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सोमवार, जून 14, 2021

Atma kya sach mein hoti hai? Death kya hai?

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जो लोग Atma में विश्वास करते हैं, वे भी किसी निकटतम की मृत्यु पर फूट-फूट कर रोते देखे जाते हैं, क्यों? जब Aatma मरती नहीं तो फिर उनके इस विलाप का क्या अर्थ है? दरअसल लोगों को स्वयं के विश्वास पर ही भरोसा नहीं है। Life after death जैसे बेकार के विश्वास भी उन्हें कठिन परिस्थितियों में सुख नहीं देते। कभी कार्ल मार्क्स ने इन अंधविश्वासो को एक तरह का नशा कहा था। और सच भी है कि, ये नशे से ज़्यादा कुछ है भी नहीं। आइये अब इस सत्य को समझते हैं!

अब ऐसा वक़्त आ गया है कि ऐसे अंधविश्वासों को तिलांजलि देकर सत्य को समझा जाए! जिससे मृत्यु का निडरता से सामना किया जा सके। अगर आप वैज्ञानिक सच को स्वीकार कर लेते हैं। और थोड़ा चिंतन-मनन करके अपनी समझदानी में यह बात बैठा लें कि मेरी तरह हर इंसान हौले-हौले अपनी मृत्यु की तरफ बढ़ रहा है तो आपको सभी से प्रेम करने में ज्यादा आसानी होगी। वरना तो इस्लामी आतंकवादियों की तरह मृत्यु के बाद के जीवन की आशा में, जीवित लोगों को मारना अपना धर्म समझते रहेंगे।

Aatma के वजूद पर गीता क्या कहती हैं?

जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च।
तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि॥

भागवत गीता, 2.27

जन्मने वाले की मृत्यु निश्चित है और मरने वाले का जन्म निश्चित है।
इसलिए जो अटल है अपरिहार्य है, उसके विषय में तुमको शोक नहीं करना चाहिये।।

गीता में कहा गया है कि Aatma कभी नहीं मरती। मृत्यु के बाद ईश्वर Aatma को न्याय देकर उसे दोबारा जन्म लेने का अधिकार देते हैं। Aatma का वजूद मान कर शत्रु की हत्या को उचित ठहराया गया है।

अगर वो इस बात को बहुत पहले ही समझ लेते कि मृत्यु के बाद कुछ नहीं है, तो समाज के दबे-कुचले लोगों को न्याय की उम्मीद कहीं ज्यादा होती। क्योंकि मरने वाले और मारने वाले, दोनों में से किसी के पास भी मृत्यु के बाद ईश्वर से न्याय की उम्मीद न होती। साथ ही स्वर्ग-नर्क मिलने की आशा भी न रहती।

Aatma की परिकल्पना कब की गयी?

जिस समय से पृथ्वी पर एक कोशिकीय जीव के रूप में जीवन की शुरुआत हुई थी, उस समय से ही स्वयं को खतरे से बचाने की प्रवृत्ति और जीवन को सुरक्षित रखने की प्रवृत्ति का जन्म जीवों के अंदर एक अविभाज्य अंग के रूप में हुआ। वो जीव जिनमे स्वयं को बचाने की प्रवृत्ति नहीं थी वो पृथ्वी से विलुप्त हो गये। यही प्रवृत्ति विकास के क्रम में मानव तक पहुँचने पर भय के रूप में स्थापित हुई। मौत जीवन के लिये सिर्फ एक छोटी या बड़ी समस्या भर नहीं है बल्कि यह जीवन को पूरी तरह ख़ारिज करने की घटना है।

जीवन को बचाने की प्रवृत्ति का अधिकतम रूप मृत्यु के प्रति भय के रूप में प्रदर्शित होता है। हमेशा के लिए पूरी तरह से ख़त्म हो जाने का विचार हमारे मन में खलबली मचा देता है। जीवन को बचा पाने की ललक, जीवन को पाने की भूख का परिणाम यह हुआ कि प्राचीन काल से मानव ने उस ‘Aatma’ की परिकल्पना कर ली, जो मृत्यु से परे है।

क्यों चेतना को आत्मा कहा गया है?

वहीं Aatma की परिकल्पना को स्थापित करने में एक और मानवीय गुण ने साथ दिया, वह गुण उसने विकास (Evolution) के क्रम में पाया, जिसे चेतना (Consciousness) कहते हैं। यह विचार (Thought) या बोध (Perception) आदि, गुणों के लिए एक सामान्य नाम भर है। हमारे हाथ, पैर, आँख, नाक, पेट, छाती आदि नहीं हैं, बल्कि इस सब के अंदर कुछ रहता है, ऐसा विचार हमें चेतना की वजह से आता है।

इसलिये प्राचीन मानव के विचार में Aatma की परिकल्पना आयी। शरीर से अलग Atma की परिकल्पना ने ही प्राचीन समय में भूत-प्रेत की परिकल्पना को भी जन्म दे दिया। धीरे-धीरे मानव सभ्यता के उद्भव में धर्मों का जन्म हुआ, और Atma की परिकल्पना ने धर्मों के अंदर ठोस रूप ले लिया।

भारत में Aatma के बारे में जो समझ पैदा हुई वो यह थी कि Atma, परमात्मा का ही छोटा हिस्सा है जो अलग-अलग योनियों में पुनर्जन्म लेता है। जब पाप व पुण्य बराबर हो जाते हैं तो वापस परमात्मा में मिल जाता है, जिसे मोक्ष मिल जाना कहते हैं।

वहीं यहूदी, ईसाई, इस्लाम धर्म ने माना कि मृत्यु के बाद Life after death – Atma यानि रूह क़यामत के दिन का इंतज़ार करती है और उस दिन पाप और पुण्य के आधार पर स्वर्ग या नर्क में जाती है।

प्राचीन मिस्र के लोगों का भी मानना था कि मरने के बाद इंसान एक लंबे सफ़र पर निकल पड़ता है। ये सफ़र बेहद मुश्किल होता है जिसमें वो सूर्य देवता की नाव पर सवार होकर ‘The Hall of Double Truth’ तक पहुंचता है। यहां सच और न्याय की देवी की कलम के वज़न की तुलना इंसान के दिल के वज़न से की जाती है। प्राचीन मिस्र के लोगों का मानना था कि इंसान के सभी भले और बुरे कर्मों का हिसाब उसके दिल पर लिखा जाता है। अगर इंसान ने सादा और निष्कपट जीवन बिताया है तो उसकी आत्मा का वज़न पंख की तरह कम होगा और उसे Osiris के स्वर्ग में हमेशा के लिए जगह मिल जाएगी। किंवदंतियों के मुताबिक़, सच्चाई का पता लगाने वाले इस हॉल में आत्मा का लेखा-जोखा देखा जाता है और उसका फ़ैसला होता है।

आधुनिक जीव विज्ञान क्या कहता है?

लेकिन Modern Biology- Life after death – aatma के अस्तित्व को पूरी तरह गलत साबित करती है। इसी प्रकार भूत, पुनर्जन्म, स्वर्ग, नर्क आदि सभी परिकल्पनाओं को भी गलत साबित करती है। आधुनिक विज्ञान की बहुत सी बातें व्यावहारिक बुद्धि से समझी नहीं जा सकतीं, जैसे कि आइंस्टीन की “General theory of relativity”, जिसके अनुसार समय और स्थान वक्राकार हैं।

वैसे ही आधुनिक जीव विज्ञान के इस कथन को समझना आसान नहीं कि हमारे अंदर कोई Atma नहीं होती। फिर भी, साधारण लोगों की समझ के लिये एक किताब प्रसिद्ध वैज्ञानिक फ्रांसिस क्रिक द्वारा लिखी गयी जिन्हे 1962 में नोबल पुरस्कार मिला था। उस किताब का नाम है The Astonishing Hypothesis: The Scientific Search For The Soul (Vigyaan Dwara Atma Ki Khoj) अगर Atma नहीं है। तो फिर…

जीवन क्या है? और मृत्यु क्या है?

जीव विज्ञान के अनुसार जीवन कोई वस्तु, शक्ति या ऊर्जा नहीं है बल्कि यह कुछ गुणों के समूह का सामान्य नाम है जैसे की उपापचय, प्रजनन, प्रतिक्रियाशीलता, वृद्धि, अनुकूलन (Metabolism, Reproduction, Responsiveness, Growth, Adaptation) आदि। अभी तक हम जितना जानते हैं उसके अनुसार ये गुण जटिल कार्बन यौगिकों के मिश्रण द्वारा प्रदर्शित होते हैं जिन्हे कोशिका के नाम से जाना जाता है। उसमें से सबसे सरल कोशिका है, Virus! जिसे शायद आप जानते होंगे।

क्या कोशिकाओं का जटिल समूह ही जीव है?

अपनी सहज प्रवृत्ति की वजह से यदि यह कोशिकाएं एक दूसरे के साथ सहयोग करती हैं और किसी वातावरण में एक साथ रहती है तो वे एक समूह बनाती है जिसे हम जीव कहते है। अगर किसी जीव में कुछ कोशिकाएं बाकि कोशिकाओं के सहयोग में नहीं रहती तो उसे कैंसर कहते हैं। जब ज़्यादा से ज़्यादा कोशिकाएं एक दूसरे के सहयोग में आती हैं और जटिल समूह का निर्माण करती हैं तो हमें और दूसरे जीव प्राप्त होते हैं जैसे कि कीड़े मकोड़े, सरीसृप, मछली, स्तनधारी और मनुष्य।

क्या हृदय में आत्मा का वास है?

विकास के क्रम में हर पड़ाव पर जीवों में कुछ नये गुणों की वृद्धि हुई और जब विकास क्रम मानव तक पहुंचा तो जो गुण विकसित हुआ वह था “बोध” (Consciousness)। बहुत पहले, पूरे विश्व में सभी मानव जातियों में यह विश्वास था कि Atma हृदय के अंदर रहती है। उदाहरण के लिये भारत में भी महानारायण उपनिषद और चरक सहिंता में यह बात कही गयी है। 1964 में James D. Hardy ने अपने एक रोगी के हृदय के स्थान पर एक चिंपांज़ी के हृदय का प्रत्यारोपण किया। 1967 में Christiaan Barnard ने एक रोगी के हृदय के स्थान पर दूसरे मनुष्य के हृदय का प्रत्यारोपण किया। तब इन सब वजह से हृदय में आत्मा के उपस्थित होने के विश्वास को बड़ा धक्का लगा था।

क्या मस्तिष्क में आत्मा का वास है?

हर मानव के शरीर में अनुमानतः लगभग 37 लाख करोड़ कोशिकाएं होती हैं। और हर कोशिका में जीवन है और मानव इन्ही कोशिकाओं का समूह है, तो इस प्रकार आपके अंदर 37 लाख करोड़ आत्माएं वास करती हैं। मृत्यु होने पर, 24 घंटों के बाद आपकी त्वचा की कोशिकाएं मरने लगती हैं, 48 घंटों बाद हड्डियों की कोशिकाएं मरने लगती है। 3 दिन के बाद रक्त धमनी की कोशिकाएं मरती हैं। यही कारण हैं कि Life after death के लिए अंगदान (ऑर्गन डोनेशन) संभव हुआ। अगर हम अपनी आँख दान कर दें तो आंख की कोशिकाएं वर्षों जीवित बची रहेंगी। जब ब्रेन स्ट्रोक होता हैं, तो दो से तीन मिनट के अंदर मस्तिष्क की वो कोशिकाएं मर जाती हैं, जहाँ पर रक्त प्रवाह रुक जाता है।

मृत्यु क्या होती है? Life after death कैसी होती है?

अगर आपको अल्जाइमर (Alzheimer) रोग हो जाये तो मस्तिष्क की कोशिकाएं एक-एक कर मरने लगेगीं और पूरा मस्तिष्क आहिस्ता-आहिस्ता मर जायेगा (लेकिन ब्रेन स्टेम जीवित बचा रह जाएगा) लेकिन हम जीवित होंगे, एक वनस्पति की तरह। तो फिर, मृत्यु क्या है? मनुष्य की मृत्यु उसके Brain Stem की मृत्यु होती है।

मस्तिष्क के दूसरे हिस्से शरीर की बहुत सी चीज़ों को संचालित करते हैं जैसे की वाकशक्ति, दृष्टि, सुनने की शक्ति, स्वाद, सूंघने की शक्ति, चलने की शक्ति, सोचने की शक्ति, बुद्धिमत्ता, मनोभाव आदि। मस्तिष्क का सबसे नीचे का हिस्सा जिसे ब्रेन स्टेम कहते हैं, वह बहुत ही आधारभूत क्रियाएं सम्पादित करता है, जैसे की हृदय गति, श्वास की प्रक्रिया, रक्तचाप आदि। जब इंसान की सांसे रुक जाती है तो हृदय धड़कना बंद कर देगा, रक्त प्रवाह बंद हो जाएगा, एक-एक कर के सारे ऑर्गन काम करना बंद कर देंगे।

सांस का रुकना या हृदय गति का रुकना मृत्यु का कारण हो सकता हैं, लेकिन यह मृत्यु नहीं है, इस अवस्था से बाहर निकला जा सकता है। परंतु ब्रेन स्टेम काम करना बंद कर दे तो फिर उसे वापस क्रियान्वित नहीं किया जा सकता। अगर ब्रेन स्टेम मर जाता है तो फिर दूसरे ऑर्गन जीवित भी हैं तो भी मनुष्य मृत ही है, ज़्यादा से ज़्यादा हम जीवित ऑर्गन का दान किसी और जीवित शरीर को कर सकते हैं। अल्जाइमर रोग के आखिरी पड़ाव में ब्रेन स्टेम को छोड़कर सभी मस्तिष्क कोशिकाएं मर जाती हैं।

क्या ‘मैं’ का बोध ही आत्मा है?

हमारे भाव, विचार और बोध मस्तिष्क के इस दूसरे हिस्से की वजह से होते हैं। ब्रेन स्टेम का इसमें कोई कार्य नहीं। तो फिर हमारा आत्म बोध यानि “मैं” की भावना सेरिबैलम (Cerebrum or Cerebellum) की वजह से हैं न की ब्रेन स्टेम की वजह से। हम Life after death- Atma के बोध के बिना भी जीवित वस्तु की तरह रह सकते हैं, जैसे कि वनस्पति या अल्जाइमर रोगी।

अगर हम किसी रोग या दुर्घटना में नहीं मरते तब भी वृद्ध अवस्था में मृत्यु हो जाती है, क्यों? 1962 में लियोनार्ड हेफलिक (Leonard Hayflick) ने एक खोज की थी, कि मानव शरीर की कोशिकाएं अधिकतम 50 गुना विभाजित हो सकती हैं, जिसे हेफलिक सीमा (Hayflick Limit) कहते हैं। हमारे बचपन में कोशिका विभाजन की दर काफी ऊँची होती है, लेकिन समय के साथ यह दर धीरे होती जाती है। कोशिका का विभाजन कोशिका के नाभिक (Nucleus) में पाए जाने वाले डीएनए द्वारा होता है और DNA के सिरे पर टेलोमेर (Telomere) होता है जो हेफलिक सीमा निर्धारित करता है।

कोशिका विभाजन नियंत्रण क्या है?

टेलोमेर 50 बार से अधिक विभाजित नही हो पाता। इसकी खोज 1993 में बारबारा मैक्लिंटोक (Barbara McClintock) ने की, जिसके लिये उन्हें नोबल पुरस्कार मिला था। टेलोमेर दरअसल अनियंत्रित कोशिका विभाजन को रोकता है, दूसरे शब्दों में कहें तो यह कैंसर से बचाता है लेकिन इस नियंत्रण की प्रक्रिया में जब हम वृद्धावस्था में पहुँचते हैं तब तक टेलोमेर कोशिका विभाजन नियंत्रण की सीमा पूरी कर चुका होता है, उसके बाद कोशिका विभाजन सिर्फ कैंसर को जन्म देता है।

जिसका मतलब है कि अगर हम किसी और कारण से नहीं मरे तो वृद्धावस्था में कैंसर ही मृत्यु की वजह बन जाएगा। बचने का कोई रास्ता नहीं, मृत्यु निश्चित है। लेकिन सभी जीवों की मृत्यु ही होगी ऐसा भी ज़रूरी नहीं, जैसे कि Virus पैदा होने के बाद कभी मरता नहीं, बस कुछ परिस्थितियों में जैसे अधिक तापमान या किसी रसायन से मारा जा सकता है। वैसे ही ‘जेली फिश’ जो करोड़ो साल पहले Evolution के क्रम में बनी थी, वह कभी नहीं मरती। बस यही है जीवन, मृत्यु, चेतना, ऊर्जा, आत्मा… अब इसे जैसे चाहे समझ लीजिये।

जब आत्मा नहीं तो किसी Life after death या ReBirth का सवाल ही नहीं! बस आत्मा का सच यही तक है!


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