Subconscious mind हैक कैसे हो जाता है?

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Ashfaq Ahmad
कलमघसीट आदमी हूँ जिसने जिंदगी में अगर कोई चीज़ ढंग से सीखी है तो बस यही है!
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अक्सर मेरे आस-पास का कोई भी बंदा किसी भी आकस्मिक परिस्थिति में मेरे मुंह से Allah जैसा वह शब्द सुन सकता है जिससे मेरा कोई वास्ता नहीं। यह कैसे होता है… क्योंकि बचपन से मैंने जिस माहौल को जीया है उसमें चारों तरफ एक अदृश्य ‘Allah’ मौजूद था जो मेरे विकसित होते दिमाग के साथ मेरे अवचेतन मन (Subconscious mind) में इस तरह घुस के बैठ गया कि मैं चाहूँ भी तो इससे पीछा नहीं छुड़ा सकता।

मैं ये सब इसलिये बता रहा हूँ क्योंकि:-

मैं कतई रवायती धार्मिक नहीं हूँ। किसी ईश्वर को नहीं मानता। इस Universe को बनाने वाला अगर वाकई कोई है तो वह अज्ञात है, जिसे हम जान-समझ ही नहीं सकते। उसके होने न होने की बहस मेरे लिये बेमानी है। मैं ऐसे किसी ईश्वर को नहीं मानता जो दुनिया के अलग-अलग धर्मों ने गढ़ रखे हैं।

The power of subconscious mind

यही अवचेतन मन यानि Subconscious mind की ताकत है। Business हो या Politics, इनसे जुड़े बड़े-बड़े Program इसी Subconscious mind को Target कर के बनाये जाते हैं और इनसे बड़े-बड़े विशेषज्ञ जुड़े रहते हैं। Business world में Advertisement बनाने में इस चीज पर ही Focus किया जाता है कि कैसे Targeted Customers के Subconscious Mind में हम अपना Product रोप सकते हैं। Politics में 2012-13 से पहले इसका कोई खास रोल नहीं था और अक्सर स्वतः स्फूर्त आन्दोलन ही सत्ता को उखाड़ फेंकते थे लेकिन फिर Politics में इसका निर्मम प्रयोग शुरु हुआ कि वोटर को एक ऐसी Machine में बदल दिया गया जहाँ उसके लिये समस्या जैसी कोई समस्या ही नगण्य हो कर रह गयी। जहाँ एक ऐसे परपीड़ा कामी समाज का सृजन कर दिया गया है कि बंदे का सारा हित और सुख दूसरे की पीड़ा और परेशानी तक सीमित हो कर रह गया है।

इसके आधारभूत स्तम्भ Social और Mainstream Media हैं… Social media के सभी Platform का इस्तेमाल करके Fabricated ज्ञान के दम पर एक ऐसी भीड़ खड़ी कर दी गयी है कि जो कभी सत्ता की तरफ से मिलने वाली छोटी-छोटी परेशानियों पर उबल पड़ते थे, वे आज बड़ी-बड़ी परेशानियों को भी Justify करने के बहाने ढूँढते हैं। Mainstream Media के जरिये लगातार इस Flow को बनाये रखने की कवायद हो रही है ताकि इस भ्रमजाल से बंदा कभी निकल ही न सके।

पिछले दिनों काफी घंटे एक बड़े Eye-Specialist के Clinic में, Mayo Hospital और निदान डायग्नोस्टिक सेंटर में गुजारने पड़े जहाँ Tv लगे थे और मेरी तरह Waiting की प्रक्रिया से गुजरते लोगों के पास मजबूरी में वो Tv निहारने के सिवा कोई विकल्प नहीं था जिस पर Continue पाकिस्तान, मोदी, इमरान, हाफिज सईद वह, देशभक्ति, देशद्रोही ही चल रहा था News के नाम पर।

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आप आज के दौर में Hotel, Hospital, Salon टाईप किसी भी सार्वजनिक जगह चले जाइये, जहाँ Tv लगा हो। उस पर लगातार न्यूज के नाम पर यही चल रहा होगा। जो समझदार हैं, वे इस खेल को समझ सकते हैं और इसके प्रभाव से बच सकते हैं लेकिन देश की ज्यादातर आबादी कम पढ़ी-लिखी, अनपढ़ और इस टाईप रणनीति से बिलकुल अनजान है जानकार लोग News के नाम पर चाटुकारिता के सोपान गढ़ते, कचरा फैलाते नमूनों को गालियाँ दे कर भड़ास निकाल लेते हैं लेकिन आम आदमी तो जो देख रहा है, उसे ही सच समझ रहा है और उसके सोचने समझने की क्षमता लगातार इससे प्रभावित हो रही है।

न उसे अपनी जिंदगी से जुड़ी समस्या से अब कोई मतलब रहा जा रहा न नेता के नाम पर वो किसी और को हजम कर पा रहा। Tv के भरोसे वह पाकिस्तान की समस्याओं, नाकामियों, और अपमान को ही बस समस्या समझने लग गया है, इसी में खुश है कि पाकिस्तान या पाकिस्तानी कैसी तकलीफ़ में हैं, साथ ही प्रतीकात्मक रूप से वह देश के ही मुसलमानों को पाकिस्तान के प्रतिनिधि के रूप में Suppose कर लेता है जिससे उसकी खुशी दोगुनी हो जाती है… और नेता के तौर पर दिन-रात एक ही चेहरे को देखते उसने मान लिया है कि देश में एक ही नेता है और इस तरह उस आम आदमी के Subconscious mind में विकल्पहीनता की स्थिति बसा दी गयी है।

Tv से निकलता है तो हाथ में थमे Mobile से कोई न कोई जहर उसके Subconscious mind तक पहुंचा दिया जाता है कि वह एक Robo पब्लिक में बदल कर अब एक समुदाय के खिलाफ़ नाम सुनते ही एंग्री रियेक्शन देता है, चाहे उसका एक भी निजी अनुभव उस समुदाय के साथ बुरा न रहा हो और इसकी नफ़रत की प्रतिक्रिया में देश में दूसरा वर्ग भी खड़ा हो गया है जिसे इनकी पीड़ा से आनंद आता है। एक वो हैं जिन्हें डेढ़ महीने से बंधक बने कश्मीरियों को देख कर बेपनाह खुशी है और अगर वे मर जायें तो इनकी खुशी शायद दोगुनी हो जाये। इन्हें मतलब नहीं कि वे भी इंसान हैं, और कुछ उद्दंड या गलत रास्ते चले गये लोगों की सजा पूरे राज्य को नहीं दी जा सकती।

फिर जब किसी बैंक के #PMC होने पर यह रोते हैं क्योंकि फिलहाल तो ज्यादा तादाद इन्हीं की है तो ऐसे हादसों के शिकार भी यही ज्यादा होंगे तो दूसरे को मजा आता है। कुल मिला कर हम धीरे-धीरे ऐसे समाज के रूप में ढल रहे हैं जहाँ कोई विपदा या समस्या सामूहिक न रह जाये, बस हर Victim अपनी समस्या को ले कर अकेला दुकेला रोता रहे और उसका विरोधी अपनी तकलीफ़ भूल कर सामने वाले की परेशानी को Enjoy करता रहे। इससे सत्ता के खिलाफ स्वतः स्फूर्त या प्रायोजित कैसा भी आंदोलन कभी न खड़ा हो सके और न ही सत्ता को कोई ख़तरा पेश आये और मनमाने निर्णय पूरे निरंकुश भाव से लिये जाते रहें।

तो कुल मिलाकर यह Subconscious mind में रोपी जाने वाली नफ़रत और हिंसा धीरे-धीरे हम सभी को Zombie बना रहा है। बड़ा वर्ग तो Social और Mainstream media की बदौलत ऐसा बन रहा है और दूसरा बचा-खुचा वर्ग इन्हें देख कर इनकी प्रतिक्रिया में। आज की तारीख में इस संक्रमण से निर्लिप्त रह पाना लगभग असंभव है।

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