क्या आदिवासियों के जीवन का अनमोल वक़्त लौटाया जा सकता है?

Jai Bhim
Jai Bhim Movie 2021 Real Story – आदिवासियों पर हो रहे उत्पीड़न को समझने के लिए जरूर देखिए!
Amazon Prime Video | Watch Jai bhim Hindi Trailer
- Advertisement -

More articles

2 टिप्पणी

कोई जवाब दें

Please enter your comment!
Please enter your name here

- Advertisement -