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Philosophyआज के परिपेक्ष्य में समुद्र मंथन कथा

आज के परिपेक्ष्य में समुद्र मंथन कथा

जरूर पढ़े!

Siddharth Tabish
Siddharth Tabish
A Buddhist, writer, actor and thinker. Loves people irrespective of their religion, creed and race.

Samudra Manthan Story

जो नहीं जानते उनके लिए संक्षेप में है कि “असुरराज बलि के राज में राक्षस, असुर, और दैत्य बहुत शक्तिशाली हो गए थे। उस से भयभीत होकर सारे देवता भगवान् विष्णु के पास मदद मांगने जाते हैं। भगवान् विष्णु उन देवताओं से कहते हैं कि आप लोग अभी इतने सामर्थ्य नहीं है कि असुरों को मार सकें, इसलिए आप उनसे मैत्री भाव रखें। और असुरों के साथ मिलकर Samudra Manthan करें। चूँकि असुर शक्तिशाली हैं इसलिए उनको बिना लिए Sagar Manthan संभव नहीं होगा। Samundar Manthan करने से आपको अमृत की प्राप्ति होगी। उसका पान करने के बाद आप अमर हो जायेंगे और असुरों का नाश कर पायेंगे।

Samudra Manthan Story in Hindi

देवता जब असुरराज को अमृत की बात बताते हैं तो असुरराज बलि समुद्र मंथन के लिए तैयार हो जाते हैं। Samudra Manthan, यानि समुद्र को मथा जाना है। एक एक करके बहुत सारे रत्न और चीज़ें निकलती है जिसे दोनों पक्ष आपस में बाँट लेते हैं।

अंत में जब अमृत निकलता है, जिसे धन्वन्तरि वैद्य लेकर प्रकट होते हैं। तब असुर अमृत कलश को उनसे छीनकर उसे पीने के लिए आपस में लड़ने लगते हैं। देवता चूँकि शक्ति में असुरों के मुकाबले कमज़ोर थे इसलिए किनारे खड़े होकर बस देखते रह जाते हैं।

अंत में भगवान् विष्णु मोहिनी का रूप धारण करके आते हैं। जिसे देखकर असुर कामोत्तेजना से भर जाते हैं और अमृत के लिए लड़ना बंद कर देते हैं। वो मोहिनी के सामने प्रस्ताव रखते हैं कि वो उन्हें अमृतपान अपने हाथों से कराएँ।

मोहिनी रूप में विष्णु असुरो और देवताओं से कहते हैं कि “हे देवताओं और असुरों! आप दोनों ही महर्षि कश्यप के पुत्र होने के कारण भाई-भाई हो फिर भी परस्पर लड़ते हो। मैं तो स्वेच्छाचारिणी स्त्री हूँ। बुद्धिमान लोग ऐसी स्त्री पर कभी विश्वास नहीं करते, फिर तुम लोग कैसे मुझ पर विश्वास कर रहे हो? अच्छा यही है कि स्वयं सब मिल कर अमृतपान कर लो।”

मगर असुर इस बात को तैयार नहीं होते हैं और मोहिनी के हाथों ही अमृतपान करने का आग्रह करते हैं। फिर बड़ी चालाकी से देवताओं और असुरों को अलग अलग पंक्ति में बिठा कर विष्णु देवताओं को अमृतपान करा देते हैं। और असुर, मोहिनीरूपी विष्णु के मोहपाश में बंधे मुहं बाए, कामातुर, सम्मोहित बैठे रह जाते हैं।

इस कथा के और भी पहलू हैं मगर संक्षेप यही है!

ये कथा बहुत ही प्रतीकात्मक है। आप इसे किसी “Dharm” की नज़र से अगर न देखें तो इस कथा में बहुत ही गूढ़ रहस्य छिपे हैं। इसीलिए ये कथा मुझे बहुत प्रिय है।

यह कथा मंथन की बात करती है। आपने चुनाव के दौर में भी अनेकों बार “Manthan” शब्द का इस्तेमाल सुना होगा। “कांग्रेस अपनी हार पर Manthan करेगी”। ”सपा अपनी कम सीटों पर Manthan करेगी और समीक्षा करेगी।” “फ़लाने मुद्दे पर भाजपा Manthan करेगी।” ये Manthan तब होता है जब कुछ बहुत अनोखा हुआ हो। कुछ ऐसा बदलाव जिसकी “आशा” न की गयी हो।

औसत बुद्धि वालों के लिए ये कथा बस यह बताती है कि देवताओं और असुरों ने मिलकर एक पर्वत को नाग की रस्सी (Vasuki Snake) में लपेट के, छाछ से मक्खन निकालने के जैसे, समुद्र मथ दिया और फिर रत्न, कामधेनु, अमृत जो भी निकला सबने आपस में बाँट लिया।

मगर थोडा गहरी बुद्धि रखने वालों के लिए यह कथा बहुत गहरी बात करती है। देवताओं से बलशाली असुर हो जायें। यह बहुत बड़ा बदलाव था। देवता इतने कमज़ोर हो जायें कि उन्हें असुरों के आगे भय महसूस हो। यह पूरी तरह से सृष्टि के नियम का बदलाव था। इस समस्या का मंथन बहुत बड़ा होना था। इतना बड़ा कि जैसे सारा समुद्र ही मथ डाला जाये। लेकिन देवता या असुर अकेले इस पर Manthan करते तो ये एकतरफ़ा हो जाता।

इसलिए मंथन दोनों पक्षों के साथ होना था। और दोनों को ही किसी समझौते पर पहुंचना था। जो असुर प्रकृति के थे वो काम, मोह और सौन्दर्य में फँस गए। जो देवता बुद्धि वाले थे उनका लक्ष्य “अमृत” पर टिका रहा। एक तरह से देखा जाय तो अमृत पीने पिलाने में कोई धोखा नहीं हुआ। बस जो तुच्छ चीज़ों में फंसे रह गए, वो अमृत पाने से वंचित रह गए।

जब मोहिनी रूप धर विष्णु ने दोनों पक्षों को संबोधित किया तो क्या कहा? उन्होंने कहा कि “तुम दोनों ही महर्षि कश्यप के पुत्र हो!” आप जानते हैं ये ऋषि कश्यप कौन थे? वही ऋषि कश्यप जिनके नाम पर “कश्मीर” का नामकरण हुआ है। कश्यप से कश्मीर बना और उसी महर्षि की धरा आज इतने बड़े बदलाव से गुज़र रही है कि वहां बिना समुद्र” मंथन के और कोई चारा नहीं बचा है।

यह दो विपरीत “विचारधाराओं” की प्रजातियाँ हैं। एक असुर, एक देवता जैसे विचारों वाली। यहां आप अपनी सुविधानुसार तय करिए कि आपका पक्ष कौन सा है। कौन है जो देव है? और कौन है जो असुर है? किस से किसको ख़तरा है और किस पर कौन ज़ुल्म कर रहा है? यह आप अपनी विचारधारा के अनुसार स्वयं तय करिए। आप जिस भी पक्ष को असुर या देवता मान लें। लेकिन एक अटल सत्य है कि यह मंथन आप दोनों के बीच ही होगा।

Samudra Manthan के बाद का निष्कर्ष

विचारधाराओं का बहुत बड़ा Sagar Manthan होगा और यह शुरू भी हो चुका है। इस Samudra Manthan में किसी को रत्न मिलेगा, किसी को कामधेनु, किसी को अमृत, जिनका लक्ष्य “तुच्छ” होगा, जो “उत्तेजित” होंगे, “कामोत्तेजित” होंगे, वो अमृत से वंचित रहेंगे। जिनका लक्ष्य समस्त सृष्टि के अनुरूप होगा, वो अमृतपान करेंगे।

अमृत “धन्वन्तरि वैद्य” देंगे जो सबको “स्वस्थ” करेगा। “अमृत” शब्द यहां प्रतीकात्मक है। अंत में आपका “निरोगी” होना तय है। आपको जो रोग लग गया है, उस रोग से मुक्ति मिलनी जरूरी है। फिर सब कुछ ठीक हो जाएगा। इसलिए घबराईये मत, ये Manthan बेहद ज़रूरी प्रक्रिया है!

इतना ज़रूरी है कि बिना समुद्र को मथे अब कोई निर्णय नहीं हो सकता। किसके हिस्से में क्या आएगा ये बाद की बात है। मगर जिस किसी भी स्थान पर “सृष्टि” के नियम में बदलाव हो जाता है। वहां “समुद्र मंथन” ज़रूर होता है! और उसका परिणाम समस्त मानव जाति और इस धरा के लिए शुभ होता है।

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