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पढ़िये ओशो पुस्तक संभोग से समाधि के बारे में

जरूर पढ़े!

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जो धर्म डराए, जो किताब भ्रम पैदा करे, उसमें शिद्दत से सुधार की जरूरत है!

Sambhog se Samadhi Ki Or – Hindi Book
(Sex matters: from sex to superconsciousness)

Osho (मूल नाम: रजनीश) (जन्म: चंद्र मोहन जैन, 11 दिसम्बर 1931 से 19 जनवरी 1990 तक), (कुचवाड़ा ग्राम, रायसेन ज़िला भोपाल, मध्य प्रदेश, भारत) जिन्हें क्रमशः भगवान श्री रजनीश, ओशो रजनीश, या केवल रजनीश कहा जाता है, एक भारतीय विचारक, धर्मगुरु और रजनीश आंदोलन के प्रणेता-नेता थे। अपने संपूर्ण जीवनकाल में आचार्य रजनीश को एक विवादास्पद रहस्यदर्शी, गुरु और आध्यात्मिक शिक्षक के रूप में देखा गया। वे धार्मिक रूढ़िवादिता के कठोर आलोचक थे, जिसकी वजह से वह बहुत ही जल्दी विवादित हो गए और ताउम्र विवादित ही रहे। 1960 के दशक में उन्होंने पूरे भारत में एक सार्वजनिक वक्ता के रूप में यात्रा की। वे समाजवाद, महात्मा गाँधी, और हिंदू धार्मिक रूढ़िवाद के प्रखर आलोचक रहे। उन्होंने मानव कामुकता के प्रति ज्यादा खुले रवैया की वकालत की, जिसके कारण वे भारत तथा पश्चिमी देशों में भी आलोचना के पात्र रहे, हालाँकि बाद में उनका यह दृष्टिकोण अधिक स्वीकार्य हो गया।

Source: Wikipedia

“जिस दिन दुनिया में Sex स्‍वीकृत होगा, जैसा कि भोजन, स्‍नान स्‍वीकृत है। उस दिन दुनिया में अश्‍लील पोस्‍टर नहीं लगेंगे। अश्‍लील किताबें नहीं छपेगी। अश्‍लील मंदिर नहीं बनेंगे। क्‍योंकि जैसे-जैसे वह स्‍वीकृति होता जाएगा। अश्‍लील पोस्‍टरों को बनाने की कोई जरूरत नहीं पड़ेगी”।

Osho – Sambhog se Samadhi Ki Or

युवक और यौन – Osho Sex Hindi

Osho

अगर किसी समाज में भोजन वर्जित कर दिया जाये। कि भोजन छिपकर खाना, कोई देख न ले। अगर किसी समाज में यह हो कि भोजन करना पाप है, तो भोजन के पोस्‍टर फौरन सड़कों पर लगने लगेंगे। क्‍योंकि आदमी तब पोस्‍टरों से ही तृप्‍ति पाने की कोशिश करेगा। पोस्‍टर से तृप्‍ति तभी पायी जाती है। जब जिंदगी तृप्‍ति देना बंद कर देती है। और जिंदगी में तृप्‍ति पाने का द्वार बंद हो जाता है।

Osho का Sambhog se Samadhi Ki Or में कहना है कि “यह जो इतनी अश्‍लीलता, कामुकता और Sexuality है, यह सारी की सारी वर्जनाओं (Taboos) का अंतिम परिणाम है”।

मैं युवकों से कहना चाहूंगा कि तुम जिस दुनिया को बनाने में संलग्न हो, उसमें Sex को वर्जित मत करना। अन्‍यथा आदमी और भी कामुक से कामुक होता चला जाएगा।

मेरी यह बात देखने में बड़ी उलटी लगेगी। अख़बार वाले और नेतागण चिल्‍ला-चिल्‍ला कर घोषणा करते है कि मैं लोगों में काम का प्रचार कर रहा हूं। सच्‍चाई उलटी है कि मैं लोगों को काम से मुक्‍त करना चाहता हूं।

प्रचार वे कर रहे है। लेकिन उनका प्रचार दिखाई नहीं पड़ता। क्‍योंकि हजारों साल की परंपरा से उनकी बातें सुन-सुन कर हम अंधे और बहरे हो गये है। हमें ख्‍याल ही रहा कि वे क्‍या कह रहे है। मन के सूत्रों का, मन के विज्ञान का कोई बोध ही नहीं रहा। कि वे क्‍या कर रहे है। वे क्‍या करवा रहे है। इसलिए आज जितना कामुक आदमी भारत में है। उतना कामुक आदमी पृथ्‍वी के किसी कोने में नहीं है।

Sambhog se Samadhi Ki Or में एक वाकया है!

मेरे एक डाक्‍टर मित्र इंग्‍लैण्‍ड के एक मेडिकल कांफ्रेंस में भाग लेने गये थे। व्‍हाइट पार्क में उनकी सभा होती थी। कोई पाँच सौ डाक्‍टर इकट्ठे थे। बातचीत चलती थी। खाना-पीना चलता था। लेकिन पास ही की बेंच पर एक युवक और युवती गले में हाथ डाले अत्‍यंत प्रेम में लीन आंखे बंद किये बैठे थे। उन मित्र के प्राणों में बेचैनी होने लगी। भारतीय प्राण में चारों तरफ झांकने का मन होता है। अब खाने में उनका मन न रहा। अब चर्चा में उनका रस न रहा। वे बार-बार लौटकर उस बेंच कीओर देखने लगे। पुलिस क्‍या कर रही है। वह बंद क्‍यों नहीं करती ये सब। ये कैसा अश्‍लील देश है। यह लड़के और लड़की आँख बंद किये हुए चुपचाप पाँच सौ लोगों की भीड़ के पास ही बेंच पर बैठे हुए प्रेम प्रकट कर रहे है।

कैसे लोग है? यह क्‍या हो रहा है? यह बर्दाश्‍त के बाहर है। पुलिस क्‍या कर रही है? बार-बार वहां देखते।

पड़ोस के एक आस्‍ट्रेलियन डाक्‍टर ने उनको हाथ के इशारा किया ओर कहा, बार-बार मत देखिए, नहीं तो पुलिस वाला आपको यहां से उठा कर ले जायेगा। वह अनैतिकता का सबूत है। यह दो व्‍यक्‍तियों की निजी जिंदगी की बात है। और वे दोनों व्‍यक्‍ति इसलिए पाँच सौ लोगों की भीड़ के पास भी शांति से बैठे है, क्‍योंकि वे जानते है कि यहां सज्‍जन लोग इकट्ठे है, कोई देखेगा नहीं। किसी को प्रयोजन भी क्‍या है।

आपका यह देखना बहुत गर्हित है, बहुत अशोभन है, बहुत अशिष्‍ट है। यह अच्‍छे आदमी का सबूत नहीं है। आप पाँच सौ लोगों को देख रहे है कोई भी फिक्र नहीं कर रहा। क्‍या प्रयोजन है किसी से। यह उनकी अपनी बात है। और दो व्‍यक्‍ति इस उम्र में प्रेम करें तो पाप क्‍या है? और प्रेम में वह आँख बंद करके पास-पास बैठे हों तो हर्ज क्‍या है? आप परेशान हो रहे है। न तो कोई आपके गले में हाथ डाले हुए है, न कोई आपसे प्रेम कर रहा है।

वह मित्र Osho से लौटकर कहने लगा कि मैं इतना घबरा गया कि ये कैसे लोग है। लेकिन धीरे-धीरे उनकी समझ में यह बात आयी कि गलत वे ही थे। हमारा पूरा मुल्‍क ही एक दूसरे घर में दरवाजे में की होल बना कर झाँकता रहता है।

कहां क्‍या हो रहा है?
कौन क्‍या कर रहा है?
कौन कहां जा रहा है?
कौन किसके साथ है?
कौन किसके गले में बाहें डाले है?
कौन किसका हाथ अपने हाथ में लिए है?

क्‍या बदतमीजी है ये..! ये कैसी संस्‍कारहीनता है… यह सब क्‍या है? यह क्‍यों हो रहा है? यह हो रहा है इसलिए कि भीतर वो जिसको दबाता है, वही सब तरफ से दिखाई पड़ने लगता है। ये वही दिखाई पड़ रहा है।

युवकों से Osho का कहना है कि तुम्‍हारे मां-बाप, तुम्‍हारे पुरखे, तुम्‍हारी हजारों साल की पीढ़ियाँ Sex से भयभीत रही है। तुम भयभीत मत रहना। तुम समझने की कोशिश करना उसे। तुम पहचानने की कोशिश करना। तुम बात करना। तुम Sex के संबंध में आधुनिक जो नई खोज हुई है उनको पढ़ना, चर्चा करना और समझने की कोशिश करना कि—

Sex क्‍या है?
क्‍या है Sex का मैकेनिज्म?
उसका यंत्र क्‍या है?
क्‍या है उसकी आकांक्षा?
क्‍या है उसकी प्‍यास?
क्‍या है प्राणों के भीतर छिपा हुआ राज?

इसको समझना। इसकी सारी की सारी वैज्ञानिकता को पहचाना। उससे भागना, ‘Skip’ मत करना। आँख बंद मत करना। और तुम हैरान हो जाओगे कि तुम जितना समझोगे, उतने ही मुक्‍त हो जाओगे। तुम जितना समझोगे, उतने ही स्‍वस्‍थ हो जाओगे। तुम जितना Sex के फैक्‍ट को समझ लोगे, उतना ही Sex के ‘Fiction’ से तुम्‍हारा छुटकारा हो जायेगा।

तथ्‍य को समझते ही आदमी कहानियों से मुक्‍त हो जाता है। और जो तथ्‍य से बचता है, वह कहानियों में भटक जाता है। कितनी Sex की कहानियां चलती हैं और कोई मजाक ही नहीं है हमारे पास, बस एक ही मजाक है कि Sex की तरफ इशारा करें और हंसे। हद हो गई। तो जो आदमी Sex की तरफ इशारा करके हंसता है, वह आदमी बहुत ही क्षुद्र है। Sex की तरफ इशारा करके हंसने का क्‍या मतलब है? उसका एक ही मतलब है कि आप समझते ही नहीं।

बच्‍चे तो बहुत तकलीफ में है कि उन्‍हें कौन समझायें, किससे वे बातें करें कौन सारे तथ्‍यों को सामने रखे। उनके प्राणों में जिज्ञासा है, खोज है, लेकिन उसको दबाये चले जाते हे। रोके चले जाते है। उसके दुष्‍परिणाम होते है। जितना रोकते है, उतना मन वहां दौड़ने लगता है और उस रोकने और दौड़ने में सारी शक्‍ति और ऊर्जा नष्‍ट हो जाती है।

यह मैं आपसे कहना चाहता हूं कि जिस देश में भी Sex की स्‍वस्‍थ रूप से स्‍वीकृति नहीं होती, उस देश की प्रतिभा का जन्‍म नहीं होता। पश्‍चिम में तीस वर्षो में जो जीनियस पैदा हुआ है, जो प्रतिभा पैदा हुई है। वह Sex के तथ्‍य की स्‍वीकृति से पैदा हुई है।

जैसे ही Sex स्‍वीकृत हो जाता है। वैसे ही जो शक्‍ति हमारी लड़ने में नष्‍ट होती है, वह शक्‍ति मुक्‍त हो जाती है। वह रिलीज हो जाती है। और उस दिन शक्‍ति को फिर हम रूपांतरित करते है—

पढ़ने में खोज में,
आविष्‍कार में,
कला में,
संगीत में,
साहित्‍य में।

और अगर वह शक्‍ति Sex में ही उलझी रह जाये जैसा कि सोच लें कि वह आदमी जो कपड़े में उलझ गया है— नसरूदीन, वह कोई विज्ञान के प्रयोग कर सकता था बेचारा। कि वह कोई सत्‍य का सृजन कर सकता था? कि वह कोई मूर्ति का निर्माण कर सकता था। वह कुछ भी कर सकता था। वह कपड़े ही उसके चारों और घूमते रहते है ओर वह कुछ भी नहीं कर पाता है।

Osho कहते हैं कि भारत के नव युवकों के दिमाग में पूरे वक़्त Sex घूमता रहता है। और इस घूमने के कारण उसकी सारी शक्‍ति इसी में लीन और नष्‍ट हो जाती है। जब तक भारत के युवक की Sex के इस रोग से मुक्‍ति नहीं होती, तब तक भारत के युवक की प्रतिभा का जन्‍म नहीं हो सकता। प्रतिभा का जन्‍म तो उसी दिन होगा, जिस दिन इस देश में Sex की सहज स्‍वीकृति हो जायेगी। हम उसे जीवन के एक तथ्‍य की तरह अंगीकार कर लेंगे— प्रेम से, आनंद से—निंदा से नहीं। और निंदा और घृणा का कोई कारण भी नहीं है।

Osho कहते हैं कि Sex जीवन का अद्भुत रहस्‍य है। वह जीवन की अद्भुत मिस्ट्री है। उससे कोई घबरानें की, भागने की जरूरत नहीं है। जिस दिन हम इसे स्‍वीकार कर लेंगे, उस दिन इतनी बड़ी उर्जा मुक्‍त होगी भारत में कि हम न्‍यूटन पैदा कर सकेंगे, हम आइंस्‍टीन पैदा कर सकेंगे। उस दिन हम चाँद-तारों की यात्रा करेंगे। लेकिन अभी नहीं। अभी तो हमारे लड़कों को लड़कियों के स्‍कर्ट के आसपास परिभ्रमण करने से ही फुर्सत नहीं है। चाँद तारों का परिभ्रमण कौन करेगा। लड़कियां चौबीस घंटे अपने कपड़ों को चुस्‍त करने की कोशिश करें या कि चाँद तारों का विचार करें। यह नहीं हो सकता। यह सब Sexuality का रूप है।

हम शरीर को Nude देखना और दिखाना चाहते है। इसलिए कपड़े चुस्‍त होते चले जाते है। सौंदर्य की बात नहीं है यह, क्‍योंकि कई बार चुस्‍त कपड़े शरीर को बहुत बेहूदा और भोंडा बना देते है। हां किसी शरीर पर चुस्‍त कपड़े सुंदर भी हो सकते है। किसी शरीर पर ढीले कपड़े सुंदर हो सकते है। और ढीले कपड़े की शान ही और है। ढीले कपड़ों की गरिमा और है। ढीले कपड़ों की पवित्रता और है।

लेकिन वह हमारे ख्‍याल में नहीं आयेगा। हम समझेंगे यह फैशन है, यह कला है, अभिरूचि है, टेस्‍ट है। नहीं ‘’Taste’’ नहीं है। अभिरूचि नहीं है। वह जो जिसको हम छिपा रहे है भीतर दूसरे रास्‍तों से प्रकट होने की कोशिश कर रहा है। लड़के लड़कियों का चक्‍कर काट रहे है। लड़कियां लड़कों के चक्‍कर काट रही है। तो चाँद तारों का चक्‍कर कौन काटेगा?

कौन जायेगा वहां? और प्रोफेसर? वे बेचारे तो बीच में पहरेदार बने हुए खड़े है। ताकि लड़के लड़कियां एक दूसरे के चक्‍कर न काट सकें। कुछ और उनके पास काम है भी नहीं। जीवन के और सत्‍य की खोज में उन्‍हें इन बच्‍चों को नहीं लगाना है। बस, ये सेक्‍स से बचे जायें, इतना ही काम कर दें तो उन्‍हें लगता है कि उनका काम पूरा हो गया।

यह सब कैसा रोग है, यह कैसा डिसीज्‍ड माइंड, विकृत दिमाग है हमारा। हम Sex के तथ्‍यों की सीधी स्‍वीकृति के बिना इस रोग से मुक्‍त नहीं हो सकते। यह महान रोग है।

इस पूरी चर्चा में मैंने यह कहने की कोशिश की है कि मनुष्‍य को क्षुद्रता से उपर उठना है। जीवन के सारे साधारण तथ्‍यों से जीवन के बहुत ऊंचे तथ्‍यों की खोज करनी है। परमात्‍मा भी है दुनिया में। लेकिन उसकी खोज कौन करेगा। Sex सब कुछ नहीं है, इस दुनिया में सत्‍य भी है। उसकी खोज कौन करेगा। यहीं जमीन से अटके अगर हम रह जायेंगे तो आकाश की खोज कौन करेगा। पृथ्‍वी के कंकड़ पत्‍थरों को हम खोजते रहेंगे तो चाँद तारों की तरफ आंखे उठायेगा कौन?

पता भी नहीं होगा उनको जिन्‍होंने पृथ्‍वी की ही तरफ आँख लगाकर जिंदगी गुजार दी। उन्‍हें पता नहीं चलेगा कि आकाश में तारे भी हैं, आकाशगंगा भी है। रात्रि के सन्‍नाटे में मौन सन्‍नाटा भी है, आकाश का। बेचारे कंकड़ पत्‍थर बीनने वाले लोग, उन्‍हें पता भी कैसे चलेगा कि और आकाश भी है। और अगर कभी कोई कहेगा कि आकाश भी है, चमकते हुए तारे भी है। तो वे कहेंगे सब झूठी बातचीत है, कोरी कल्‍पना है। सच में तो केवल पत्‍थर ही पत्‍थर है। हां कहीं रंगीन पत्‍थर भी होते है। बस इतनी ही जिंदगी है।

नहीं, Osho कहते हैं कि इस पृथ्‍वी से मुक्‍त होना है, ताकि आकाश दिखाई पड़ सके। शरीर से मुक्‍त होना है। ताकि आत्‍मा दिखाई पड़ सके। और सेक्‍स से मुक्‍त होना है, ताकि समाधि तक मनुष्‍य पहुंच सके। लेकिन उस तक हम नहीं पहुंच सकेंगे। अगर हम सेक्‍स से बंधे रह जाते है तो। और सेक्‍स से हम बंध गये है। क्‍योंकि हम Sex से लड़ रहे है। लड़ाई बाँध देती है। समझ मुक्‍त कर देती है। अंडरस्टैंडिंग चाहिए, समझ चाहिए।

Sex के पूरे रहस्‍य को समझो, बात करो, विचार करो। मुल्‍क में हवा पैदा करो कि हम इसे छिपाएंगे नहीं। समझेंगे। अपने पिता से बात करो, अपनी मां से बात करो। वैसे वे बहुत घबरायेगें। अपने प्रोफेसर से बात करो। अपने कुलपति को पकड़ो और कहो कि हमें समझाओ। जिंदगी के सवाल हैं ये। वे भागेगे। वे डरे हुए लोग है। डरी हुई पीढ़ी से आयें है। उनको पता भी नहीं है। जिंदगी बदल गयी है। अब डर से काम नहीं चलेगा। जिंदगी का एनकाउंटर चाहिए मुकाबला चाहिए। जिंदगी से लड़ने और समझने की तैयारी करो। मित्रों का सहयोग लो, शिक्षकों का सहयोग लो, मां-बाप का सहयोग लो।

दुनिया साफ सीधी कैसे हो सकती है? – Osho Sex Hindi

वह मां गलत है, जो अपनी बेटी को और अपने बेटे को वे सारे राज नहीं बताती, जो उसने जाने। क्‍योंकि उसके बताने से बेटा और उसकी बेटी भूलों से बच सकती है। उनके न बताने से उनसे भी उन्‍हीं भूलों को दोहराने की संभावना है। जो उसने खुद की होगी। बाप गलत है, जो अपने बेटे को अपनी प्रेम की और अपनी सेक्‍स की जिंदगी की सारी बातें नहीं बता देता। क्‍योंकि बता देने से बेटा उन भूलों से बच जायेगा।

शायद बेटा ज्‍यादा स्‍वस्‍थ हो सकेगा। लेकिन वही बाप इस तरह जीयेगा कि बेटे को पता चले कि उसने प्रेम ही नहीं किया। वह इस तरह खड़ा रहेगा। आंखे पत्‍थर की बनाकर कि उसकी जिंदगी में कभी कोई औरत उसे अच्‍छी लगी ही नहीं थी।

यह सब झूठ है। यह सरासर झूठ है। तुम्‍हारे पिता ने भी प्रेम किया है। उनके पिता ने भी प्रेम किया है। सब पिता प्रेम करते रहे है। लेकिन सब पिता धोखा देते रहे है। तुम भी प्रेम करोगे। और पिता बनकर धोखा दोगे। यह धोखे की दुनिया अच्‍छी नहीं है। Osho कहते हैं कि “ये दुनिया साफ सीधी होनी चाहिए“।

जो पिता ने अनुभव किया है वह बेटे को दे जाये। जो मां ने अनुभव किया, वह बेटी को दे जाये। जो ईर्ष्या उसने अनुभव किए है। जो प्रेम अनुभव किये है। जो गलतियां उसने की है। जिन गलत रास्‍तों पर वह भटकी है और भ्रम है। उस सबकी कथा को अपनी बेटी को दे जाये। जो नहीं दे जाते है, वे बच्‍चे का हित नहीं करते है। अगर हम ऐसा कर सके तो दुनिया ज्‍यादा साफ होगी।

सब तरफ़ विकास हो रहा बस आदमी का विकास थमा है – Osho

हम दूसरी चीजों के संबंध में साफ हो गये है। शायद केमेस्‍ट्री के संबंध में कोई बात जाननी हो तो सब साफ है। फ़िज़िक्स के संबंध में कोई बात जाननी है तो सब साफ है। भूगोल के बाबत जाननी हो तो सब साफ है। नक्‍शे बने हुए है। लेकिन आदमी के बाबत साफ नहीं है। कहीं कोई नक्‍शा नहीं है। आदमी के बाबत सब झूठ है। दुनिया सब तरफ से विकसित हो रही है। सिर्फ आदमी विकसित नहीं हो रहा। आदमी के संबंध में भी जिस दिन चीजें साफ-साफ देखने की हिम्‍मत हम जुटा लेंगे। उस दिन आदमी का विकास निश्‍चित है।

अंत में Osho कहते हैं, यह थोड़ी बातें मैंने कहीं। मेरी बातों को सोचना। मान लेने की कोई जरूरत नहीं क्‍योंकि हो सकता है कि जो मैं कहूं बिलकुल गलत हो। सोचना, समझना, कोशिश करना। हो सकता है कोई सत्‍य तुम्‍हें दिखाई पड़े। जो सत्‍य तुम्‍हें दिखाई पड़ जायेगा। वही तुम्‍हारे जीवन में एक प्रकार का “दीया” बन जायेगा।

Hindi Book – Sambhog se Samadhi Ki Or
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