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सोमवार, जून 14, 2021

Shab e meraj | सफ़र सातवें आसमान का

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इस्लामिक Mythology में जो घटनायें बड़ी चर्चित हैं, उनमें एक घटना Shab e meraj की है। यानि वह घटना जब मुहम्मद बुर्राक के सहारे जिब्रील नाम के फरिश्ते के साथ सात आसमानों की सैर पे गये।

कुरान अपनी आयत के जरिये बस इतना बताती है कि वह जात पाक है, जो ले गया अपने बंदे को मस्जिदे हरम से Masjid Al Aqsa तक, जिसके इर्द-गिर्द हमने बरकतें तय कर रखी हैं। (17:01)

अब ये तफ्सीर से आपको हदीसों में बताई गयी है जो बताती हैं कि एक रात (ख्वाब जैसी हालत में) जिब्रील उनके घर आये और पैगम्बर को बुर्राक पे बिठा के काबे (मक्का) से मस्जिदे अक्सा (जेरुसलम) ले गये और उसके बाद आसमानों की सैर कराई।

पहले आसमान पर पूछताछ (जैसे किसी बंगले या फैक्ट्री के गेट पर एंट्री करते वक्त होती है) के बाद दाखिल हुए, जहां हजरत आदम अलैस्सलाम से मुलाकात और दुआ सलाम हुई। फिर दूसरे आस्मान पर पंहुचे जहां सेम प्रोसीजर के साथ हजरत याहया और ईसा से मुलाकात हुई, तीसरे पर हजरत यूसुफ से, चौथे पर हजरत इदरीस से, पांचवे पर हजरत हारून से, छठे पर हजरत मूसा से और सातवें पर हजरत इब्राहीम से मुलाकात हुई।

इस सातवें आसमान पर उन्होंने बैतुल मामूर के भी दर्शन किये। यह वह आसमानी पवित्र जगह है जो काबे की एकदम सीध में पड़ती है (तब यह पता नहीं था कि पृथ्वी रोटेशन की वजह से चारों दिशाओं में घूमती है और उसकी कोई एक सीध नहीं, अब पता भी है तो आप कुछ कर नहीं सकते) बैतुल मामूर का तवाफ सत्तर हजार फरिश्ते करते हैं और जो एक बार कर लेता है उसे अगला मौका कयामत तक नहीं मिलता।

यहां दोनों हजरत सिदरतुल मुंतहा पंहुचे, जो सातवें आसमान की आखिरी हद है। यहां हाथी के कान जैसे पत्तों और घड़े जैसे फलों वाला एक पेड़ था जिसकी जड़ों से चार नहरें फूट रही थीं। दो नहरें बातिन हैं जो जन्नत में बहती हैं और दो नील और फरात हैं जो जमीन पर बहती हैं। (गंगा जब स्वर्ग से उतर सकती है तो नील और फरात क्यों नहीं), फिर यहां से जिब्रील आगे नहीं जा सकते थे तो मुहम्मद साहब अकेले गये।

वहां न सिर्फ उन्होंने जन्नत के बाग और नहरे कौसर देखी, बल्कि दोजख की भी सैर की और कुछ लोगों को सजायें भी होते देखीं। यहां उन्हें उम्मत के लिये पचास नमाजों का इनाम मिला जो बाद में वापसी में हजरत मूसा के टोकने, समझाने और वापस भेजने के प्रोसेस के बाद पांच नमाजों तक एडिट हुआ। यह विवरण इब्ने कसीर, अल तबरी, कुरतबी, सही मुस्लिम, सही बुखारी और सुनन हदीसों से लिया गया है।

यह पूरी परिकल्पना ऐसी है जैसे आसमान न हुए कोई सात माले की बिल्डिंग हो गयी जहां आप सीढ़ियों के सहारे एक मंजिल से दूसरे मंज़िल तक पंहुच सकते हैं। इसे मानना न मानना आपके विवेक पर करता है, लेकिन आज की जानकारी के हिसाब से हम इस बड़ी सी पृथ्वी से बाहर निकल कर थोड़ी जांच पड़ताल तो कर ही सकते हैं।

पृथ्वी से सबसे नजदीकी पिंड है चंद्रमा, लेकिन इसके बीच भी इतनी दूरी है कि तीस पृथ्वी आ जायेंगी और अगर हम सौ किलोमीटर की गति से चंद्रमा की तरफ चलें तो भी एक सौ साठ दिन लग जायेंगे।

इसके बाद हमारा एक नजदीकी ग्रह मंगल है जो 225 से 400 मिलियन किमी की दूरी (परिक्रमण की भिन्न स्थितियों में) पर है, जहां रोशनी को भी पंहुचने में बीस मिनट लग जाते हैं, Space में प्रकाश से तेज और कोई चीज नहीं चल सकती और प्रकाश की गति तीन लाख किमी प्रति सेकेंड होती है। Space में अब तक सबसे दूर उड़ने वाला वॉयेजर प्रोब, जो 17 किमी प्रति सेकेंड की गति से चल रहा है, हमारे अपने सौर मंडल से ही बाहर निकलने में इसे तीस हजार साल लग जायेंगे।

अब अगर हम इस सौरमंडल से बाहर निकलें तो पंहुचेंगे इंटरस्टेलर नेबरहुड में जहां दूसरे सौरमंडल हैं। अपने सोलर सिस्टम में आप दूरी को एस्ट्रोनॉमिकल यूनिट (पृथ्वी से सूर्य की दूरी) में माप सकते हैं लेकिन बाहर निकलने पर दूरी मापने के लिये प्रकाशवर्ष (9.461 ट्रिलियन किलोमीटर) का प्रयोग करना पड़ता है, यानि उतनी दूरी जितना सफर सूर्य की रोशनी एक साल में करती है।

सूरज के बाद हमारा सबसे नजदीकी तारा प्रॉक्सिमा सेंटौरी है जो हमसे 4.24 प्रकाशवर्ष दूर है। अगर वॉयेजर की गति (17KM/प्रति सेकेंड) से ही उस तक पंहुचने की कोशिश की जाये तो सत्तर हजार साल लग जायेंगे। अब यह सोलर मंडल जिस गैलेक्सी का हिस्सा है, खुद उस गैलेक्सी का फैलाव एक लाख प्रकाशवर्ष का है, जिसमें बीस हजार करोड़ तारे और ग्रह हैं और मजे की बात यह है हम रात में उनका सिर्फ एक प्रतिशत देख पाते हैं।

अब इससे भी हम थोड़ा और दूर जायें तो हमें मिलेगा लोकल ग्रुप ऑफ गैलेक्सीज, जिसमें 54 गैलेक्सीज हैं और इसका फैलाव (एक सिरे से दूसरे सिरे तक) एक करोड़ प्रकाशवर्ष है।

और जब इस सर्कल को जूमआउट करेंगे तो मिलेगा वर्गो सुपर क्लस्टर, जिसका फैलाव ग्यारह करोड़ प्रकाशवर्ष है, तो सोचिये कि यह सर्कल कितना बड़ा होगा, लेकिन यह बड़ा सा सर्कल भी लैनीकिया सुपर क्लस्टर में मात्र एक राई के दाने बराबर है, जिसमें एक लाख तो गैलेक्सीज हैं और इसका फैलाव 52 करोड़ प्रकाशवर्ष का है।

अब यह भी सब कुछ नहीं है, बल्कि यह टाईटैनिक लैनीकिया सुपर क्लस्टर का एक छोटा सा हिस्सा भर है, और लैनीकिया सुपर क्लस्टर एक छोटा सा हिस्सा भर है उस ऑबजर्वेबल यूनिवर्स का, जिसे हम आज तक देख पाये हैं। जिसमें कुल दो लाख करोड़ गैलेक्सीज हैं, हमारी पृथ्वी से इसके एक सिरे की दूरी 4,650 करोड़ प्रकाशवर्ष है, यानि कुल फैलाव 9,300 करोड़ प्रकाशवर्ष का है।

हमारे यूनिवर्स की उम्र 13.7 अरब वर्ष की मानी जाती है, क्योंकि उससे पहले की रोशनी अब तक डिटेक्ट नहीं की जा सकी है। कॉस्मिक इन्फ्लेशन थ्योरी के अनुसार इसके पार भी मल्टीवर्स हो सकता है, जिसके एग्जेक्ट फैलाव का कोई सटीक अनुमान नहीं लगाया जा सकता और संभव है कि पूरा ऑब्जर्वेबल यूनिवर्स ही पृथ्वी पर फुटबाल जैसी (पूरे सुपर यूनिवर्स में तुलनात्मक रूप से) हैसियत रखता हो।

बहरहाल 54 गैलेक्सीज वाला इतना बड़ा लोकल ग्रुप, ऑब्जर्वेबल यूनिवर्स का मात्र 0.00000000001 प्रतिशत है, और इसमें इतने ग्रह हैं जितने पूरी पृथ्वी पर रेत के जर्रे भी नहीं हैं। सोचिये हम यूनिवर्स में कहां एग्जिस्ट करते हैं और हमारी हैसियत क्या है?

किसी एक रेगिस्तान के सामने खड़े हो कर सोचिये कि किसी एक जर्रे पर कुछ माइक्रो बैक्टीरिया चिपके हों तो क्या आप उनके कर्म, उनकी तकदीर लिखेंगे, उनके लिये जन्नत दोजख बनायेंगे? आप ऐसा सोच सकते हैं, मैं नहीं।

बहरहाल, अब पूरे परिदृश्य को सामने रखिये और मुझे बताइये कि पहला, दूसरा वाले आसमान कहां हैं और उनके बीच क्या दूरी है? और खुदा की दुनिया कहाँ हो सकती है?

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