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Criticismजानिए संस्कृत न देवभाषा है, ना ही वेदों की भाषा

जानिए संस्कृत न देवभाषा है, ना ही वेदों की भाषा

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जो धर्म डराए, जो किताब भ्रम पैदा करे, उसमें शिद्दत से सुधार की जरूरत है!

Sanskrit Language – कुछ लोगों ने यह भ्रम फैलाया, कि Sanskrit Devbhasha है। और आप उनके भ्रमजाल में फंस गए। आज इस भ्रमजाल के बारे में आप जानेंगे कि संस्कृत किसे कहते हैं? एंव देवभाषा संस्कृत क्यों नहीं है?

आपने अक्सर कुछ लोगों को यह कहते सुना होगा कि ‘संस्कृत एक देवभाषा है!’ और वेदों को संस्कृत भाषा में लिखा गया है। जबकि यह दोनों बातें ही गलत हैं। आइये आज जानते हैं कि संस्कृत भाषा का सच क्या है? जिसे कुछ लोग Sanskrit Devbhasha बताते हैं।

संस्कृत किसे कहते हैं?

संस्कृत (संस्कृतम्) भारतीय उपमहाद्वीप की एक भाषा है। वेदों की भाषा को भी पुरानी Sanskrit कहा जाता है। जबकि वो संस्कृत नहीं है। वेदों की भाषा और ईरान की भाषा अवेस्ता में एक ही मुख्य फर्क है। अवेस्ता में स या श के बदले में ह लिखा जाता है। बाकी लगभग सारे शब्द वेदों की भाषा के साथ मिलते-जुलते हैं। वेदों में गाथा हैं, अवेस्ता में भी गाथा हैं। वेद संस्कृत भाषा में नहीं है। वेद की भाषा को पहले छान्दस कहा जाता था। यह हर कोई स्वीकार करेगा कि वेद, पाणिनि कृत संस्कृत से सदियों पुराने हैं।

जनेऊ भी ईरान की निशानी है!

दरअसल, तीन-चार हज़ार साल पहले के ईरान, अरियन या आर्यन (प्राचीन अरबी लिपि के अनुसार) भारत की सीमा और Ancient Greater की सीमा एक दूसरे से मिली हुई थी। धर्म और जीवनचर्या के मामले में हम एक-दूसरे से अलग नहीं थे। हम दोनों अग्नि पूजक थे और जनेऊ पहनते थे। भले ही जनेऊ की मोटाई आज की अपेक्षा थोड़ी अलग दिखती हो।

पालि में श, ष, क्ष, ज्ञ, श्र, ऋ और त्र शब्द नहीं होते। साथ ही उसके स्वरों में औ, ऐ और अ: भी नहीं शामिल है। पालि में कुल 41 अक्षर हैं – आठ स्वर और 33 व्यंजन। संस्कृत और हिंदी की वर्णमाला में कुल 10 अक्षर और जोड़ दिए गए। साथ ही ळ भी कभी-कभी उसमें शामिल बताया जाता है। हालांकि ळ का प्रयोग गुजराती और मराठी में सबसे ज्यादा होता है। मसलन, हम जिसे टिटवाला बोलते हैं, वह असल में टिटवाळा है।

मागधी से बना पालि, पालि से बन गया संस्कृत।

मैं भी बचपन से यही मानता था कि Sanskrit Bhasha ही सभी भारतीय भाषाओं की जननी है और वह सामान्य नहीं, बल्कि एक Devbhasha है। लेकिन पालि सीखने के बाद जाना कि संस्कृत तो पालि से ठोंक-पीटकर गढ़ी गई भाषा है। खुद ही देख लीजिए। अहं गच्छामि, सो गच्छति, त्वं गच्छसि, मयं गच्छाम – ये सभी पालि के वाक्य हैं। संस्कृत में सो को सः और मयं को वयं कर दिया गया, बस!

बुद्धं शरणम् गच्छामि,
धम्मं शरणम् गच्छामि
संघम् शरणम् गच्छामि

इन वाक्यों को Sanskrit समझने की भूल मत करिएगा। ये शुद्ध रूप से पालि के वाक्य हैं।

दरअसल पालि उत्तर भारत और विशेष रूप से मगध जनपद की प्राचीन प्राकृत (Prakrit -The language of North and Central India) है। इसे मागधी भी कहते हैं, बल्कि कहा जाए तो यह मूलतः मागधी प्राकृत ही है। गौतम बुद्ध छह साल साधना करने के बाद जब वापस लौटे तो अनुभव से हासिल ज्ञान घर-घर पहुंचाना चाहते थे। तब आम लोगों में लोकभाषा और खास लोगों में वेदों की छान्दस भाषा चलती थी।

बुद्ध ने वैदिक छान्दस को न अपना कर लोकभाषा का ही सहारा लिया। जहां उन्होंने अपने उपदेशों का छान्दस में अनुवाद करने से मना किया, वहीं दूसरी ओर “अनुजानामि भिक्खवे, सकाय निरुत्तिया” कहकर सभी प्राकृत भाषाओं में अपने उपदेशों को पेश करने की खुली अनुमति दे दी।

बाद में चूंकि सारी बुद्धवाणी मागधी प्राकृत में पालकर रखी गई (पहले कंठस्थ करके और फिर लिपिबद्ध करके) तो मागधी के इस अंश को पालि कहा जाने लगा। बुद्ध ने 45 साल तक मगध से लेकर गांधार तक इसी भाषा में लोगों के बीच अपनी बात रखी तो यह भाषा समूचे इलाके में प्रचलित हो गई। उसके शब्द अन्य प्राकृत भाषाओं में शामिल होते गए। मसलन पालि में मां के लिए बोला गया अम्मा शब्द अवधी बोलनेवाले हम लोगों के लिए बड़ा सहज है। पालि का पाहुन शब्द आज भी भोजपुरी में अतिथि के लिए इस्तेमाल होता है।

तब के भारतीय समाज में बुद्ध की बातों का इतना असर था कि भारत के पहले राजद्रोही ब्राह्मण पुष्यमित्र शुंग के दरबारी पाणिनि को इसकी काट के लिए पालि का सहारा लेना पड़ा, लेकिन उसे संस्कृत भाषा बना कर। कहा जाता है कि कालिदास के नाटकों में जहां संभ्रांत चरित्र संस्कृत बोलते हैं, वहीं महिला व आम लोगों के पात्र पालि बोलते हैं। यह भी दरअसल एक तरह का भ्रम है क्योंकि संस्कृत तो मूलतः पालि है और पालि की मूल भाषा मागधी है।

हालांकि Sanskrit Bhasha के पाणिनि व्याकरण में जहां लगभग 4000 सूत्र है, वहीं पालि के सबसे बड़े व्याकरण – मोग्गल्लान व्याकरण में सूत्रों की संख्या 800 के आसपास है। नकल वाली चीज़ में ज्यादा ताम-झाम जोड़ना ही पड़ता है। अब आपको समझ में आ गया होगा कि संस्कृत न तो देवभाषा हैं, न किसी भाषा की जननी

देवभाषा संस्कृत | मूल को कोई पूछने वाला कोई नहीं है!

भारत में जितने राज्य हैं, उन राज्यों में जितने जिले हैं, उन जिलों में जितने शहर व तहसीलें हैं, इनकी संख्या से भी ज्यादा संस्कृत की पाठशालाएं हैं। मूल पालि के गिने-चुने पुछत्तर हैं। देश ही नहीं, विदेश तक के 99.99 प्रतिशत आम व खास लोग संस्कृत को सारी भारतीय भाषाओं की जननी मानते हैं। मैक्समुलर जैसे विदेशी विद्वान तो इसे आर्य परिवार की भाषा मानते हैं और इसका रिश्ता लैटिन तक से जोड़ते हैं।

21वीं सदी में अब हमें इस तरह भ्रम से अब मुक्त हो जाना चाहिए। तभी हम भारतीय जनमानस पर सदियों से लादे गए झूठ के पहाड़ को तिनका-तिनका काट सकते हैं। नकल को छोड़ हमें असल को अपनाना होगा। भारत के प्राचीन इतिहास को जानने के लिए संस्कृत के बजाय पालि को मूलाधार बनाना होगा, तभी हम अतीत की हकीकत जान पाएंगे।

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