रंगों से प्रेम है या नफ़रत?

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DG
जो धर्म डराए, जो किताब भ्रम पैदा करे, उसमें शिद्दत से सुधार की जरूरत है!
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एक दोस्त, जिसका नाम मुस्लिमों जैसा है, उसने मुझसे आज एक सवाल पूछा कि आपको रंगों से प्रेम है या नफ़रत?

उसने आगे कहा “बचपन में होली नहीं खेलते थे क्योंकि तब अपने ही लोग डराते थे कि जिस्म के जिस हिस्से पर होली का रंग पड़ जाएगा- ऊपर जाने पर वो हिस्सा नोचा जाएगा, जलाया जाएगा। छोटे थे, मन में डर बैठ गया था लेकिन जब बड़े हुए तो खूब होली मनाने लगे। आज इसलिए मनाते हैं कि ये लोग यहीं सब नोच ले रहे हैं… तो ऊपर कोई क्या नोचेगा…?”

मैं उसकी ये बात सुनकर शर्म से गड़ गया, जाने कब बाहर आ पाऊँगा। इसलिए लगा की सबको ताक़ीद कर दूं कि रंगों का ये त्योहार मनाने से पहले, सोच-समझ लें कि आपको इसे मनाने की ज़रूरत है भी या नहीं।

आइये 2014 में चलते हैं, बेंगलुरू में पूर्वोत्तर के एक छात्र से मारपीट हुई और उससे जूते तक चटवाए गए थे। सोचने पर शर्म आए न आए लेकिन ये घटना को हुए अभी बहुत लंबा समय नहीं बीता है। इस तरह की घटना अक्सर पूर्वोत्तर के लोगों के साथ होती रहती है। आप शायद ‘नीडो’ को भूल गए होंगे… न याद हो तो नीचे दिये गए वीडियो खुद देख लीजिये।

दिल्ली के मूलभूत भेदभावी रवैये के बाद से देश भर में अब पूर्वोत्तर के लोगों को चिंकी (चीन से आया) कहना आम होता जा रहा है। आपको अच्छी तरह पता होगा कि चिंकी उनके चेहरे-मोहरे के आधार पर कहा जाता है। बस आपको यही नहीं पता होगा कि ये ‘नस्लभेद’ कहलाता है, क्योंकि ये हमारी कंडीशनिंग में शामिल हो चुका है। (यहां कंडीशनिंग को आप संस्कार भी पढ़ सकते हैं।)

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पूर्वोत्तर के न जाने कितने नौजवान हैं, जो कह चुके हैं कि उन्हें उत्तर भारत में ही नहीं, बल्कि कर्नाटक जैसे राज्यों में भी चीनी कहा जाता है और उनका तिरस्कार किया जाता है।

सोचिए, जब चीन से तनाव चल रहा है, तो दिन पर दिन हिंसक होते समाज में आजकल उनके ऊपर क्या बीत रहा होगी?

अब थोड़ा और आगे चलते हैं, दक्षिण भारत में होने वाले हिंदी विरोध से उत्तर भारतीयों को खासी दिक्कत होती है लेकिन आप उनको किस नाम से पुकारते हैं? जी हां, आप उन्हें मल्लू कहते हैं। यह मलयाली अप्रवासियों के लिए शुरू हुआ था एक Slang के रूप में।

फिर भी ज़्यादातर मलयालियों को इस संक्षिप्त नाम से दिक्कत नहीं है। लेकिन वो क्या है न, कि हम ठहरे संस्कारी लोग तो हमने कर्नाटक, तमिलनाडु, ओडिशा, आंध्रप्रदेश सभी जगह के लोगों को अब ‘मल्लू’ कहना शुरू कर दिया है। सोचिए कि उनको पुकारने वाला यह कोई संक्षिप्त या प्रेम का शब्द नहीं है।

ये शब्द हम उनके Dark complexion और हिंदी बोलने के लहजे के आधार पर उपयोग करने लगे हैं। यानी कि अंततः एक शब्द, हमारी रंगभेदी मानसिकता की बलि चढ़ गया है। सोचिए कि दक्षिण भारत के तमाम लोगों के लिए ‘मल्लू’ शब्द कितना तिरस्कारपूर्ण बन गया है। भारत के ही किसी ख़ास क्षेत्र में रहने वालों के लिए इस तरह की पहचान बना लेना। क्या आपको ठीक लगता है?

अब और आगे चलते हैं… अख़बार खोल लीजिए, उस में Matrimonial पेज पर जाइए या शादी कराने वाली किसी वेबसाइट पर चले जाइए। वहां 70 फीसदी से अधिक रिश्तों की खोज लड़की के गोरे होने की शर्त पर ख़त्म होती है।

याद रहे कि ‘Fair & lovely’ नाम की गोरा बना देने का दावा करने वाली क्रीम का नाम अब बदल ‘Glow & lovely’ कर दिया गया। ये बस एक खोखली लड़ाई थी, क्योंकि क्रीम बननी बंद नहीं हुई है… लड़कियों को गोरा बनाने का दावा करती हुई वह आज भी दूसरे नाम से बिक रही है।

रंगों से प्रेम है या नफ़रत

मुस्लिम तो ख़ैर आपकी नफ़रत के पहले से शिकार होते आ रहे हैं। इसका कोई ख़ास कारण नहीं है बस इसलिए कि आपको एक अलग धर्म से नफ़रत है। इसलिए भी नहीं कि उन्होने हमारा कुछ बिगाड़ा है, बल्कि इसलिए कि आपको अपने धर्म की Supremacy चाहिए। खुद राज करने की पुरातन ब्राह्मणवादी शैतानी चाहत।

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आदिवासियों से दलितों तक के साथ आपका रवैया ऐसा ही रहा है। उनकी नस्ल, जाति, रंग के आधार पर नफ़रत और भेदभाव।

याद करिए मेट्रों में किसी ऐसे व्यक्ति को, जो किसी Automobile repair shop में काम कर के आया हो और आपके आस-पास खड़ा हो गया हो। या कोई ग्रामीण, मज़दूर जो आपके आस-पास खड़ा हो… क्योंकि आप उसे मेट्रो से तो उतार नहीं सकते हैं। तो उससे थोड़ा दूर हट कर खड़े हो जाते हैं और फिर उसे ऐसी हिकारत भरी निगाहों से देखते हैं, कि बेचारे का दिल ही जानता होगा।

आप अपने बच्चों को उनके मन से न तो विवाह करने देने को तैयार हैं, न ही उनको किसी अपारंपरिक पेशे में जाने देने के लिए। यहां तक कि उनके कपड़े और कपड़ों के रंग भी आप ही तय करना चाहते हैं।

घबराइए मत, मैं यहां कुछ छोड़ूंगा नहीं, आप वैसे तो गोरी चमड़ी के प्रति Obsessed रहते हैं लेकिन देश में आए विदेशियों का मज़ाक भी उड़ाते हैं। उनको ठगते हैं, और तो और शरणार्थियों को लेकर जो आपका रवैया है, वो पूरा देश देख ही चुका है।

हमारे ही देश का एक राज्य था, जम्मू और कश्मीर। जो अब राज्य नहीं रहा, सोचिए वहां के लोगों ने डेढ़ साल बिना इंटरनेट के काटे हैं। उनके प्रति कैसा रवैया था आपका?

फ़िक्र मत कीजिए, मुझे LGBTQ के प्रति भी सबका रवैया पता है। घरेलू महिलाओं के लिए भी, और ये भी कि थर्ड जेंडर क्यों आज तक सड़क पर भीख या हमारी शादियों में दान मांग रहा है?

आप जेंडर के आधार पर भेद करते हैं। जाति और जन्म के आधार पर भेद करते हैं। पेशे के आधार पर भेद करते हैं। क्लास के आधार पर भेद करते हैं। धर्म के आधार पर भेद करते हैं।

सिर्फ इतना नहीं, आप रंग के आधार पर, भाषा के आधार पर, क्षेत्र के आधार पर, कपड़ों के आधार पर, भोजन के आधार पर, गीत-संगीत के आधार पर भी भेद करते हैं।

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तब भी आप रंगों का त्योहार मना रहे हैं… क्यों? क्या आपको सच में रंगों से प्रेम है, या नफ़रत है? ये सारे ऊपर बताए गए लोग उत्तर से दक्षिण, पूर्व से पश्चिम तक के भारत के अलग-अलग रंग ही तो हैं। लेकिन इस सब से आपके विषय में क्या पता चलता है? आपको रंगों से नफ़रत है? या रंगों से प्रेम है?

और उस पर भी गज़ब बात यह कि ये सब, आप 15 अगस्त या 26 जनवरी के मौके पर अपने देश की विविधता के झूठे गर्व के लिए इस्तेमाल भी कर लेते हैं। अरे इस तरह की बेशर्मी पर कभी तो शर्म आनी ही चाहिए। लेकिन शर्म है कि नहीं आनी है, न आएगी। क्योंकि आप… विविधता के रंगों से प्रेम नहीं करते, आप इस पर शर्म नहीं करते बल्कि अपनी नफ़रत पर गर्व करते हैं।

फिर असली रंगों से, असली विविधता से नफ़रत करते हुए आप कौन से रंगों का त्योहार मना रहे हैं? अरे आप भाग्यशाली हैं कि आप एक ऐसे देश के रहने वाले हैं, जहां पर इतनी विविधता है। हमारे नागरिक जीवन ही नहीं, निजी जीवन से भी जिस नफ़रत को कब का चले जाना था। ऐसी बातों पर आप शर्म भी नहीं कर पा रहे हैं?

ये सारी नफ़रतें नस्लभेद, रंगभेद, जातिभेद, सांप्रदायिकता, लैंगिक भेद और विविधता के लिए मन में नफ़रत रख कर ही रंगों का त्योहार मनाना है, तो रहने दीजिए… क्या फ़र्क पड़ता है…? क्योंकि रंगों का त्योहार, किसी एक रंग का त्योहार नहीं है।

मैंने अब लिखना कम कर दिया है, कि यहां पहले से ही बहुत ज्ञान पिला पड़ा है। तो इस से भी किसी को क्या फ़र्क पड़ जाएगा। किन्तु मुझसे रहा नहीं जा रहा है। हो सके, तो अपनी सोच पर फिर से सोचिएगा। वरना इग्नोर करने, तिरस्कार करने और मज़ाक उड़ाने के विकल्प तो हैं ही आपके पास।

विविधता से प्यार करने वाले हर किसी को रंगों की मुबारक़बाद… अगले साल तक की।

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