नास्तिक किसे कहते है?

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जो धर्म डराए, जो किताब भ्रम पैदा करे, उसमें शिद्दत से सुधार की जरूरत है!
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भारत में नास्तिकों को लेकर तरह-तरह की भ्रांतियाँ पायी जाती है। कोई कुछ मानता है, और कोई कुछ। यहां नास्तिक का मतलब पश्चिम के Atheist जैसा आसान नहीं है। इसलिए कई लोग पूरे मनोयोग से नास्तिकों के बारे में भ्रांतियाँ पाले रहते हैं। मसलन वो सोचते हैं की Nastik अनैतिक मनुष्य होते हैं और मूल्यहीन कार्यों को बढ़ावा देते हैं।

भारत में अन्य लोग ऐसा समझते हैं कि Nastik समाज और देश के लिए खतरनाक होते हैं। जबकि सच इस से जुदा है। यह आप नास्तिकों के बारे में भारत में व्याप्त विभिन्न संकल्पनाओं को पढ़ने और कुछ तर्कों पर गौर करने के बाद ख़ुद ही समझ जायेंगे।

Nastik अच्छे होते हैं या बुरे, नैतिक होते हैं या अनैतिक, मानवता में यकीन रखते हैं या नहीं आदि बातों पर गौर करने से पहले, हम यहां स्पष्ट करने का प्रयास करेंगे कि नास्तिक किसे कहते है? नास्तिकों के बारे में भारत में कई प्रकार की संकल्पनायें अथवा समझ लोगों में पहले से व्याप्त है– वह क्या है?

Nastik meaning – संकल्पना

Nastik meaning – First concept

एक संकल्पना के अनुसार, नास्तिक शब्द दो शब्दों के मेल से बना है – नास्ति + क। ‘नास्ति’ का अर्थ है कि ‘जो नहीं है’ और ‘क’ का अर्थ है ‘यकीन करने वाला’। इस तरह से इसका अर्थ हुआ जो यह मानता है कि ‘नहीं है’ अथवा ‘जिसका अस्तित्व ही नहीं है’।

इसका अभिप्राय यह है, ऐसे लोग जो यह मानते हैं कि इस संसार को चलाने वाला कोई ईश्वर जैसी सत्ता नहीं है। कोई देवी-देवता आदि नहीं हैं। कोई भी ऐसी अलौकिक शक्ति नहीं है, जो इस सृष्टि को चलाती है। और उसका संचालन और नियंत्रण करती है। अब चूँकि नास्तिक ईश्वर जैसी सत्ता में यकीन नहीं करते, इसलिए प्रायः इन्हें अनीश्वरवादी भी कहा जाता है।

Nastik meaning – Second concept

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दूसरी संकल्पना के अनुसार, जो भी व्यक्ति वेद की सत्ता में यकीन नहीं करता वह नास्तिक है। मनुस्मृति के अध्याय 2, श्लोक 11 के अनुसार, जो कुतर्क से धर्ममूलों का अपमान करे। जो वेद की निंदा करे, उसे नास्तिक कहा गया है। यदि धार्मिक किताबों, जैसे कि वेद, उपनिषद आदि पर आप सवाल उठाते हैं, उसमें कमी निकालते हैं या उससे अलग राय रखते हैं। तो धार्मिक गुरु आपको सभा से बाहर कर सकते हैं। आप अगर जस का तस स्वीकार नहीं करते, तो आप पर वे नास्तिक का ठप्पा लगा देंगे। दरअसल नास्तिक शब्द भारतीय सन्दर्भ में बहुत ही नकारात्मक और गाली जैसा शब्द माना जाता है।

भारत में उपरोक्त विचार वालों को प्रायः अनीश्वरवादी कहा जाता है। भारत में बौद्ध, जैन तथा चार्वाक दर्शनों को इसी कारण से नास्तिक अथवा अनीश्वरवादी दर्शन की संज्ञा देते हैं।

विवेकानंद की संकल्पना

विवेकानंद ने उपरोक्त दोनों संकल्पनाओं से अलग एक नई संकल्पना दी थी। उन्होंने कहा था जो व्यक्ति खुद में यकीन नहीं करता, वह Nastik है। उनके अनुसार ईश्वर में यकीन करना या नहीं करना ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं है, परंतु खुद में यकीन करना ज्यादा महत्वपूर्ण है।

कुछ लोग नास्तिकों को नकारात्मक मानने के कारण अथवा चीजों को बिना तर्क के नहीं मानने के कारण भी नास्तिक कहते हैं। जो ‘नहीं’ को जीवन का आधार बना ले, जो ‘ना’ को जीवन की शैली बना ले। जो हर चीज को सवाल के दायरे में ले आये। ऐसे लोग Euripides की उस पंक्ति को मानते हैं, कि-

हर चीज पर सवाल करो, कुछ सीखो और किसी भी चीज का ज़वाब मत दो!

Euripides

ऐसे लोग बिना प्रमाण के, बिना वैज्ञानिक तथ्य अथवा अनुभव के किसी चीज पर विश्वास नहीं करते। इसलिए इन्हें भी नास्तिक कहा जाता है। जबकि इस पर, धर्म और ईश्वर में आस्था रखने वाले लोग कहते हैं कि ईश्वर दर्शन आसान नहीं है! कि वह आपको आसानी से मिल जाये। इसके लिए वर्षों तपस्या करनी पड़ती है। ईश्वर को पाने के लिए उस लायक बनना पड़ता है तब जाकर ईश्वर आपको दर्शन देता है। वहीं लोग यह भी कहते हैं कि ईश्वर तो निराकार है, फिर उसका सबूत कैसे दिया जाय? उसे साबित कैसे किया जाय? आपको मानना है तो मानो, नहीं मानना है तो मत मानो।

आईन्स्टाईन कहते थे, कि “सवाल पूछना, बन्द नहीं करना ज्यादा महत्वपूर्ण है”। वे यह भी कहते थे, कि “कभी भी जिज्ञासा को न त्यागें”। उन्होंने सीखने के बारे में कहा है, कि “मैं अपने विद्यार्थियों को कभी नहीं सिखाता हूँ। मैं सिर्फ उन्हें वह परिस्थिति देने का प्रयास करता हूँ, जिसमें वे ख़ुद सीख सकें”।

शहीद भगत सिंह भी इसी प्रकार की बात करते थे। वे कहते हैं, कि “कोई व्यक्ति जो प्रगति के लिए खड़ा है, उसे हर पुराने विश्वास की आलोचना करना, उस पर सन्देह करना तथा उसे चुनौती देना होगा”। वे एक जगह कहते हैं, कि “उसका तर्क एक भूल हो सकती है, गलत हो सकता है, गुमराह करने वाला और कभी-कभी निराशाजनक हो सकता है। लेकिन वह सुधार करने के लिए प्रतिबद्ध है, क्योंकि कारण जानना उनके जीवन का मार्गदर्शक सितारा होता है। लेकिन केवल आस्था और अन्धश्रद्धा खतरनाक है। यह दिमाग को कुंद कर देता है और व्यक्ति को प्रतिक्रियात्मक बनाता है”।

अब बात करते बौद्ध मतावलंबी की। कई बौद्ध मतावलंबी भी Nastik कहलाना पसंद नहीं करते। वे भी प्रकृति के नियम, मन की शुद्धता आदि को धर्म कहते हैं। यदि आप धर्म में यकीन करते हैं, तो उनके अनुसार आप नास्तिक नहीं हैं। इसके अतिरिक्त बौद्धों में महायान, कालचक्रयान आदि जैसे संप्रदाय भी हैं, जो बुद्ध की देवता सदृश पूजा करते हैं। बुद्ध को अलौकिक मानते हैं। बुद्ध की लोकोत्तर की संकल्पना भी उनमें हैं। महावीर के बारे में, भी लोग यही तर्क देते हैं और उन्हें नास्तिक स्वीकार नहीं करते।

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सत्य नारायण गोयनका विश्व में विपश्यना के प्रचार और पुनर्स्थापना के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने कहा था कि-

“विपश्यना नास्तिकों का मार्ग है, हम भी यही समझते थे! पहले बहुत डरते थे। अरे बुद्ध के मार्ग पर जायेंगे, तो नास्तिक हो जायेंगे। और नास्तिक होना कौन पसंद करता है? यह तो सबसे बड़ी गाली है कि तू तो नास्तिक है। 2500-2600 वर्ष पहले नास्तिक उसको कहते थे। जो निसर्ग के कर्म और कर्म-फल के सिद्धांत के अस्तित्व को स्वीकार करता है, वो आस्तिक है। जो अस्वीकार करता है, वो नास्तिक है”।

सत्य नारायण गोयनका

कुछ लोग भारत में, ऐसे भी हैं जो Nastik को गलत मानते हैं। यदि आप खुद को नास्तिक कहते हैं, तो वो आपको अनैतिक, मूल्यहीन, पापी आदि पता नहीं क्या-क्या कह डालेंगे। ऐसे लोग किसी भी व्यक्ति से सो खुद को नास्तिक कहता है, उससे घृणा करते हैं। ऐसे में बुद्ध, महावीर आदि किसी को भी नास्तिक के रूप में स्वीकार नहीं करते। उनके हिसाब से नास्तिक होना, अपराध और पाप सदृश कृत्य है।

चार्वाक को भी Nastik कहा जाता है। उनके बारे में एक लोकप्रिय पंक्ति है-

“यावज्जीवेत्सुखं जीवेत् ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत्।”

अर्थात जब तक जीओ सुख से जीओ और अगर जरुरत पड़े तो कर्ज लेकर भी घी पीओ। इसलिए उसे भौतिकवादी और अनैतिक भी लोग कहते हैं। पता नहीं चार्वाक का सत्य क्या था?

कुछ लोग यह भी कहते हैं कि नास्तिक होना असंभव है। यदि आप कुछ में भी यकीन करते हैं, तो फिर आप नास्तिक नहीं हैं, बस ढोंग कर रहे हैं और हठ पाल रहे हैं। वे लोग नास्तिकता की सोच को स्वीकार करने के लिए कभी तैयार नहीं होते। अब थोड़ी सी बात कर लें, पश्चिम की।

Atheist meaning in hindi

एथिस्ट (Atheist) शब्द, थिस्ट (Theist) का विपरीत है। यह शब्द (Atheos) ईसा पूर्व पांचवीं सदी के दौरान यूनान में प्रयुक्त किया गया, जिसका अर्थ था, बिना देव या देवों के। इस प्रकार, जो किसी देव अथवा ईश्वर में यकीन नहीं करता वह Atheist कहलाया।

कुछ लोग ऐसे भी हैं जो कहते हैं कि कोई तो शक्ति है जिससे पृथ्वी, दुनिया, आकाश आदि चल रहा है। यदि ऐसा नहीं होता, तो सृष्टि कैसे चलती? वे यह भी कहते हैं कि यदि कोई शक्ति नहीं है तो सृष्टि का निर्माण कैसे हुआ। यदि आप कहेंगे कि जिस तरह से उनके ईश्वर को पैदा होने के लिए किसी की ज़रूरत नहीं, वैसे ही प्रकृति, सूरज, तारे, चाँद, पृथ्वी आदि के होने के लिए भी किसी की ज़रूरत नहीं है। बल्कि यह सब प्रकृति के कारण है।

वे आपसे पूछेंगे कि आप गुरुत्वाकर्षण के नियम में विश्वास करते हो कि नहीं? पृथ्वी घुमती है, सूर्य उदय-अस्त होता है, नदी का जल सागर में जाता है, बारिश होती है आदि में विश्वास करते हो या नहीं? अगर आपने कहा कि हाँ, तो वे कहेंगे कि फिर यही शक्ति ईश्वर है। यानी आपको हाँ कहलवा के दम लेंगे।

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कुछ लोग तो प्रेम, इंसानियत, भाईचारा आदि को ईश्वर कह देंगे और यदि आप कहेंगे, इसमें तो मैं भी यकीन करता हूँ, तो वो कहेंगे कि देखा आप नास्तिक नहीं हो। और अब आखिरी बात-

जिस तरह से इन्सान को छोड़कर किसी भी प्राणी, पेड़-पौधों आदि के अस्तित्व के होने के लिए न ही किसी ईश्वर की जरुरत है, न किसी वेद की और न किसी धर्म की। न किसी महापुरुष की आज्ञा की ज़रूरत है। उसी प्रकार इंसान को भी इंसान होने के लिए न किसी धर्म की ज़रूरत है, न किसी ईश्वर की।

पेड़-पौधे, प्रकृति में पहाड़, नदी, जानवर, कीट-पतंगे आदि के लिए इन सब का कोई झमेला नहीं है। फिर भी एक पेड़ आम, तरबूज, पपीता आदि जैसा मीठा फल देता है कि नहीं। वहीं ऐसे पेड़ भी हैं, जो जहर भी पैदा करता है। जानवरों के बारे में भी हम ऐसा ही कह सकते हैं।

फिर इंसान को अच्छा बुरा होने के लिए धर्म की ज़रूरत आखिर क्यों हैं? क्या कोई इंसान बिना हिन्दू, मुसलमान, ईसाई, पारसी, सिख, बौद्ध, जैन, यहूदी आदि ठप्पों को अपने ऊपर न लगाये, तो क्या वह प्रेम नहीं कर सकता? किसी को गले नहीं लगा सकता, हाथ नहीं मिला सकता? दोस्त और जीवन साथी नहीं हो सकता? क्या ये धार्मिक लेबल अपने ऊपर लगाना ज़रूरी है? क्या अपनी सोच को मानने के लिए वेद, कुरान आदि की इज़ाज़त लेनी पड़ेगी? क्या अच्छा इंसान होने के लिए, मानवता में यकीन करने के लिए ईश्वर, अल्लाह अथवा गॉड में, बिना जाने समझे यकीन करना होगा?

अब शायद आपको स्पष्ट हो गया होगा कि नास्तिक किसे कहते है? आस्तिक अथवा नास्तिक होने से उनका अच्छा-बुरा होने से कोई सम्बन्ध है भी या नहीं, यह भी समझ में आया होगा। नास्तिक या आस्तिक बुरे, अनैतिक, भ्रष्ट, अपराधी आदि हो सकते हैं या नहीं, आपको अपने आसपास के लोगों को देखकर तथा अपने अनुभव से समझना है। कोई पूर्वाग्रह नहीं, पालना है।

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