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गणपति बप्पा मोरया की असली कहानी

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DG
जो धर्म डराए, जो किताब भ्रम पैदा करे, उसमें शिद्दत से सुधार की जरूरत है!

गणेश अर्थात गणपति बप्पा मोरया (Ganpati Bappa Morya)। जिन्हें आप कई नामों से जानते है। वर्तमान में गणेश की जो प्रतिमा बनाई जाती है उसमें उन्हें हाथी का सिर वाला दिखाया जाता है, जिसका वाहन एक मूषक होता है। दरअसल, गणपति का नाम जितना सरल लगता है उनसे जुड़ी पौराणिक कथाएं उतनी ही जटिल और गल्प भरी हैं।

जानिए, लम्बोदर की लम्बी कहानी

प्रचलित कथा क्या कहती है?

Ganpati के उत्पत्ति की प्रमुख प्रचलित कथा में बताया गया कि उनकी मां पार्वती ने उन्हें अपने मैल से उत्पन्न किया था। जबकि दूसरी कथा ब्रह्म वैवर्त पुराण के अनुसार गणेश के जन्म के बाद उन पर शनि की दृष्टि पड़ी थी तो उनका सिर कट गया अतः शोक में डूबी मां पार्वती पर दया कर के शिव जी ने हाथी का सर लगा दिया था।

स्कन्द पुराण में विपरीत कथा क्या कहती है?

स्कन्द पुराण में बाकि कथाओं से विपरीत यह कहा गया- कि सिंदूर नामक एक दैत्य मां पार्वती के गर्भ में प्रविष्ट हो गया और भ्रूर्ण का सिर खा गया था, अत: बालक बिना सिर के उत्पन्न हुआ था। इसके बाद बालक ने गजासुर नाम के दैत्य का वध कर उसका सर लगा लिया था।

कहानी कोई भी हो लेकिन इन कथाओं के मद्देनज़र एक बात तो तय हो जाती है कि हाथी का सिर Ganpati के शरीर पर आरम्भ से नहीं था। यानि हाथी के सिर वाली कल्पना बाद में की गयी प्रतीत होती है।

अब आगे बढ़ते हैं।

गण का साधारण शाब्दिक अर्थ होता है ‘साधारण जन’ और पति का अर्थ होता है ‘मुखिया’ अर्थात साधारण जनों का मुखिया। इसे आप गणों का स्वामी या नायक भी कह सकते हैं।

गणपति एक गुणवाचक वर्णन है।

एक नेता को कैसा होना चाहिए उसका वर्णन है। हमारे देश को गणतंत्र इसीलिए कहते हैं। कि गण का अर्थ होता है जनता। गणेश, गणनायक, Ganpati इन सभी शब्दों का अर्थ है जनता का नेता। जनता के नेता को कैसा होना चाहिए उस वर्णन के अनुसार कुछ लोगों ने काल्पनिक मूर्ति बना ली और जनता में भ्रम फैला कर उसकी पूजा करने लगे।

वहीं सच यह भी है कि Ganpati Bappa Morya ना ही आपके बिगड़े काम बना सकते हैं। और ना बनते काम बिगाड़ सकते है। और ना ही इनका शिव के सिर काटने और हाथी के सिर जोड़ने वाली कहानी से कोई लेना-देना है।

लम्बोदर यानि गणपति की असली कहानी क्या है आइये आगे जानते हैं!

वाजसनेयी संहिता के अनुसार

वाजसनेयी संहिता के अपने भाष्य में महिधर ने व्याख्या की है कि “गणनाम गणरूपेण पालकम” अर्थात जो गणों या सैन्य दलों की रक्षा करता है। फ्लीट ने भी गण शब्द का अर्थ बताते हुए कहा है कि ‘गण शब्द का प्रमुख अर्थ है, जनजातीय समूह और संगठन या परिषद’। विल्सन ने भी ‘गण’ का अर्थ किसी दर्शन या सम्प्रदाय को बताया है। जबकि पाणिनि ने संघ शब्द की व्युत्पत्ति गण शब्द से बताया है।

गणपति के प्रमुख नामों का अर्थ

गणपति के प्रमुख नामों में से कुछ नाम इस प्रकार है- विघ्नकृत, विघ्नेश, विघ्ननेश्वर, विनायक आदि। इन सबका विशुद्ध शाब्दिक अर्थ होता है ‘विघ्न डालने वाला’। प्राचीन ब्रह्मणिक ग्रन्थों में गणपति के प्रति तिरस्कार और घृणा का भाव मिलता है। पांचवी शताब्दी में लिखे ‘मानव गृह्य सूत्र’ नामक धर्म ग्रन्थ में गणपति या विनायक को भय या तिरस्कार की भावना उत्पन्न करने वाला बताया गया हैं।

लोकायत के अनुसार

देवीप्रसाद चट्टोपाध्याय भी याज्ञवल्क्य का उदाहरण देते हुए अपनी पुस्तक ‘लोकायत’ में लिखते हैं कि “याज्ञवल्क्य के अनुसार रुद्र और ब्रह्मा ने बाधाएं उत्पन्न करने के लिए विनायक को गणों का मुखिया नियुक्त किया था। याज्ञवल्क्य ने यहां गणपति के प्रति अपनी घृणा दर्शाई है। वह कहते है कि “गणपति से आक्रांत व्यक्ति लाल कपड़े पहने और सर मुंडे हुए एक व्यक्ति को स्वप्न में देखते हैं”। जबकि उस समय सिर मुंडे और लाल वस्त्र पहने बौद्ध भिक्षु होते थे।

कुल मिला कर इससे यह स्पष्ट होता है कि आरम्भ में गणपति ब्रह्मणिक देवता नहीं थे, उन्हें देवत्व बाद में प्राप्त हुआ था।

क्रमश:

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