असमानता और अन्याय क्या धर्म की देन है?

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Salman Arshad
A Common man !
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हिन्दू धर्म, एक ऐसा धर्म है जिसकी संज्ञाएँ बदलती रहीं हैं। लंबे समय तक इसे ‘School of thought’ के रूप में “वैदिक” कहा गया। एक साथ एक ईश्वर की मान्यता, एक साथ कई ईश्वर की मान्यता और किसी भी ईश्वर को न मानना सभी भारत भूमि पर प्रचलित School of thought में दिखाई देते थे। कालांतर में वर्ण और जाति व्यवस्था ने इन सारे Schools को एक धार्मिक समूह में बदल दिया। फिर असमानता और अन्याय (Inequality and Injustice) को धर्म का सरंक्षण मिलता गया। अब सारे School of thought एक अम्ब्रेला के नीचे आ गए हैं।

जी हां, भारत में धर्म नहीं बल्कि ‘School of thought’ थे। तब सभी के बीच स्वस्थ बहसें होती थीं, हार-जीत होती थी, जीतने वाला राजाओं से इनाम हासिल करता था। और जीतने वाले को नए Followers भी मिलते थे।

असमानता और अन्याय किसके हित में?

असमानता और अन्याय (Inequality and Injustice) पर आधारित ये विभाजन प्रभुत्व कायम रखने वाले वर्ग के हित में था इसलिए इसे बनाये रखा गया। यहाँ तक कि सदियों तक भारत पर राज करने वाले मुसलमानों ने भी इसे नहीं छेड़ा।

बाद में इन Group of schools को दो नए नाम मिले, एक जो प्रभुत्व कायम रखने वाले वर्ग ने खोजा, वो था ‘सनातन’। दूसरा नाम जो बाहर से आने वालों ने दिया, वो था ‘हिन्दू’। हिन्दू शब्द भौगोलिक आधार पर मिला और यही आज प्रचलन में है। इसके विपरीत यहूदी, ईसाई और इस्लाम जैसे धर्म किसी एक व्यक्ति, एक किताब और एक ईश्वर की अवधारणा पर आधारित हैं।

भारत में जन्मे बौद्ध और जैन धर्म ने हिन्दू धर्म की कमियों को ठीक करने की कोशिश जरूर की लेकिन जाति और कर्मकांड हिन्दुओं वाले ही रखे। कालांतर में ये दोनों ही धर्म अपने वजूद को बचाने में कमज़ोर साबित हुए। ऐसा क्यों हुआ, इसे आप ढूंढिए।

शूद्रों ने तैमूर का साथ क्यों दिया?

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अब हिन्दू धर्म के सामने एक बड़ी चुनौती खड़ी थी। तैमूर को पढ़िये तो पता चलता है कि भारत आगमन पर शूद्रों ने उसका साथ और उसका धर्म अपनाया। सवाल उठता है, क्यों?

महज़ असमानता और अन्याय (Inequality and Injustice) से छुटकारा पाने के लिए।

जो धर्म के पिंजरे को नहीं तोड़ पाये हैं, उन्हें बेहतर पिंजरे की तलाश रहती ही है। भारत और दुनिया के बहुत से दूसरे देशों में ईसाइयों ने धर्मांतरण करवाया। सेवा और शिक्षा इस धर्मांतरण का आधार बने। यहाँ भी सवाल उठता है कि ये काम हिन्दू क्यों नहीं कर पाया?

धर्म की देन कैसे है?

70 के दशक में आदिवासी इलाकों में हिन्दू धर्म प्रचारक पहुँचे, इन्होंने उन्हें पौराणिक कथाएं सुनाई और सामाजिक आर्थिक स्थिति के आधार पर उन्हें जातियों में बांट दिया। यही हिन्दू धर्म का सबसे बड़ा संकट है। वो जाति व्यवस्था को किसी भी हाल में छोड़ नहीं सकता और इसको छोड़े बिना समानता और न्याय की कल्पना नहीं की जा सकती।

अब्राहमिक धर्मों में कम से कम सैद्धांतिक तौर पर इस असमानता और अन्याय को नकारा गया है। शम्बूक मारा जाता है और बिलाल को इज्ज़त मिलती है। सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से ये Symbol बहुत ताकतवर हैं।

अब सरकार और सरकारी तंत्र धर्म-परिवर्तन को रोकने के लिए जो कर रहे हैं वह इस परिवर्तन को कम करने के बजाय बढ़ावा देगा। इंसान असमानता और अन्याय को कभी कुबूल नहीं कर सकता, इसलिए जब तक ये है, इससे निकलने की कोशिशें होती रहेंगी।

क्या धर्म परिवर्तन असमानता और अन्याय से निजात दिला सकता है?

अब एक और पहलू पर बात कर ली जाए। हिन्दू धर्म की असमानता और अन्याय (Inequality and Injustice) का विकल्प क्या ईसाई और इस्लाम मज़हब हो सकता है?

मेरे विचार से नहीं, ईसाइयों ने धर्मांतरित लोगों को वो सम्मान नहीं दिया जिसके वे तलबगार थे। धर्मांतरित लोगों को शिक्षा मिली, दुनिया की चुनौतियों का सामना करने का कौशल भी किसी हद तक मिला, लेकिन इतना ही काफी नहीं था। यूँ समझिए अगर हिन्दू धर्म में उनकी स्थिति एक रोटी की थी तो ईसाई बनकर ये स्थिति डेढ़ रोटी की हो गई, बस। लेकिन सवाल तो पेट भरने का था न?

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जाति व्यवस्था एक मानसिक बीमारी नस्ली श्रेष्ठताबोध पर आधारित है। इस बीमारी का असर दुनिया के हर हिस्से में किसी न किसी रूप में दिखाई दे जाता है। इस्लाम में जाति की अवधारणा ही नहीं है, लेकिन भारत का मुसलमान घोर जातिवादी है। हाँ छुआछूत जैसी स्थिति नहीं है लेकिन श्रेष्ठता बोध वाली बीमारी तो है ही। जो लोग इस्लाम में कन्वर्ट होते हैं उनके लिए यहां भी वही संकट है कि उसे किस जाति में रखा जाए, क्योंकि जाति तो जन्म आधारित व्यवस्था है।

आपको याद होगा कि अभी कुछ साल पहले हरियाणा में सवर्णों से परेशान होकर दलितों के एक समूह ने इस्लाम कुबूल कर लिया था। इनके लिए अम्बेडकर लफ्ज़ को जाति के रूप में चुना गया था। यानि कि “दूसरा” या Otherness की दीवार हर धार्मिक समूह बनाता ही है भले ही उसके धार्मिक ग्रंथ इसकी इजाजत न देते हों।

अंतिम बात, असमानता और अन्याय (Inequality and Injustice) से छुटकारा पाने के लिए एक धर्म से दूसरे धर्म में पलायन बिल्कुल भी समाधान नहीं है। इस बीमारी का कारण आर्थिक है और समाधान भी आर्थिक स्तर पर ही करना होगा।

आस्था बदलने से क्या होगा?

कुछ लोग ‘आस्था’ बदलते हैं, हालांकि हर आस्था के साथ आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक बदलाव अवश्यम्भावी है। मैं निजी तौर पर इसे स्वीकार नहीं कर पाता। हिन्दू धर्म के अंदर इतनी विविधता है कि लगभग हर धर्म की अवधारणा इसके भीतर मिल जाएगी। ऐसे में सबसे ज्यादा लोगों को इस धर्म के भीतर आना चाहिए था। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। हो भी नहीं सकता। क्योंकि जाति व्यवस्था ही इस धर्म का कवच और अंतर्वस्तु दोनों है। यानि असमानता और अन्याय (Inequality and Injustice)।

अंत में, जो लोग धर्म-धर्म खेल रहे हैं, बहुत मुमकिन है किसी धर्म आधारित सियासी ग्रुप के एजेंट हों, उनसे बचिए। गरिमापूर्ण जीवन की गारंटी किसी भी धर्म में नहीं हैं। आप एक अच्छी चीज़ की तलाश ग़लत जगह पर कर रहे हैं।

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