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सोमवार, जून 14, 2021

Kupamanduka kahani kyon yaad rakhni chahiye?

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कूपमंडूक संस्कृत भाषा का एक मुहावरा है। इसका अर्थ होता है। कूप यानि कुआं, मंडूक मतलब मेढ़क।
यानि कुएं का मेढ़क (Frog in a well)। अब देखते हैं कि Kupamanduka वाली कहानी आपको क्यों याद रखनी चाहिए?

तो एक था मंडूक यानी मेंढक।

अपने पूरे परिवार के साथ समुद्र में रहा करता था। उसका जीवन वहां सुख से कट रहा था।

लेकिन सुख भी बहुत दिनों तक रहे तो बोझिल लगने लगता उसमें नीरसता उत्पन्न होने लगती है। लगता है, जैसे जीवन में अब कुछ मज़ा ही नहीं रह गया। मंडूक के साथ भी यही हो रहा था तो फिर रोमांच की तलाश में वो निकल पड़ा समुद्र से बाहर। जाने क्यों उसे ज़मीन की ओर जाना ठीक लगा। गहरा समुद्र उसे अब रोमांचक नहीं लगा, उसका आकर्षण खत्म हो रहा था

जमीन पर फुदकते फुदकते वह बहुत दूर चला आया। उसने ज़मीन पर तरह-तरह की चीज़ें देखीं। यहां सब कुछ उसे रोमांचित कर रहा था। तभी फुदकते फुदकते अकस्मात ही उसका पैर फिसला, और छपाक की तेज़ आवाज़ के साथ वो एक बड़े से गड्डे में। दरअसल अपनी मस्ती में वह एक पुराने कुएं की मुंडेर पर चढ़ गया था जिससे फिसल कर वह उस कुँए में गिर पड़ा था। यह सब इतनी तेज़ी से हुआ कि उसकी समझ में नहीं आया कि ये अचानक उसके साथ हुआ क्या है?

इतनी ऊंचाई से गिरने से डर तो गया था, वहीं पानी में रहने की आदत के चलते पानी में गिरना एकबारगी अच्छा भी लग रहा था। लेकिन इस पानी का स्वाद उसे ज़रा भी नहीं भाया। अजीब सा मीठापन था इस पानी में। अभी वह इसके स्वाद से उबर भी न पाया था कि देखा उसके आस-पास कई सारे मंडूक इकट्ठा हैं। लेकिन उनकी शक्ल सूरत उससे थोड़ी अलग थी।

समुद्री मंडूक के साथ क्या हुआ?

सब के सब उसकी ओर उत्सुकता भरी निगाहों से देख रहे थे। उसने उन्हें बताया कि वह ग़लती से यहाँ गिर पड़ा है ये सुनकर कुछ मंडूक तो इधर-उधर चले गए लेकिन कुछ को उत्सुकता ज़्यादा थी सो वे वहीं उसके पास टिके रहे।

उनमें से अपने को चतुर समझने वाले एक मंडूक ने उससे पूछा, “यह तो ठीक है कि तुम ग़लती से यहां गिर पड़े हो लेकिन यह तो बताओ कि तुम आ कहाँ से रहे हो, कहाँ है तुम्हारा घर?”

समुद्र से आए मंडूक ने कहा, “भाई, मैं तो समुद्र में रहता हूँ।”

समुद्र कैसा होता है?

“समुद्र में भी पानी होता है, बस वह बहुत बड़ा होता है।”

“कितना बड़ा?” कुँए के अति उत्साही मंडूक ने पूछा और छपाक से एक छलाँग लगाई और कहा, “इतना बड़ा?”

समुद्री मंडूक को उसकी इस हरकत पर हँसी आई लेकिन उसने संयत रहते हुए कहा, “नहीं, इससे भी बड़ा।”

अब कुँए के मंडूक को थोड़ा आश्चर्य हुआ, उसने पूछा, “इससे भी बड़ा?” और फिर उसने झटपट तीन बार छलांग लगाई, छपाक! छपाक! छपाक!

“तो क्या इतना बड़ा?”

समुद्री मंडूक को समझ में नहीं आया कि वह उनसे क्या कहे…
पहले तो उसने सोचा कि कुँए के उन बेचारे मेंढको को बताए कि समुद्र वास्तव में कितना बड़ा होता है
लेकिन उसे लगा कि इन Kupamanduka (Frog in a well) को वह चाहे तो भी नहीं समझा सकता
कि समुद्र कितना बड़ा होता है क्योंकि वह उनकी कल्पना में समा ही नहीं पाएगा।

समुद्री मेंढक ने Kupamanduka (Frog in a well) को समुद्र का आकार बताने का विचार मन से निकाल दिया
और वह उस कुएं से बाहर निकलने के बारे में सोचने लगा।

ये कहानी क्यों याद रखनी चाहिए?

इस कथा को याद रखने का अभिप्राय ये है कि ये किसी और दुनिया की नहीं, भारत की ही एक प्राचीन कथा है। हमारे पूर्वजों ने हजारों बरसों से, इसे सुना-सुना कर, यह समझाने की कोशिश की, कि संभावनाएँ… अनंत हैं। सच वैसा नहीं, जैसा तुम जानते समझते हो… वो बेहिसाब हैं।

उन्होने समझाया -‘नेति!-नेति’…!

कहा कि नज़र बदलो, निगाहें बदलो, दृष्टि दुरुस्त करो, कि यही केवल अंत नहीं। आगे बढ़ो कि सच और संभावनाएँ असीम हैं।

बताया और उम्मीद की…

कि बंधना नहीं…! मत होना अपने ही विचारों और सोच का कैदी।

अपने वंशजों को, सोच के बंधनों से मुक्त कराने, आज़ाद कराने के लिए, क्या-क्या जतन नहीं किए उन्होने। ये जानते हुए कि कुएं का मेढ़क, कभी भी ‘समुद्र’, समझ नहीं पाया। वे छोड़ गए, नेति-नेति और Kupamanduka कथासूत्र, इस उम्मीद में कि कभी तो… उनके बच्चे, अपने बंधनों से मुक्त होंगे।

पर अफ़सोस! कितना निराश होते होंगे वे..!

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