मलाला के बयान से कौन आहत है?

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Malala Yousafzai Interview- फैशन पत्रिका (Vogue) वोग की पत्रकार (Sirin Kale) सीरीन केल को दिए एक इंटरव्यू में नोबुल पुरस्कार से सम्मानित मलाला के बयान में शादी को गैरजरूरी बताया गया। उन्होने कहा कि “मुझे यह बात समझ में नहीं आती कि लोग शादी क्यों करते हैं? अगर आपको जीवन साथी चाहिए, तो आप शादी के कागज़ों पर साइन क्यों करते हैं? यह एक पार्टनरशिप क्यों नहीं हो सकती?”

“I still don’t understand why people have to get married. If you want to have a person in your life, why do you have to sign marriage papers, why can’t it just be a partnership?”

~Malala Yousafzai

बयान पर कौन आहत हो रहा?

Malala Yousafzai Interview मलाला के बयान का तीखा विरोध सोशल मीडिया पर देखने को मिल रहा और मज़े कि बात यह कि यह विरोध सबसे ज़्यादा 18 से 25 साल के वो नवयुवा कर रहे हैं, जिनके लिए सेक्स ही सब कुछ होता है। और वो भी किसलिए, क्योंकि ये पैदा होते ही एक ऐसी संस्कृति की बातें सीखते हैं जहां ऐसा बोलना, ऐसा सोचना और ऐसा करना “पाप” की  श्रेणी में आता है। सिर्फ़ एक “सोच” जो इन्हें पकड़ा दी गयी है उसी को लेकर ये अपने आसपास का समाज गढ़ते हैं और उससे “रौशन ख़्याल वालों के लिए” नर्क बना देते हैं।

यहां ध्यान दीजिये, कि मलाला के बयान शादी जैसे बंधन के खिलाफ हैं, न कि किसी धर्म के लिए, अगर यह विचार विद्रोही भी माना जाए तो सभी धर्मों के लोगों को इसका विरोध करना था, किन्तु ऐसा होता कहीं दिखा नहीं। सोचिए सिर्फ मुस्लिम ही क्यों विरोध का मोर्चा संभाल लिये? विरोध भी कोई ऐसा-वैसा नहीं बल्कि बेहद निम्न स्तर की भावनाएँ व्यक्त करके।

आप जानते हैं शादी क्या है?

कुछ नहीं बस एक तरह का अनुबंध जो आप को और आपके पार्टनर को कानूनी रूप से बांध देता है। कि अब आप इनके साथ रहिये ये आपके साथ। बस, यह आपको एक तरह की सोशल सिक्योरिटी देता है। उसके अलावा शादी और क्या है? यह कोई दैवीय व्यवस्था नहीं है। हम मनुष्यों ने अपनी “असुरक्षा” की भावना से बचने के लिए शादी जैसी रीति का निर्माण किया। इसके अलावा इसकी कोई वजह नहीं थी। पहले के ज़माने में जो जबर होता है सारी अच्छी औरतों पर अपना हक़ जमा लेता था। गरीबों और कमज़ोरों को अच्छी और सुंदर लड़की मिल ही नहीं पाती थी।

इस्लाम के समय अरब में पांच से छह तरह की शादी प्रचलन में थी। जिसमें से एक तरह की शादी को इस्लाम मे मान्यता दे दी गयी। जिस शादी प्रथा को मान्यता दी गयी वो “महर” वाली शादी थी। जिसमें लड़का, लड़की को एक सुनिश्चित “रकम” दे कर उस से सारी उम्र साथ रहकर सेक्स करने का अधिकार लेता था। ये एक तरह का सौदा होता है। जहां आप रकम देकर कुछ ख़रीदते हैं। और वो रकम आपको लड़की को सेक्स करने से पहले हर हाल में चुकानी होती है। अगर नहीं चुका पाते हैं तो आपको उस लड़की को छूने से पहले उस “रकम” को माफ़ या उधार करवा लेना होता है।

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अब आप थोड़ी देर के लिए अपनी आस्था को एक किनारे रखकर ठंडे दिमाग़ से सोचकर देखिये कि इसमें क्या “दैवीय” है? एक निश्चित रकम अदा करके किसी लड़की को ख़रीदकर उसके साथ सेक्स करना दैवीय है? और आप अगर न ख़रीद पाएं लड़की तो आपके घर वाले उसे आपके लिए ख़रीद कर आपको दे दें, ये दैवीय है?

Malala-Yousafzai Vogue-Cover

शादी पार्टनरशिप क्यों नहीं हो सकती?

आप किसी से प्यार कर रहे हैं और दोनों लोग अपनी मर्ज़ी से साथ रहने का निर्णय करें और अपनी मर्ज़ी से एक परिवार का निर्माण करें तो इसे दैवीय कहा जा सकता है। जहां प्यार करने के लिए कोई एक दूसरे को न तो ख़रीदे और न बेचे और न कोई रकम अदा करे!

सोचकर देखिये, अगर ठीक से सोच पाएंगे तो आपको शादी की ये प्रथाएं घिनौनी और अपमानजनक लगने लगेंगी। ये सिर्फ़ इस्लाम में ही नहीं, हिन्दू धर्म मे भी वैसी ही है। जहां कन्या को अपनी संपत्ति समझ के “दान” कर दिया जाता है। और दान दे कर उसे दूसरे के हाथ मे सौंप दिया जाता है जिस को वो व्यक्ति उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए। ये कोई प्रेम जनित संबंध नहीं होता है। ये सामाजिक तौर से लेन-देन का व्यापार है जहाँ समाज आपको “सेक्स” करने की “आज्ञा” दे देता है बस.. ख़रीद कर, झूठ बोलकर, फ़ालतू के दिखावे कर के, आपके लिए किसी तरह एक लड़की का जुगाड़ कर दिया जाता है और कहा जाता है कि जाओ अब “सो” इसके साथ। और इसे ये “विवाह” का नाम देते हैं।

अगर आप को सदियों से “मल” खिलाया जाय और एकदम से कोई आपको ये बता दे कि “मल” खाने की चीज़ नहीं होती है बल्कि फेंकने की होती है तो आप उसे मारने दौड़ेंगे। ये समाज आपको जिस भी बेकार से बेकार संस्कृति और सोच के लिए चाहे तो ट्रेंड कर सकता है। मगर समय-समय पर कुछ “रौशन ख़्याल” वाले लोग जागेंगे और उन्हें “मल” में बदबू आएगी और वो खाने से इनकार करेंगे।

मलाला के बयान सुरक्षित परिवेश का नतीजा कैसे है?

क्या आप जानते हैं कि मलाला अगर पाकिस्तान या अफ़ग़ानिस्तान में रह रही होतीं तो वो कभी भी इस तरह का बयान न देती, जो उन्होंने दिया है। क्योंकि तब वो वैसा ही सोचती जैसा आप सोचते हैं। वो उतना ही असुरक्षित महसूस करती जितना आप कर रहे हैं। ये बयान सिर्फ़ मलाला के मौजूदा “सुरक्षित परिवेश” का नतीजा है, जहां महिलाएं अगर बिना शादी किये किसी के साथ रहें तो वो न तो व्यभिचारी होती हैं और न कुलटा।

मगर भारत जैसे देश में ऐसे स्वच्छंद विचार की अभी इसलिए जगह नहीं बन पा रही है क्योंकि यहां असुरक्षा की भावना बहुत प्रबल है। ऐसा नहीं है कि यहां लोग बिना शादी के रहते नहीं हैं, रहते हैं। मगर फिर भी लोग अभी इसे मन से स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं। ख़ासकर औरतें क्योंकि वो बहुत असुरक्षित महसूस करती हैं। उन्हें सबसे बड़ा डर ये होता है कि अगर मर्द ऐसे बिना किसी बंधन के उनके साथ रहा तो उनके भविष्य का क्या होगा? बच्चे हो गए तो वो उसे कहाँ लेकर जाएंगी? उनका डर बिल्कुल वाज़िब है क्योंकि ये जो भारतीय समाज आपने बनाया है वह अभी भी पूरी तरह से पुरुष प्रधान (पितृसत्तात्मक) है।

जो महिलाएं असुरक्षा को लेकर चिंतित हैं, वो बिल्कुल वास्तविक है, मैं उनसे सहमत हूँ। मगर कुछ महिलाएं जिनके पास भारत की संस्कृति और सभ्यता को लेकर सौ दलीलें हैं, वो “धूर्त” हैं। ये वही महिलाएं हैं जिन्होंने भिन्न-भिन्न रूपों में “रिश्तों” की दुहाई देकर ऐसा घिनौना समाज गढ़ दिया है जिसमें ख़ुद औरत “नर्क” की तरह जीती है। ये कभी सास बनती हैं कभी कुछ और। ये ना तो अपने बेटे को जीने देती हैं और न अपनी बहू को। ये जब मलाला जैसों के बयान का विरोध करती हैं तो इनका विरोध शुद्ध राजनैतिक होता है, ये यहां शातिर दिमाग़ से गणना कर के विरोध करती हैं जैसा ये अपने घरों में करती आयी हैं।

इस तरह की महिलाएं कभी समझ ही नहीं पाती हैं कि किस उम्र तक बेटे को पुचकारना और दुलराना है और किस उम्र में अपने बेटे से दूरी बना लेनी है। ये कभी समझ ही नहीं पाती हैं कि कब उन्हें घर की “सत्ता” से रिटायर होना है और कब गाड़ी में “बैक सीट” पर बैठना है। ये सारी उम्र परिवार और रिश्तों की सत्ता का खेल-खेलती रहती हैं, इन्हें मलाला जैसी विचारों वाली लड़की से बहुत डर लगता है। इन्हें रिश्ते बनाने होते हैं ताकि ये अपने बच्चों और परिवार पर “हुकूमत” कर सकें।

जो सत्य है उसे स्वीकार करना सीखिये!

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इसलिए मुझ से भारत की सभ्यता और संस्कृति का कॉपीराइट ले कर बात न किया करिए। जो सच है, उसे कहना और स्वीकार करना सीखिए! भारत वह देश है जहां हमारे पुरखों ने ‘कामसूत्र’ लिखी और अजंता और खजुराहों की मूर्तियां गढ़ीं हैं। अब आप जैसे लोग प्रेम में पड़े एक जोड़े के स्वच्छंद साथ रहने पर अगर ऐतराज़ करते हैं तो आप ये भारत की सभ्यता और संस्कृति की वजह से नहीं कर रहे हैं, ये आप अपनी “छुद्र पारिवारिक सत्ता” की संरचना पर राज करने के लिए कर रहे हैं।

अपने असल भारत को समझिए!

ये भारत की सभ्यता और संस्कृति नहीं थी कि आप पार्क में बैठे प्रेमी जोड़ों को मारें-पीटें और जेल भेजें। ये भारत की सभ्यता कभी थी ही नहीं, कि आप प्रेम को घृणा की दृष्टि से देखें। ये भारत की सभ्यता नहीं थी कि आप बिना शादी के रहने वाले लोगों को “व्यभिचारी” कहें। पश्चिम ने अपनी संस्कृति और खुलेपन की सोच पर किसी विदेशी सोच को हावी नहीं होने दिया। वो अपने इस सोच की रक्षा हर क़ीमत पर करते हैं।

आप जैसे मानसिक ग़ुलाम भूल चुके हैं कि आपके पुरखे किस सभ्यता और संस्कृति के रक्षक थे। आप किन लोगों की संस्कृति को “अपना” बता रहे हैं ये आप समझ ही नहीं पाते हैं और सारी उम्र और ख़ुद को भारतीय संस्कृति का रक्षक बोलते रहते हैं। मलाला अगर भारत के पुरातन युग में, पैदा हुई होती तो मलाला के बयान यहां की किताबों में दर्ज होता, न कि घृणा का पात्र बनता। आज का भारत अब असल भारत नहीं बचा है, ये “विदेशी हमलावरों” की सोच का भारत है।

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