Shriram Lagoo | अलविदा डॉ. श्रीराम लागू

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फिल्म जगत के जाने माने अभिनेता, लेखक, निदेशक और अपने निजी जीवन में ईश्वर की सत्ता का एक सिरे से खण्डन करने वाले नास्तिक व एक प्रगतिशील व्यक्ति Dr Shriram Lagoo 17 दिसंबर, 2019 को इस संसार को अलविदा कह गये। उनका शवदहन शुक्रवार दोपहर राजकीय सम्मान के साथ पुणे, महाराष्ट्र में किया गया। दिवंगत लागू के दामाद डॉ. श्रीधर कानेटकर के मुताबिक, ‘वे भगवान को नहीं मानते थे और चाहते थे कि हिंदू धर्म के तहत उनका अंतिम संस्कार न किया जाए। वे जो चाहते थे, हमने उसका सम्मान किया।‘ अत: उनके शवदहन के समय किसी प्रकार की रस्में आदि नहीं की गई।

उनका दाह संस्कार 12.30 बजे विद्युत शवदाह से किया गया। डॉ. लागू की आयु 92 साल थी। उनका निधन 17 दिसंबर (मंगलवार) की रात हार्ट अटैक से हुआ। उनके बेटे डॉ. आनंद लागू अमेरिका में रहते है, जिस वजह से उनके में तीन दिन शवदहन का वक्त लगा।

सरकार ने 21 तोपों की सलामी दी

बहुआयामी जीवन के मालिक Dr. Shriram Lagoo को फिल्मी जगत, रंगमंच जगत् और उसके बाहर भी कितने सम्मान से देखा जाता था इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उनकी मृत्यु पर महाराष्ट्र सरकार ने राजकीय सम्मान में उन्हें 21 तोपों की सलामी दी। महाराष्ट्र सरकार में कैबिनेट मंत्री सुभाष देसाई ने शमशान घाट पहुंच कर डॉ. लागू के कॉफिन पर माल्यार्पण किया। अंतिम संस्कार में मनोरंजन जगत से नाना पाटेकर, अमोल पालेकर, उर्मिला मातोंडकर, विजय केंकरे, डॉ. जब्बार पटेल और राज ठाकरे समेत सिनेमा और राजनीति जगत की कई हस्तियां शामिल हुई।

श्रीराम लागू ने 50 साल में हिंदी मराठी की 200 से ज्यादा फिल्मों में काम किया। उन्होंने मराठी, गुजराती और हिंदी के 40 से ज्यादा नाटकों में काम किया। 20 मराठी प्ले भी डायरेक्ट किए। उन्हें मराठी रंगमंच के महान अभिनेताओं में गिना जाता है। उन्होंने ‘घरौंदा’,लावारिस’, मुकद्दर का सिंकदर’, ‘हेराफेरी’, ‘एक दिन अचानक’ जैसी यादगार फिल्मों महत्वपूर्ण किरदार निभाए।

श्रीराम लागू ने अपना जीवन ई. एन. टी. सर्जन के रूप में शुरू किया था। 1960 में उन्होंने तंजानिया में मेडिकल प्रैक्टिस की। 1969 मे वे पूर्णकालीन एक्टर हो गए। उन्हें 1978 में फिल्मफेयर अवॉर्ड से नवाजा गया था। श्रीराम लागू को 1978 में हिंदी फिल्म ‘घरौंदा’ के

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लिए श्रेष्ठ अभिनता का फेयर पुरस्कार से प्रदान किया गया। वे एक संजीदा लेखक थे और बहुत सी पुस्तकें भी लिखीं। उनकी किताबों में ‘गिधडे’, ‘गाबा’ और आत्ममाथा शामिल हैं। उनकी आत्मकथा का शीर्षक ‘लमाण’ हैं जिसका हिंदी में अर्थ है ‘मालवाहक’।

डॉ. श्रीराम लागू एक नास्तिक थे

गॉड इज़ डेड (ईश्वर मर चुका है)

डॉ. श्रीराम लागू ने एक आर्टिकल लिखा था- ‘टाइम टु रिटायर गॉड’ अर्थात, ‘ईश्वर को रिटायर करने का वक्त आ गया है।’ श्रीराम लागू के इस आर्टिकल ने उतना ही विवाद बटोरा जितना नीत्शे के कथन ने।

एक लेक्चर के दौरान डॉ. श्रीराम लागू ने कहा था

‘मैं ईश्वर को नहीं मानता! मुझे लगता है कि समय आ गया कि ईश्वर को रिटायर कर दिया जाए !’

दिलचस्प बात यह है कि जिस मानव की बात नीत्शे ने की थी, Dr Shriram Lagoo भी अपनी बातों में उसी महामानव की बात करते थे।

श्रीराम लागू केवल मराठी के रंगमंच मूवमेंट के लिए ही नहीं, महाराष्ट्र के अंधविश्वास मिटाने वाले आंदोलन के लिए भी याद किया जाएगा। वर्षों से वे महाराष्ट्र अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति के साथ लगातार सक्रिय रूप से जुड़े हुए थे। यह वही समिति है जिससे नरेंद्र दाभोलकर और गोविंद पनसारे जैसे विख्यात विचारक जुड़े हुए थे और अपना बलिदान दे दिया।

इसे भी देखें: तर्कशील पथ – वैज्ञानिक चिंतन की आवाज़

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