तुर्की में नास्तिकता क्यों बढ़ रही है?

Must read

DG
जो धर्म डराए, जो किताब भ्रम पैदा करे, उसमें शिद्दत से सुधार की जरूरत है!
- Advertisement -

एक सर्वे के अनुसार, तुर्की के लोग अब इस्लाम के भ्रमजाल को छोड़ नास्तिकता की ओर बढ़ रहे हैं, वहां नास्तिकों की संख्या पिछले 10 सालों में तीन गुनी हो गई है। कुछ लोग इसका कारण राष्ट्रपति रजब तैयब एर्दोगन (Recep Tayyip Erdoğan) की धर्म आधारित राजनीति भी बताते है?

सर्वेक्षण कराने वाली कंपनी है ‘कोंडा’। जिसके हुए सर्वे ने बताया कि बड़ी संख्या में तुर्क लोग खुद को अब नास्तिक मानने लगे हैं। कोंडा सर्वे के मुताबिक़, पिछले दस साल में नास्तिकों की संख्या वहां तीन गुना बढ़ गई है। सर्वे में ये भी पाया गया कि जो इस्लाम को मानते थे उनकी संख्या 55 प्रतिशत से गिर कर 51 प्रतिशत हो गई है। अब थोड़ा विस्तार से जानते हैं कि तुर्की में नास्तिकता क्यों बढ़ रही है?

तुर्की में नास्तिकता पर कंप्यूटर वैज्ञानिक ने क्या कहा?

10 वर्षों से नास्तिक 36 साल के कंप्यूटर वैज्ञानिक अहमत बाल्मेज (Ahmet Balyemez) बताते हैं कि “तुर्की में धार्मिक जबरदस्ती होती है। लोग खुद से पूछते हैं कि क्या यही असली इस्लाम है? जब हम अपने निर्णयकर्ताओं की राजनीति को देखते हैं, तो हमें इस्लाम का पहला युग दिखता है। इसलिए अभी जो हम देख रहे हैं वह पुराना इस्लाम है”।

तुर्की में नास्तिकता
अहमत बाल्मेज, जो अब नास्तिक हैं!

अहमत बाल्मेज आगे कहते हैं कि “मैं एक धार्मिक परिवार में पैदा हुए था। मेरे लिए उपवास और प्रार्थना करना सामान्य सी बात थी। लेकिन फिर एक वक्त ऐसा भी आया कि मैंने नास्तिक बनने का फैसला लिया”।

तुर्की के धार्मिक मामलों के आधिकारिक निदेशक डायनेट ने 2014 में अपनी घोषणा में देश की 99 प्रतिशत से अधिक आबादी को मुसलमान बताया था। लेकिन कोंडा का हालिया सर्वेक्षण इसके उलट साबित हुआ तो इस पर वहां सार्वजनिक बहस छिड़ गई।

तुर्की के धर्मशास्त्री क्या कहते हैं?

- Advertisement -

तुर्की में नास्तिकता पर धर्मशास्त्री केमिल किलिक का मानना है कि दोनों आंकड़े सही हैं। उनका कहना है “हालांकि 99 प्रतिशत तुर्क मुसलमान हैं परंतु वो इस्लाम को सिर्फ सांस्कृतिक और सामाजिक तौर पर लेते हैं। वे आध्यात्मिक मुस्लिम होने के बजाए सिर्फ सांस्कृतिक मुस्लिम हैं”।

केमिल किलिक ने कहा कि वे मुस्लिम जो नमाज पढ़ते हैं या हज़ पर जाते हैं या नकाब पहनते हैं, उनको धार्मिक माना जाता है। लेकिन धर्म सिर्फ यह सब करने से या कुछ खास पहनने से नहीं होता। उन्होंने कहा कि “कोई इंसान धार्मिक है या नहीं यह इस बात से साबित होता है कि क्या उसके कुछ नैतिक और मानवीय मूल्य हैं या नहीं। अगर हम सिर्फ उन लोगों की बात करें जो इस्लाम को मानते हैं, तो तुर्की में केवल 60 प्रतिशत ही ऐसे लोग हैं। नास्तिक होने का ये मतलब नहीं हैं कि आप नैतिक नहीं हैं। कई नास्तिक, मुसलमानों की तुलना में अधिक नैतिक और ईमानदार हैं”।

पिछले सोलह सालों में रजब तैयब एर्दोगन के शासन में तुर्की प्रशासन ने अपनी राजनीति को सही साबित करने के लिए इस्लाम का खूब इस्तेमाल किया है। किलिक बताते हैं, कि “लोग इस्लाम, संप्रदायों, धार्मिक समुदायों, धार्मिक मामलों के निदेशालय और सत्ता में इस्लाम की प्रमुख व्याख्या को अब अस्वीकार करते हैं। वे इस तरह का धर्म और धार्मिकता का आधिकारिक रूप नहीं चाहते हैं”। उनकी इस बात से पता चलता है कि इतने सारे तुर्क अब नास्तिक क्यों हो गये हैं।

क्या बढ़ती नास्तिकता, आस्था पर सवाल है?

तुर्की में नास्तिकता
Image courtesy by Ateizm Derneği

एटिजम डर्नेगी (Ateizm Derneği) नास्तिकों के लिए तुर्की का मुख्य संगठन है। उसकी प्रमुख सेलिन ओजकोहेन का कहना है, “एर्दोगन ने सोचा कि वो धर्मनिष्ठ मुसलमानों की एक पूरी पीढ़ी पैदा कर सकते हैं और उनकी ये योजना बुरी तरह से पिट गई है। धार्मिक संप्रदायों और समुदायों ने खुद को बदनाम कर लिया है। हमने हमेशा कहा है कि राज्य को धार्मिक समुदायों द्वारा शासित नहीं किया जाना चाहिए, क्योंकि इससे लोग अपनी आस्था पर सवाल उठाते हैं और मानवतावादी नास्तिक बन जाते हैं। लोगों ने ये सब होते हुए देखा और खुद को इन सब चीजों से दूर कर लिया। जो लोग तार्किक सोच रखते हैं वो नास्तिक बन जाते हैं।”

ओजकोहेन का कहना है कि “आज लोगों को ये बोलने में डर नहीं लगता की वो नास्तिक हैं!” लेकिन सरकार अभी भी लोगों को धर्म से जुड़े रहने के लिए मजबूर करती है। वे बताती हैं, “लोगों के ऊपर अभी भी उनके पड़ोस और मस्जिदों में दबाव बनाया जा रहा हैं। इसका सबसे बड़ा संकेत ये है कि आज 2021 में भी स्कूलों में बच्चों को धर्म की पढ़ाई करनी पड़ती है”!

- Advertisement -
- Advertisement -

More articles

कोई जवाब दें

Please enter your comment!
Please enter your name here

- Advertisement -