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मान्यता और अंधविश्वास का भ्रमजाल क्या है?

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मान्यता-और-अंधविश्वास

विज्ञान हमें वह वास्तविकता दिखाता है, जो साबित किया जा सकता है। परन्तु मान्यता (Recognition) और अंधविश्वास (Superstition) के भ्रमजाल को साबित नहीं किया जा सकता। मान्यताएं समय, स्थान व परिस्थिति के अनुसार बदलती रहती हैं। कई बार स्थान बदलने पर एक दूसरे से नितांत विपरीत मान्यताएं भी प्रचलन में पायीं जातीं हैं। इनका कोई वैज्ञानिक आधार नहीं होता क्योंकि ये वास्तविकता नहीं मान्यताएं हैं।

प्रायः तर्कहीन विश्वास ही मान्यता (Recognition) और अंधविश्वास (Superstition) का कारण होता है। अलौकिक लगने वाली किसी घटना की मनगढ़ंत व्याख्या कर देना ही इसका आधार है। भारत में मान्यता (Recognition) और अंधविश्वास (Superstition) की पैठ बहुत गहरी है। यहाँ पढ़े-लिखे भारतीय भी अविश्वसनीय विश्वासों को बढ़-चढ़ कर मानने में शान समझते हैं। जो प्रायः आधारहीन होते हैं, कुछ मान्यता (Recognition) और अंधविश्वास व्यक्तिगत जीवन तक सीमित होते हैं जैसे- ‘बिल्ली का रास्ता काटना’ आदि!

असल में मान्यता (Recognition) और अंधविश्वास व्यक्ति को मानसिक विश्राम व सुविधा देता है। मनुष्य की प्रवृत्ति ऐसी है कि वो वही विश्वास करना चाहता है जो उसके अनुकूल और सुविधाजनक हो, ये कोई आवश्यक नहीं कि वो सत्य भी हो… वास्तविकता जो कि निश्चित रूप से सत्य है, असुविधाजनक भी हो सकती है। तभी झूठ का अस्तित्व भी है क्योंकि अक्सर लोग झूठ पर विश्वास करते हैं और झूठ पर तो आपको हमेशा अंधविश्वास (Superstition) ही करना पड़ेगा, क्योंकि यदि आँख खोल ली तो आपको पछताना पड़ेगा।

सत्य पर विश्वास करना कोई जरूरी नहीं, सत्य तो सत्य है आप विश्वास करो या न करो। वास्तविकता तो वास्तविकता ही रहेगी आपके विश्वास करने या न करने से कोई फर्क नहीं पड़ता। प्रत्यक्ष को प्रमाण की आवश्यकता नहीं और सत्य को विश्वास की आवश्यकता नहीं। जैसे कि अग्नि प्रत्यक्ष दिखाई देती है और उसकी सत्यता ये है कि वो जलाती है आप चाहे विश्वास करो या न करो, वो तो जलाएगी ही।

अन्धविश्वासी (Superstitious) स्वयं पर विश्वास नहीं करते बल्कि हमेशा ऐसा सुना है, लिखा है, पढ़ा है। फलाने ने कहा है या मान्यता है, और साथ ही कि हम तो मानते हैं। असल में वो जानते नहीं है, बल्कि मानते हैं। सही बात तो ये है कि जिसका अस्तित्व ही नहीं है उसको जाना तो जा ही नहीं सकता, केवल माना जा सकता है। आँख बंद करके मान लो बस, तुम्हें सवाल पूछने का अधिकार नहीं है। और यदि सवाल पूछने भी हैं, तो केवल मान्यता के बारे में ही पूछना। परन्तु शक करने की गुंजाइश नहीं है।

धर्म कहता है कि जो शास्त्रों में लिखा है उसे मान लो, जानने की कोशिश मत करो, शक मत करो ! यदि सवाल भी पूछने हैं तो केवल शास्त्रों से सम्बंधित ही पूछो !

स्वामी बालेंदु

जहाँ भी आपको विश्वास करने का दुराग्रह किया जाये तो सावधान हो जाना और शक भी करना कि कहीं आपकी आँखों पर विश्वास की पट्टी बांधकर धोखा तो नहीं दिया जा रहा, याद रखना धोखा वही देते हैं जिन पर आपने विश्वास किया है।

धर्म, ईश्वर, शास्त्र, ज्योतिष, परलोक, अलौकिक चिकित्साएँ, मान्यताएं ये सभी विश्वास का आग्रह करती हैं और वो भी अंधे-विश्वास का। शक न करना और उस पर भी तुर्रा ये कि यदि शक किया तो ये काम नहीं करेंगी।

स्वामी बालेंदु

विज्ञान आपके पास आकार कभी नहीं कहेगा कि मुझे मानो, वो तो आपको मानना ही पड़ेगा। और कोई दूसरा रास्ता ही नहीं है। एक महत्वपूर्ण बात और भी आपने अन्धविश्वासी (Superstitious) लोगों से सुनी होगी कि टोने टोटके, मान्यताएं उन पर ही लागू होते हैं जो इन पर विश्वास करते या मानते हैं, सब पर नहीं। देखिये, कितना अच्छा रास्ता है इनके बच निकलने का। तुम्हारे ऊपर ये लागू नहीं हो रहा या असर नहीं हो रहा क्यों कि तुम मानते नहीं हो। तो फिर झगड़ा ही क्या है मानना छोड़ दो सारी परेशानी खुद-ब-खुद ख़त्म हो जाएगी।

सारे धर्म सत्य को ही स्थापित करने में जुटे हैं। स्वयं को सत्य बता रहे हैं। ईश्वर की अवधारणा के सहित और रहित कोई फर्क नहीं पड़ता। सच्चाई तो ये है कि एडवोकेसी तो असत्य की होती है, सत्य तो सत्य है। और जितने धर्म हैं, सब एडवोकेसी में ही लगे हैं। परन्तु आग को मानो या न मानो वो तो जलायेगी ही और आग को जान सकते हो तुम मानने की जरूरत नहीं।

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